Home » इंडिया » Catch Hindi: delhi holi in memory of famous writers and politicians
 

दिल्ली में जब नेता और लेखक मिलकर खेलते थे होली

नलिन चौहान | Updated on: 23 March 2016, 13:26 IST

आजादी मिलने के बाद राजधानी होने के कारण दिल्ली का राजनीतिक महत्व तो बढ़ा ही साथ ही बाद के दशकों में वह हिंदी साहित्य का केंद्र बनकर भी उभरी. इस वजह से समूचे हिंदी प्रदेशों से साहित्यकार, लेखक और पत्रकार दिल्ली में पहुंचे.

अंग्रेजों की राजधानी नई दिल्ली में भवनों का निर्माण करने वाले सुजान सिंह के बेटे और ”दिल्ली” नामक उपन्यास के लेखक खुशवंत सिंह 'मेरे साक्षात्कार' पुस्तक में बताते हैं कि मैंने तो होली पहली बार दिल्ली आकर मॉडर्न स्कूल में ही मनाई. 5-6 साल का था, जब गांव से दिल्ली आया. तब मॉडर्न स्कूल दरियागंज में था. उस वक्त इस स्कूल को बनाने वाले लाला रघुवीर सिंह के घर पर होली खेली जाती थी. पहली बार जिस लड़की के साथ मैंने होली खेली, वह एक सरदारनी ही थी. नाम था कवल. यह भी मेरे साथ ही उसी स्कूल में पढ़ती थी. बाद में वह मेरी पत्नी बनी.

इतना ही नहीं, वे अपने समय के मौसम का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि होली के दिनों में मौसम सबसे अधिक सुहावना होता है. परिंदे अपने घोंसले बनाने में जुटे होते हैं. फूलों पर बहार आई होती है. दिल्ली में इतने फूल कभी खिले ही नहीं दिखते, जितने होली के मौसम में. विशेष रूप से टेसू या पलाश अपने पूरे यौवन पर होता है. पलाश के फूलों का होली से विशेष संबंध है.

1955 से 1962 तक आकाशवाणी में काम करते हुए हिन्दी की लोकप्रियता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले आईएएस अधिकारी और नाटककार जगदीशचन्द्र माथुर अपनी पुस्तक "जिन्होंने जीना जाना" में लिखतेे हैं कि होली पर राष्ट्रपति भवन में संगीत और रूपकों का आयोजन मुझे करना होता था. मुगल गार्डन में अतिथियों और औपचारिकता से घिरे राजेन्द्रबाबू को मैंने भोजपुरी में होली के लोक-संगीत पर झूमते देखा. वे लिखते हैं कि राष्ट्रपति भवन की दीवारें मानों गायब हो जाती, दिल्ली का वैभव भी, उत्तरदायित्व का भार भी. सुदूर भारत के जिले के देहात की हवा मस्तानों को लिए आती और ग्रामीण हृदयों का सम्राट अपनेपन को पाकर विभोर हो जाता.

दिल्ली में इतने फूल कभी खिले ही नहीं दिखते, जितने होली के मौसम मेंः खुशवंत सिंह

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पोती तारा सिन्हा इस बात की पुष्टि करते हुए ”राष्ट्रपति भवन की छांव में” पुस्तक में लिखती है कि होली, दशहरा और दीवाली जैसे त्योहार बाबा ने राष्ट्रपति भवन में सामूहिक रूप से मनाने की शुरुआत की. इसमें मित्र, सेनाध्यक्ष और भवन के कर्मचारी आकर मिलते और अबीर-गुलाल का आदान-प्रदान होता.

उस दौर में केवल राष्ट्रपति भवन ही नहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के यहां भी साहित्यिकारों का जमावड़ा लगता था. प्रसिद्व रंगकर्मी जेएन कौशल अपनी आत्मपरक पुस्तक "दर्द आया दबे पांव" में बताते हैं कि पंडित नेहरू के जन्मदिन और होली के अवसर पर प्रायः (पंचानन पाठक, नेहरू के बाल सखा और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पदस्थ) प्रधानमंत्री निवास पर जाया करते थे.

हिंदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी प्रेमचंद अपनी पुस्तक ”प्रेमचंद घर में” में लिखती है कि कई साल की बात है. मैं इलाहाबाद गई हुई थी. मेरी भाभी होली के दिन मुझे रोकना चाहती थी. आप (प्रेमचंद) बोले- मैं अकेला हूं, कैसे छोड़ जाऊं? हां, मैं दिल्ली जानेवाला हूं. दिल्लीवालों ने मुझे बुलाया है. वहां से दो-तीन दिन बाद लौटूंगा, तब आप दोनों होली खूब खेंले. जब हम दोनों दिल्ली गये, तो वहां खूब होली रही. वहां सारे कपड़े उनके खराब हो गये.

”कलम के मजदूर, प्रेमचंद” पुस्तक में मदन गोपाल बताते हैं कि होली से एक दिन पहले (प्रेमचंद) दिल्ली पहुंचे. होली के दिन नीम की सींक से दांत कुरेदते हुए प्रेमचंद धूप में खाट पर बैठे थे. वक्त साढ़े नौ का होगा. ऐसे ही समय में होलीवालों का एक दल घर में अनायास घुस आया और बीसियों पिचकारियों की धार और गुलाल से उस दल ने उनका ऐसा सम्मान किया किया कि एक बार तो प्रेमचंदजी भी चौंक गए. पलक मारने में वह तो सिर से पांव तक कई रंग के पानी से भीग चुके थे. हड़बड़ाकर उठे, क्षण-भर रुके, स्थिति पहचानी, और फिर वह कहकहा लगाया कि मुझे अब तक याद है. बोले- अरे भाई जैनेन्द्र, हम (प्रेमचंद) तो मेहमान है.

दिल्ली की होली की बात हो पर "मधुशाला" (सुन आयी आज मैं तो होली की भनक, होली की भनक ए जी होली की भनक) के कवि हरिवंशरॉय बच्चन का स्मरण न हो यह कैसे संभव है. बच्चन अपनी प्रसिद्व आत्मकथा के अंतिम खंड ”दशद्वार से सोपान तक” में लिखते हैं कि अमित (मशहूर हिंदी फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के चोट लगने से घायल होने पर) के साथ पहली फरवरी को हम यहां (दिल्ली) आये थे, मार्च में होली पड़ी, बुन्देलखंड के कवि ईसुरी की फागों के अनुकरण में मैंने तेजी (बच्चन) के विनोदार्थ एक फाग लिखी-

तेजी, दूर हो गए बेटे.
चले बम्बई से हम अपना सब सामान समेटे.

LK Advani (Photo by Ajay Aggarwal / Hindustan Times via Getty Images)

प्रसिद्व आलोचक नामवर सिंह "काशी के नाम" पुस्तक में अपने भाई काशीनाथ सिंह को लिखे एक पत्र (26 फरवरी, 1966) में राजधानी में प्रवासियों के दुख को प्रकट करते हुए लिखते हैं कि लगता है, होली में न आ सकूंगा. इसलिए इस साल की होली मेरे बगैर ही मनाओ और इजाजत दो कि कम से कम एक साल तो दिल्ली की होली देख सकूं. जब यहां का नमक खा रहा हूं तो यहां की होली में भी शरीक होना ही चाहिए.

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अपनी पुस्तक ”दृष्टिकोणः ब्लॉग पर बातें” के मेरा निवास और होली लेख में लिखते हैं कि मुझे याद आता हैं कि 1970 के शुरूआती दशक में हिंदुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली के मैगजीन सेक्शन में होली पर अनेक लेख प्रकाशित हुए थे. उनमें से एक लेख का शीर्षक था- दिल्ली में होली के दिन आपको इन स्थानों पर जाने से नहीं चूकना चाहिए. उस लेख में एक पता दिया गया था सी-1/6, पंडारा पार्क. उल्लेखनीय है कि आडवाणी पहली बार सांसद बनने के बाद से उपप्रधानमंत्री बनने तक पंडारा पार्क में ही रहे.

पत्रकार और लेखक सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 70 के दशक की दिल्ली में होली के बहाने तत्कालीन समाज और प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए, "एक की कीचड़ दूसरे का रंग” लेख में कहते हैं कि होली मनोरंजन का त्योहार है पर धीरे-धीरे वह इस भाव से कटता जा रहा है. यह मनोरंजन का लोकरंजन से कट जाने का ही चरम रूप है. राजधानी में दिन पर दिन रंग कम होता जा रहा है, पानी बढ़ता जा रहा है.

1970 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी का दिल्ली स्थित बंगला होली खेलने के मशहूर स्थानों में था

प्रसिद्व समाजशास्त्री पूरनचंद जोशी ”मेरे साक्षात्कार” पुस्तक में बताते है कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्थिक विकास संस्थान से जुड़ा था. उन दिनों वहां हमने सामुदायिक होली को बनाए रखा. संस्थान में सभी प्रांतो, सभी धर्मों के लोग थे. सबके घर से मिठाइयां आती थी. हमारे तब के निदेशक की पत्नी प्रसिद्व शास्त्रीय गायिका शीला धर पक्का गाना गाती थीं और लोग भी गाते थे. लेकिन अब वहां भी यह परंपरा समाप्त हो गई है.

”हम लोग” टीवी सीरियल के पटकथा लेखक प्रसिद्व हिंदी साहित्यकार लेखक मनोहर श्याम जोशी 80 के दशक की दिल्ली की होली पर ”आज का समाज” पुस्तक में लिखते हैं कि जब तक दिल्ली में कुमाउंनी लोगों की बिरादरी गोल मार्केट से लेकर सरोजिनी नगर तक के सरकारी क्वार्टरों में सीमित थी, वे अपनी होली परंपरागत ढंग से मना पाते थे, अब नहीं. इतना ही नहीं, राजधानी में होली के बहाने सामाजिक अलगाव पर गहरी टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं कि होली तो वैसे भी सामंतों के संरक्षण में होने वाला समाज के तथाकथित पिछड़े वर्गों का त्योहार माना जाता था. तो आज के महानगरों में होली का उत्साह कहीं नजर आता भी है तो झोंपडपट्टियों में ही. अपने मध्यमवर्गीय मोहल्ले में मैंने इधर होली का रंग वर्ष प्रतिवर्ष और अधिक फीका होता हुआ पाया है.

कवि-पत्रकार रघुवीर सहाय अपनी पुस्तक ”लेखक के चारों ओर” में लिखते हैं कि होली के रंग से जो लोग डरते हैं उन सबको पकड़कर उनका मनोविश्लेषण किया जाए तो राष्ट्र के नवोत्कर्ष में बहुत योग मिलेगा. हर बड़े शहर में ऐसे लोग हैं- राजधानी में तो बहुत हैं. ये लोग न तो यह जानते हैं कि वे होली क्यों नहीं खेलना चाहते न यह समझते हैं कि उन्हें होली क्यों खेलनी चाहिए.

दिल्ली में 80 के दशक में शुरू दैनिक जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोषी "धन्न नरबदा मइया हो" पुस्तक में लिखते हैं कि त्योहार एक जीवन पद्वति और लोक जीवन से निकलते हैं. होली है और वह सिर्फ प्रेमी-प्रेमिकाओं की ही नहीं है. उसमें तो पूरा समाज ही किसी न किसी तरह मन की निकालता है. होली हमारी निजी, पारिवारिक और सामाजिक जीवन का लूस वाल्व है. वह आलोड़न और रेचन दोनों के काम आने वाला त्योहार है. इस समाज में होली को बल्कि एक झंझट और गंवारूपन की तरह देखता है. वेलेंटाइन डे में हमारे युवा युवतियों को जो आधुनिकता और यूरोपियता दिखती है वह होली में वे नहीं पाते.

हिंदी के शीर्ष निबंधकार और दिल्ली में 90 के दशक में नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक रहे विद्यानिवास मिश्र ”भारतीयता की पहचान” पुस्तक में लिखते हैं कि होली के गीतों की आकाशवाणी नियंत्रित धुनें आ गई हैं, न छूटने वाले रंगों और रोगनों का आतंक आ गया है. प्रत्येक पर्व पर पाठक को ध्यान में रखकर कथा बांचने वाले पंडित हैं नहीं कि होली को अब सेक्युलर पर्व और राष्ट्रीय एकता का पर्व घोषित करें.

First published: 23 March 2016, 13:26 IST
 
नलिन चौहान @catch_hindi

देश की राजधानी में जी टीवी के स्थानीय केबल चैनल सिटी टीवी से पत्रकारिता के जीवन की शुरुआत करने के बाद इंडिया टुडे हिंदी और फिर पीटीआई में नौकरी. संघ लोक सेवा आयोग से चयन के पश्चात दिल्ली सरकार की सूचना सेवा में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत.

पिछली कहानी
अगली कहानी