Home » इंडिया » Demonetisation fallout: Noida's daily wagers are out of jobs, food & patience
 

नोएडा के मज़दूर: रोटी नहीं, काम नहीं और अब धैर्य भी नहीं

श्रिया मोहन | Updated on: 16 November 2016, 8:07 IST
(श्रिया मोहन/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • नोटबंदी के फ़ैसले पर देशभर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. कहीं इसे एक ख़राब फ़ैसला कहा जा रहा है तो कहीं प्रधानमंत्री की जय-जयकार हो रही है. 
  • मगर इस फैसले का सीधा असर दिहाड़ी मज़दूरों पर बिल्कुल साफ़ दिखता है. उनकी हालत ऐसी होती जा रही है कि धैर्य भी साथ छोड़ रहा है.
  • गुड़गांव-नोएडा के तमाम कल कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति रुपए के अभाव में दिनों दिन बिगड़ती जा रही है.

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नोएडा के बरोला इलाक़े में दिहाड़ी मज़दूरों का एक चौक है. काम की उम्मीद लगाए लगभग 500 मज़दूर हर सुबह सात बजे ही यहां आकर जम जाते है. दिन चढ़ने के साथ 11 बजे तक 20 मज़दूरों को किसी तरह काम मिल पाया. बाकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8 नवंबर की देर रात से नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही काम के इंतजार में हैं. 

भय, भूख और गुस्सा

शुरुआती दिनों में मज़दूरों ने इंतज़ार किया यह मानकर कि धैर्य रखना समय की मांग है. मगर जैसे ही प्रधानमंत्री ने 13 नवंबर को 50 दिन की मोहलत मांगी, उनका धैर्य टूटने लगा. अब उनमें भय और गुस्सा एक साथ आगे बढ़ रहा है. पांच बच्चों की मां रेखा उन सैकड़ों मज़दूरों में से हैं, जो बुधवार से काम के इंतज़ार में चौक पर बैठी हैं. वह कहती है, 'हमने नाश्ते में रोटी-चटनी खाई है.'

रेखा और उसका पति भूदेव दोनों बेलदार हैं. रेखा को जब मज़दूरी का काम नहीं मिला था तो वह नोएडा के सेक्टर 100 में एक बड़ी कंपनी में सफाई के लिए लग गई थीं, जहां उन्हें 300 रुपए प्रतिदिन मिलते थे. मगर जब नोटबंदी का एलान हुआ, तो कंपनी ने उन्हें जाने के लिए कह दिया. 

जब उन्होंने 9 नवंबर को नोटबंदी की खबर सुनी, तब उनके पास 4000 रुपए थे. रेखा एसबीआई बैंक गई थीं रुपए जमा करने लेकिन वहां खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने धमका कर भगा दिया था. रेखा कहती हैं, 'वे हमारे चेहरों पर लिखी गरीबी देख सकते हैं. बैंक केवल अमीरों के लिए हैं.'

औरों की तरह रेखा और भूदेव के लिए भी नोटबंदी से पार पाना किसी जंग जीतने जैसा है. उनकी खाली रसोई सबकुछ बयान करती है. पिछले छह दिनों से उनके टीन शेड के एक कमरे के घर में या तो चावल बने या फिर मिर्ची-प्याज की चटनी और रोटी. चटनी इतनी तीखी कि भूख मर जाए. 

काम बंद और दाम बढ़े

इन मज़दूरों की दुनिया भी अजब है. नोटबंदी का असर बहुत बड़ी आबादी पर पड़ रहा है लेकिन इनकी कहानियां सबसे जुदा हैं. इनके काम बंद हो गए हैं और कमरे का किराया 2000 से बढ़ाकर 2500 रुपए कर दिया गया है. आटे की बोरी 300 की बजाया 500 में बिकने लगी है. पुराने नोटों पर पंसारी कमीशन लेने लगे हैं. राशन भी उधार मिलना बंद हो गया है. 

चौक पर एक मज़दूर जितेंद्र कहते हैं, 'सबसे बुरी बात यह है कि नोटबंदी के बाद से हमारी दिहाड़ी कम कर दी गई है. जिन्हें 350 रुपए रोज मिलते थे, अब उसी काम के लिए 300 रुपए दिए जा रहे हैं. क्या यह ठीक बात है कि नोटबंदी के बाद मज़दूर चौक में किराया बढ़ा, खाने के सामानों के दाम बढ़े, पर मज़दूरी घट गई.'

मजदूरों के अधिकारों से जुड़े निर्माण शक्ति संगठन के आज़ाद बताते हैं, 'मजदूरों के दो वर्ग हैं. नई दिल्ली में निर्माण मजदूर 30 हज़ार हैं. इनमें से महज 30 फीसदी नए प्रोजेक्ट्स, पुल और मेट्रो में लगे हुए हैं. ये सब ठेके पर हैं. पर 70 फीसदी असंगठित मजदूर वर्ग में हैं और मजदूर चौक जैसी जगहों पर जमा होकर काम का इंतजार करते हैं. वे छोट-मोटे निर्माण में काम करते हैं और उन्हें दिहाड़ी दी जाती है. आज़ाद कहते हैं कि नोटबंदी उन्हें कुचल रही है क्योंकि लोगों ने छोटे-मोटे निर्माण के काम रोक दिए हैं'. 

बैंक खाते

प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में 233 मिलियन लोग बिना खाते वाले थे. कंस्ट्रक्शन सेक्टर से जुड़े मजदूरों ने इसकी संख्या और बढ़ा दी है. मजदूर चौक में बिना खातों वाले मजदूरों की सरसरी गणना से समझ आया कि यह संख्या जनसंख्या की लगभग चौथाई है. 

हैरान-परेशान मज़दूर पूछते हैं, 'हम अपने नोटों को लेकर कहां जाएं?' 'नोट बदलने के लिए क्या हमें बैंक में खाते खुलवाने की जरूरत है?'  'बैंकों के बाहर इतनी लंबी कतार है, हम किस तरह अपना खाता खुलवा सकते हैं?' ऐसे हालात में कई सवाल हैं और कई अव्यवस्थित बातें. 

पर क्या प्रधानमंत्री ने जन धन योजना के तहत उन्हें बैंक खातों के लिए आश्वस्त नहीं किया था? इसके जवाब में दिहाड़ी पर काम करने वाली पांच बच्चों की मां सुमन कहती हैं, 'हम अपनी दिहाड़ी में इस कदर उलझे रहते हैं कि बैंक खाते खोलने के लिए समय ही नहीं निकाल पाए. और फिर यह किसलिए? हम जो कमाते हैं, खर्च कर देते हैं और खाते में रखने के लिए उतना पैसा नहीं रहता'. एक दूसरे मज़दूर राम दास कहते हैं, 'बहुत पहले मेरा एक खाता था, पर उसमें पैसा नहीं था' आखिर उसे बंद कर दिया'. 

50 दिनों की मोहलत डरावनी

रेखा के पांच बच्चों को पिछले महीने चिकनगुनिया हो गया था. एक गैरसरकारी क्लिनिक में उनके इलाज पर उसने दो हफ्ते में 5000 रुपए लगा दिए. इससे उनकी एक तिहाई बचत का सफाया हो गया. ऐसी और अनहोनी के खयाल से वह कांप उठती हैं. नोटबंदी के बाद जिस नाजुक दौर से वह गुजर रही हैं, उन्हें लगता है कि कहीं ऐसा ना हो कि उनके सिर पर छत नहीं रहे और वे सडक़ पर आ जाएं. वो कहती हैं, 'प्रधानमंत्री ने हमारे साथ बहुत नाइंसाफी की है. उनके 50 दिन के प्रयोग में हम बेकार, बेघर हो जाएंगे और भूख से मर जाएंगे, तब कौन जिम्मेदारी लेगा?

First published: 16 November 2016, 8:07 IST
 
अगली कहानी