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सम/विषम संख्या वाहन नीतिः बीजिंग, लंदन, मैक्सिको से क्या सबक ले सकती है दिल्ली

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • सरकार को उम्मीद है कि सम/विषम संख्या निजी वाहन नीति शहर के प्रदूषण को करीब आधा कर देगी. दिल्ली में कर्मचारी कम और काम का बोझ ज्यादा, ऐसे में कैसे निगरानी हो सकेगी.
  • मैक्सिको में जब वाहन नीति लागू किए आठ साल पूरे हुए तो स्थिति इतनी बुरी हो गई कि संयुक्त राष्ट्र ने इसको वहां का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर घोषित कर दिया.

दिल्ली में एक जनवरी से निजी गाड़ियों के लिए जो सम/विषम नंबरप्लेट नीति घोषित की गयी है क्या उससे सचमुच भारतीय राजधानी के बढ़ते वायु प्रदूषण में कमी आ सकेगी?

विज्ञान एवं पर्यावरण के गैर लाभकारी केंद्र में वायु प्रदूषण नियंत्रण इकाई की प्रमुख अनुमिता राय चौधरी के मुताबिक, इस वर्ष नवंबर में शहर की आबोहवा "बहुत खराब" से "खतरनाक" स्तर के बीच रही. इससे निपटने के लिए "तत्काल आक्रामक और कठोर कदम" उठाने की जरूरत है. 

उन्होंने बताया कि प्रदूषण इतना गंभीर हो गया है कि यह हर घंटेे एक व्यक्ति की जान लेने के साथ हर तीसरे बच्चे का फेफड़ा खराब कर रहा है. वो कहती हैं कि इस दिशा में "छोटे छोटे फैसलों से मदद नहीं मिलेगी."

दोपहिया और कारों पर लक्ष्य केंद्रित करना एक अच्छी शुरुआत है. आईआईटी कानपुर का अध्ययन कारखानों-ऊर्जा संयंत्रों के बाद दिल्ली को प्रदूषित करने की दूसरी प्रमुख वजह "वाहनों" को बताता है. 

सरकार को उम्मीद है कि सम/विषम संख्या नंबरप्लेट नीति शहर के प्रदूषण को करीब आधा कर देगी. ऐसा लगता है कि सरकार  कुछ ज्यादा आशावादी हो रही है. उसे शायद लग रहा है कि इस फैसले से तत्काल दिल्ली का प्रदूषण नियंत्रित हो जाएगा.

दुनिया के कई देेशों में ऐसे प्रयोग किए जा चुके हैं. आइए आपको बताते हैं कि वहां इन नीतियों का कैसा प्रदर्शन रहा. 

मैक्सिको शहर, मैक्सिको

शहर में 1984 से लेकर 1993 तक गाड़ियों के नंबरप्लेट के आखिरी अंक के आधार पर सप्ताह में एक दिन उनके प्रयोग पर रोक लगा दी है. मसलन 7 या 8 अंत वाली गाड़ियों को मंगलवार को चलाने पर रोक लगा दी गयी और 5 या 6 अंत वाली गाड़ियों को सोमवार को चलाने पर रोक थी.

आईआईटी कानपुर का अध्ययन कारखानों-ऊर्जा संयंत्रों के बाद दिल्ली को प्रदूषित करने की दूसरी प्रमुख वजह "वाहनों" को बताता है

मैक्सिको में ये नीति काम नहीं आयी. इस नीति पर हुए दो शोधों से पता चला कि प्रतिबंध के लागू होने के बाद जहां प्रदूषण के स्तर में तुरंत कमी देखी गई, वहीं लंबी अवधि के लिए यह बढ़ गया. इसके पीछे की प्रमुख वजह यह रही कि कार मालिकों ने दूसरी कारें खरीद लीं. जिनमें से बहुतों ने ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली पुरानी कार खरीद ली. 

1992 में जब इस नीति को आठ साल पूरे हो गए तो स्थिति इतनी बुरी हो गई कि संयुक्त राष्ट्र ने मैक्सिको शहर को इस वहां का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर घोषित कर दिया. तो शायद इस उदाहरण को देखते हुए दिल्ली में इसे लागू नहीं किया जाना चाहिए. 

बोगोटा, कोलंबिया

मैक्सिको के प्रयोग को देखते हुए बोगोटा ने हर वाहन को सप्ताह में दो दिन के लिए प्रतिबंधित कर दिया. हालांकि इससे भी पीएम10, पीएम2.5 समेत प्रमुख उत्सर्जित होने वाले प्रदूषकों (दिल्ली का प्रमुख प्रदूषक पीएम 2.5) की मात्रा में कोई सुधार नहीं दिखा.

बीजिंग, चीन

2008 ओलंपिक से पहले शहर में एक दिन छोड़कर वाहन चलाने पर प्रतिबंध की शुरुआत की गई. यहां पर प्रतिबंध ने काम किया. एक शोध से पता चला कि इससे प्रदूषण में 20 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई. लेकिन ओलंपिक खेल समाप्त होने के बाद जल्द ही इस नीति को वापस ले लिया गया.

पेरिस, फ्रांस

शहर में एक निर्धारित समय के लिए ही ऐसा नियम लागू किया गया. सबसे हालिया नीति के तहत मार्च 2015 में केवल विषम संख्या वाले वाहनों को अनुमति दी गई और सार्वजनिक परिवहन को मुफ्त कर दिया गया. जब प्रदूषण स्तर निर्धारित मानकों से ऊपर चला गया तो उन्होंने इस तरह का प्रयोग दो बार अस्थायी रूप से किया. 

इन उदाहरणों को देखते हुए कहा जा सकता है कि दिल्ली सरकार को प्रदूषण रोकने के लिए बेहतर विचारों के साथ सामने आना होगा. 

2011 में हुए एक अध्ययन में साओ पाओलो, बोगोटा, बीजिंग और थियानमेन में अपनाई गई ऐसी नीतियों का विश्लेषण किया गया. शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इससे प्रदूषण का स्तर पहले तो कम हुआ लेकिन हवा की गुणवत्ता में कोई टिकाऊ सुधार नहीं दिखा. 

ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर यात्रियों ने नियम के हिसाब से एक नया रास्ता चुन लिया. मैक्सिको शहर में लोगों ने आराम से दूसरी सेकेंड हैंड कार खरीद ली. साओ पाओलो में जहां केवल पीक आवर्स में ही प्रतिबंध था, यात्रियों ने अपना रूटीन-कार्यक्रम ऑफ पीक आवर्स में बनाना शुरू कर दिया. 

इस तरह के प्रतिबंध का एक और अजीब दोष सामने आया कि नंबरप्लेट के आधार पर स्वच्छ और गंदा दोनों ही तरह का ईंधन इस्तेमाल करने वाले वाहनों को चलने का मौका मिल गया. यदि ऐसी नीति लंबे समय तक लागू रहती है तो यात्रियों को स्वच्छ ईंधन वाली कारों को खरीदने के प्रोत्साहन मिलना चाहिए. 

दिल्ली जिस तरह के प्रदूषण का शहर सामना कर रहा है उसके लिए डीजल वाहन ज्यादा जिम्मेदार हैं. लेकिन प्रतिबंध की चपेट में पेट्रोल और सीएनजी-पीएनजी जैसी गैसों से चलने वाले वाहन भी आएंगे.

अगर वाहन चलाने पर प्रतिबंध से फर्क नहीं पड़ता है तो किससे पड़ता है?

दो यूरोपीय शहरों ने अलग तरीके इस्तेमाल करने की कोशिश की जो कुछ प्रभावी लगते हैं.

स्टॉकहोम, स्वीडन

शहर को कई जोन में बांट दिया गया. इनमें से लो एमिशन (कम उत्सर्जन) जोन पहचाने गए, जहां सर्वश्रेष्ठ उत्सर्जन मानक वाले वाहनों को ही चलाने की अनुमति दी गई. 1996 में शुरू की गई इस नीति ने अच्छा प्रदर्शन किया. 

लंदन, ब्रिटेन

ब्रिटेन की राजधानी के सिटी सेंटर में प्रवेश करने वाले हर वाहन से रकम वसूली जाती है. 2003 में जब यह नीति शुरू की गई तब सभी से 5 पाउंड लिए जाते थे और अब इसे बढ़ाकर 10 पाउंड कर दिया गया है. 

बाद में पूरे लंदन शहर ने खुद को स्टॉकहोम की तरह ट्रकों-बसों के लिए कम उत्सर्जन क्षेत्र घोषित कर दिया. दोनों नीतियां एक साथ मिलकर प्रदूषण के स्तर में काफी गिरावट लाने में सफल रहीं. 

अगर इस नियम का उल्लंघन करने पर काफी ज्यादा जुर्माना लगा दिया गया तो इससे रिश्वतखोरी बढ़ सकती है

दिल्ली इस तरह की नीतियां तुरंत लागू नहीं कर सकती क्योंकि इसके लिए योजना बनानी होती है. तो क्या सम/विषम नीति ही सबसे बेहतर विकल्प है?

बेशक एक बार कोशिश के लिए यह सही है. लेकिन एक अल्पकालिक नीति के रूप में जैसा हम चाहते हैं शायद यह उतनी कारगर साबित न हो. ऐसा क्यों, आइए जानते हैंः

अगर इस नियम का उल्लंघन करने पर काफी ज्यादा जुर्माना लगा दिया गया तो इससे रिश्वतखोरी बढ़ सकती है. यदि यह बहुत कम होगी तो लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोग जुर्माना भरकर घर से वाहन ले जाना ही सही समझेंगे. जैसे हो सकता है कि कोई व्यक्ति नोएडा से गुड़गांव जाने के लिए टैक्सी का महंगा किराया देने से ज्यादा बेहतर 500 रुपये बतौर जुर्माना देना समझेगा. क्योंकि गलत दिन वाहन निकालने पर पकड़े जाने की संभावना 50-50 होगी, इसलिए लोग वाहन निकालने का जोखिम भी उठा सकते हैं.

इसका मतलब है कि इस नीति को कारगर बनाने के लिए काफी भारी संख्या में निगरानी करने वाले कर्मचारी रखने होंगे.

पेरिस ने 2015 में इस नियम को एक दिन लागू करने के लिए 750 अतिरिक्त पुलिस अधिकारी तैनात किए थे. क्या दिल्ली में जहां पहले से ही पुलिसकर्मी कम हैं और काम ज्यादा, यह नीति कारगर साबित होगी?

First published: 7 December 2015, 8:52 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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