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रॉबिनहुड रिवर्स संस्करण: सरकार ने ग़रीबों का पैसा चूसकर अमीरों की जेब में पहुंचा दिया

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 December 2016, 8:13 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • नोटबंदी की घोषणा को एक महीना पूरा होने के बाद आरबीआई ने 7 दिसम्बर को मौद्रिक नीति की समीक्षा की. मगर नोटबंदी के शोरगुल से लेकर समीक्षा तक की उथल-पुथल किसी ‘सच्ची श्रद्धांजलि’ से कम नहीं है. 
  • बैंक नोट और उससे जुड़े सारे फ़ैसले आरबीआई के होते हैं. इसलिए 30 दिनों से इस सरकारी फैसले के कारण हो रही आलोचनाओं का बोझ यही बैंक झेल रहा था.

एक महीने बाद मौद्रिक नीति की समीक्षा में आरबीआई ने ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की, जबकि नोटबंदी के वक्त वादा किया गया था कि बैंक ब्याज दरें कम होंगी और लोन सस्ते होंगे. बेशक, नोटबंदी के वक्त किए गए वादों में से यह सबसे ताजा झूठ साबित हुआ वादा है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवम्बर को भविष्य के ख्वाब दिखाते हुए कहा था नोटबंदी से भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा और काले धन को काबू किया जा सकेगा. आतंकवाद पर रोक लग जाएगी. आम आदमी को इससे भ्रष्टाचार, काले धन और जाली नोटों के खिलाफ खड़े होने में मदद मिलेगी.

उन्होंने यह भी कहा था कि राष्ट्र विरोधी तत्वों और समाज विरोधी तत्वों के पास जितने भी 500 और हजार रुपए के नोट हैं, वे अब रद्दी हो जाएंगे. मगर सच्चाई यह है कि उस वक्त जितने भी नोट सर्कुलेशन में थे, वे सारे बैंकों में जमा किए जा चुके हैं. इसका मतलब वे रद्दी नहीं हुए.

सवाल जो पूछे जाने चाहिए

एक बात जिसकी चारों ओर चर्चा है, वह यह कि बैंकों में जमा कोई भी पैसा काला धन नहीं है. साथ ही एक और विचार आता है कि सारे धन का हिसाब रखा गया है कि नहीं; यह अलग जांच का विषय है. सरकार खुद इस पर असमंजस में है कि उसका यह हिसाब ठीक है कि नहीं, क्योंकि सरकार अब इस बारे में कुछ नहीं बोल रही. 

सरकार अब काले धन की बजाय कैशलेस या लेसकैश अर्थव्यवस्था पर फोकस कर रही है. जहां तक जाली नोट की बात है, सरकार कह रही है कि अब तक केवल 0.02 प्रतिशत ही जाली नोट सामने आए हैं. तो क्या ये सारी कवायद केवल इस 0.2 प्रतिशत के लिए हुई. 0.02 फीसदी के लिए 84 फीसदी नोटों को बंद करने का क्या तुक है?

विशेषज्ञों की राय

नोटबंदी के करीब एक माह बाद अब ज्यादातर अर्थ विशेषज्ञ इस मामले में एकमत होते दिखाई दे रहे हैं. वे नोटबंदी की इस सारी कवायद को विफल ही बता रहे हैं. जहां तक सरकार के जगज़ाहिर घोषित इरादों की बात है या इससे होने वाले अनायास फायदे की बात है तो ठीक है लेकिन इस मामले में कोई नियोजित रणनीति ही नहीं अपनाई गई और अपनाई गई भी तो वह बेकार ही साबित हुई.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रवि श्रीवासतव के अनुसार नोटबंदी दरअसल रॉबिनहुड का ठीक उल्टा संस्करण है. यहां क्या हो रहा है, 'गरीब की आय कम हो गई और सिर्फ़ इतना ही नहीं, गरीब का पैसा उन लोगों तक पहुंच रहा है जिनकी माली हालत ठीक-ठाक है.' 

उन्होंने कहा, 'नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकसान अनौपचारिक क्षेत्र को हुआ है. देश के 90 फीसदी कामगार इसी क्षेत्र में काम करते हैं और जीडीपी का 45 प्रतिशत इसी क्षेत्र की देन है. उन्होंने कहा सरकार के इस कदम से जनता और अर्थव्यवस्था दोनों पर असर पड़ा है. जल्द ही इसके मध्यम व दूरगामी गंभीर नतीजे सामने आएंगे. 

आर्थिक सलाहकार रह चुके नितिन देसाई ने साफ कहा कि इस संबंध में आंकड़ों के आधार पर कुछ भी तय करना कोई मायने नहीं रखता, जिनके पास काला धन था, उन सबने ‘पतली गली’ निकाल ही ली और भ्रष्टाचार से कमाया सारा पैसा फिर से सर्कुलेशन में है. 

नोटबंदी के बाद जो सबसे बड़ा बदलाव आया, वह यह है कि कैश लेन-देन में कमी आई है. इनमें कुछ वैध तो कुछ अवैध लेन-देन थे. इसका नतीजा क्या होगा यह तो सरकार के अगले कदम पर ही निर्भर करेगा; जैसे कि कर चोरी करने वाले पकड़े जाएंगे या नहीं और उन पर कार्रवाई होगी कि नहीं. वे कहते हैं जब कोई काले धन की बात करता है, यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनेताओं को होने वाली सारी फंडिंग इसी काले धन के जरिये होती है; इसलिए इस संदर्भ में भी कार्रवाई की जानी चाहिए.

बात हिसाब की

एक अन्य पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अशोक देसाई ने कहा, 'नोटबंदी के एक माह बाद इसका आकलन करने का सबसे सही तरीका होगा कि अब तक टैक्स चोरी कर रहे लोगों से पूछा जाए कि अब उनके पास कितने पुराने नोट बचे हैं, जिन्हें न तो वे बैंक में जमा करवा सकते हैं और न ही बदलवा सकते हैं.'

साथ ही यह भी पता लगाना जरूरी है कि इनमें कितने नोट टैक्स चोरी की वजह से बचे हुए हैं. लेकिन उन्होंने माना कि इन आंकड़ों की विश्वसनीयता तय कर पाना मुश्किल है क्योंकि कोई कुछ भी अनुमान लगा कर बता सकता है. उन्होंने कहा ज्यादातर टैक्स चोरी कम कीमतों की संपत्ति पर होती है. नोटबंदी से इस पर काफी असर पड़ा है.

आरबीआई यह तो कह रहा है कि नोटबंदी का असर आना ‘अभी बाकी’ है लेकिन वह जो असल नुकसान छिपाने की कोशिश कर रहा है, उसे अर्थशास्त्रियों की नजर से छिपाना मुश्किल है. सरकार हालांकि इस मामले में अपनी बात पर कायम है कि नोटबंदी से पड़े प्रभाव का आकलन 50 दिन बाद करना चाहिए. हालांकि ऐसा नहीं है कि 50 दिन में पूरी तस्वीर बदल जाएगी.

First published: 10 December 2016, 8:13 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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