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नोटबंदी: नए रोज़गार की तलाश में बनारस से बुनकरों का पलायन

आवेश तिवारी | Updated on: 15 December 2016, 7:50 IST
(पत्रिका)
QUICK PILL
  • नोटबंदी की वजह से बनारसी साड़ियों के 15 हजार करोड़ के धंधे पर बुरा असर पड़ा है. 
  • एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन डेढ़ लाख लोग प्रभावित हैं और बुनकरों ने अब पलायन भी शुरू कर दिया है.  

17 दिसंबर को नोटबंदी की नीति लागू हुए 40 दिन जाएंगे. इतने दिन के बाद देशभर में संचालित छोटे और मझोले उद्योगों पर इसकी मार की कहानियां भी आना शुरू हो गई हैं. बनारस जो बुनकरों के लिए मशहूर है, वह भी नोटबंदी की चपेट में है. कैश की किल्लत ने बुनकरों को नए काम की तलाश में दूसरे शहरों की तरफ़ पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है. 

बनारसी साड़ी के कारोबार को नज़दीक से देखने वाले अविनाश तिवारी कहते हैं, 'इस बार शादियों के सीज़न में धंधा लगभग 50 फिसद मंदा रहा है. जिन थोक व्यापारियों का सालाना कारोबार सौ करोड़ का था, वो इस बार घटकर 75 करोड़ तक आ गया है. खुदरा कारोबारी नए सामान नहीं खरीदना चाहते क्योंकि ग्राहक नहीं है और बुनकर साड़ियां नहीं बना रहे क्यूंकि उनके पास ताना बाना खरीदने का पैसा नहीं है'. 

अविनाश कहते हैं अगर आप 8 नवम्बर के पहले और उसके एक महीने बाद का कारोबार देख लें तो फर्क़ जमीन-आसमान का  नजर आएगा. 

बुनकर हसीबुद्दौला 15 दिनों से हर दिन रामकटोरा स्थित बैंक के चक्कर लगाते हैं. वो कहते हैं, 'रोज़ जाता हूं लेकिन पैसे नहीं मिलते. जी में आता है कि या तो यहीं ज़हर खा लूं या फिर बैंक के शीशे फोड़ डालूं'. 

हसीब बुनकर हैं लेकिन नोटबंदी के बाद से बनारसी साड़ियों का काम छोड़कर अब दिन रात लाइन में लगे रहते है. नोटबंदी की वजह से हसीब की तरह हर वह शख़्स फिलहाल परेशान है जो बनारसी साड़ी बनाने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. ऐसे तक़रीबन डेढ़ लाख लोग हैं. 

निराश बनारस, टूटता ताना-बाना

जैतपुरा, औसानगंज उन मोहल्लों में से हैं जहां नोटबंदी के पहले तक पावरलूम चला करते थे लेकिन अब सन्नाटा है. जैतपुरा के आबिद अंसारी 15 सालों से पावरलूम चलाते रहे मगर अब सऊदी अरब जाने की जुगत में हैं. आबिद कहते हैं, 'नोटबंदी ने हमें और कर्जदार बना दिया, फज्र की नमाज़ के बाद रोज लाइन में लगते हैं और शाम तक अक्सर मायूस होकर लौट आते हैं. 

आबिद कहते हैं कि इस धंधे से ऊबे लोगों को मोदी से उम्मीदें थीं लेकिन उन्होंने पहले से भी बदतर हालात कर दिया. पहले महंगाई और फिर नोटबंदी ने हमें पूरी तरह से तोड़ डाला है.

नए रोज़गार की तलाश में सऊदी अरब का रुख़ करने वाले आबिद अकेले नहीं हैं. बनारस के बुनकरों में पलायन शुरू हो रहा है, आगे यह और बढ़ सकता है. हर एक मोहल्लों में ऐसे लोग बड़ी संख्या में मिल रहे हैं जो धंधा छोड़ कर जाना चाहते हैं. बुनकर नानू ने बुनकरी छोड़ घाटों पर बांस की खपचियों की बनी कुर्सी टेबल बेचना शुरू कर दिया है. इस उम्मीद में कि सैलानी उनके बनाए सामान खरीद लेंगे. 

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इसी बीच सोनारपुरा के बुनकर रामआसरे की बेटी की शादी भी है लेकिन अब तक वह साड़ियां नहीं खरीद पाए हैं. रामआसरे कहते हैं कि कैश मिल भी गया तो कितना मिल जाएगा. उन पैसों से बारातियों की खातिरदारी करूं कि दहेज़ दूं कि बेटी की शादी करूं?

रामआसरे कहते हैं, 'हमें गद्दीदारों ने ताने देना बंद कर दिया है जो बाने उधार मिल जाते थे अब वो भी नहीं मिल रहे.' लाला कहते हैं कि साहब अब हम लोगों के अच्छे दिन चले गए, समझ में नहीं आता किस दीवार से सिर टकराएं और कहां जाएं? 

First published: 15 December 2016, 7:50 IST
 
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