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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फसलों के अवशेष जलाना जारी है

निहार गोखले | Updated on: 21 September 2016, 7:16 IST
QUICK PILL
  • पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा डंठलों और भूसी को जलाने और उसके बाद जो काली राख बचती है, वह उत्तरी भारत के कई शहरों के लिए वायु प्रदूषण का कारक बन गई है. यह प्रदूषण इतनी बड़ी मात्रा में है कि अंतरिक्ष से यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है.
  • पंजाब में फसल के बचे हुए अंश को जलाने पर रोक वाला कानून भी है लेकिन इसका क्रियान्वयन असंभव सा लगता है. इसे लगातार जलाए जाने से यह साबित भी हो चुका है. एनजीटी और दिल्ली हाईकोर्ट ने दंड भी लगाया है और सवाल खड़ा किया है कि इस कानून को अमल में क्यों नहीं लाया गया?

धान की फसल पंजाब और हरियाणा के विशाल भू-भाग में मई से जुलाई के बीच बोई जाती है और इसकी कटाई सितम्बर और अक्टूबर में होती है. बड़ी-बड़ी मशीनों, जिन्हें कम्बाइंड हार्वेस्टर कहते हैं, से फसल की कटाई होती है, मशीन ही धान को अलग कर उसे इकट्ठा करती है और भूसी और डंठल को खेत में छोड़ देती है.

यही डंठल और भूसी विशेषकर दिल्ली जैसे शहरों के लिए चिन्ता का सबब बन गई है. यह विषय बहुत जोर-शोर से कानून, अदालतों और यहां तक कि नासा द्वारा भेजे गए चित्रों के चलते चर्चा का विषय बना हुआ है.

पंजाब और हरियाणा के किसानों द्वारा इन डंठलों और भूसी को जलाने और उसके बाद जो काली राख बचती है, वह उत्तरी भारत के कई शहरों के लिए वायु प्रदूषण का कारक बन गई है. यह प्रदूषण इतनी बड़ी मात्रा में है कि अंतरिक्ष से यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है.

समस्या के हमारेे आधुनिक दौर की उपज है लिहाजा इसका कोई परम्परागत समाधान भी नहीं है

समस्या के हमारेे आधुनिक दौर की उपज है लिहाजा इसका कोई परम्परागत समाधान भी नहीं है. अब कम्बाइंड हार्वेस्टर का इस्तेमाल आम तौर पर किया जाता है. फसल कटने के बाद भारी मात्रा में डंठल खेतों में ही पड़ा रहता है. पहले यह होता था कि किसान हाथ से कटाई करते थे, फसल को थ्रेसर पर लाते थे और तब अनाज को पछोर कर (महिलाएं बांस के बने सूप से यह काम करती थीं) रखा जाता था.

चूंकि धान के डंठल को खेतों से लाना अब काफी खर्चाला हो गया है, ऐसे में किसानों को सस्ता यही लगता है कि इसे आग के हवाले कर दिया जाए. यह भी विश्वास किया जाता है कि इससे घास-पात, कूड़ा-करकट और नुकसानदेह कीट-पतंगे जलकर खत्म हो जाते हैं.

यह पूरा सच नहीं है. सालों से इन डंठलों को जलाए जाने के बाद भी कीटनाशकों की मांग कम नहीं हुई है. तथ्य तो यह है कि इसे जलाए जाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति खत्म हो रही है, अगली फसल के लिए पानी की जरूरत बड़ गई है. 

पंजाब में फसल के बचे हुए अंश को जलाने पर रोक वाला कानून भी है लेकिन इसका क्रियान्वयन असंभव सा लगता है. इसे लगातार जलाए जाने से यह साबित भी हो चुका है. एनजीटी और दिल्ली हाईकोर्ट ने दंड भी लगाया है और सवाल खड़ा किया है कि इस कानून को अमल में क्यों नहीं लाया गया? किसान इसे जलाना क्यों जारी रखे हैं? इस अवशेष का उनके लिए क्या उपयोग है?

इस अवशेष से निपटने के कई रास्ते हैं, जिनके क्रियान्वयन के लिए हितैषी नीतियों की ज्यादा जरूरत है और कानून लागू करने वालों की कम.

इसका बेचा जाना

मूल समस्या यह है कि फसल के इस अवशेष को अपने खेतों से हटाने के लिए किसानों को कोई इंसेंटिव नहीं मिलता है. इसमें शारीरिक श्रम लगता है और पैसा खर्च होता है. एक रास्ता है यदि वे इसे बेच सकें. चावल की डंडी पैकेजिंग मैटेरियल्स (जैसे फलों के बक्से आदि) में काम आती है और यहां तक कि बिजली पैदा करने में भी. तथाकिथत जैव-ईंधन ऊर्जा उत्पादक स्टीम से चलने वाले टर्बाइन के लिए इस जलाते हैं.

हालांकि, यह डंठल अभी भी जलता ही है. ऐसे में यह आसान होगा कि ऊर्जा कम्पनियों के उत्सर्जन के लिए इसका

नियामक बना दिया जाए. इससे वे प्रदूषण कम करने वाले उपकरणों का इस्तेमाल भी करेंगे और उत्सर्जन नियामकों का पालन भी होगा. हालांकि, इस उपाय को अभी तक काम में नहीं लाया गया है क्योंकि अवशेष की कीमत, लगभग 1,000 रुपए कुन्तल है और लगभग इतनी लागत डंठलों को हटाने तथा उसे बाहर फेंकने में आती है.

कम्पोस्ट खाद

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फसलों के अवशेष में कई ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो मिट्टी के लिए अच्छे होते हैं. यदि इस अवेशष को लगातार खेतों में डाला जाए तो इससे खाद का उपयोग भी कम हो सकता है. 

पंजाब के कई जिलों में क्लाईमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर (कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नवाचार) में इसे अपनाया भी गया. हालांकि फसल कटने और अगली बुवाई के बीच बहुत कम समय होता है जबिक इसकी कम्पोटिंग में काफी वक्त लगता है.

आर्गेनिक खाद के कुछ उत्पादकों ने इस दिशा में काम भी किया लेकिन उसे ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिल सकी. कुछ भी हो, बुवाई के पहले किसानों को इन डंठलों को तो खेत से हटाना ही होता है.

पलवार (मलचिंग करना)

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फसलों के अवशेष में कई ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो मिट्टी के लिए अच्छे होते हैं. यदि इस अवेशष को लगातार खेतों में डाला जाए तो इससे खाद का उपयोग भी कम हो सकता है. 

पंजाब के कई जिलों में क्लाईमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर (कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नवाचार) में इसे अपनाया भी गया. हालांकि फसल कटने और अगली बुवाई के बीच बहुत कम समय होता है जबिक इसकी कम्पोटिंग में काफी वक्त लगता है.

आर्गेनिक खाद के कुछ उत्पादकों ने इस दिशा में काम भी किया लेकिन उसे ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिल सकी. कुछ भी हो, बुवाई के पहले किसानों को इन डंठलों को तो खेत से हटाना ही होता है.

इसमें खेतों में फसलों के अवशेष को रखना भी शामिल है. (पलवार का मतलब है- फसलों के अवशेषों जैसे पुआल, भूंसी, सूखी पत्तियों का प्रयोग खाली स्थानों को ढकने के लिए करना, इससे खाली जगह पर आवरण बनाया जाता है जिससे मृदा अपरदन एवं पोषक तत्व क्षरण का नियंत्रित होता है. पहाड़ी क्षेत्रों में फलों के बागों में पलवार का विशेष महत्व है)

इस उपाय में खेत की मिट्टी पूरी तरह से ढक जाती है. पंजाब में किसान चावल, गेहूं की फसल बारी-बारी से लेते हैं. कटाई और अगली बुवाई के बीच एक महीने से भी कम का समय रहता है. 

इससे पानी को भी बचाए रखने में मदद मिलती है. इससे घास-पात भी नहीं बढ़ती और निराई भी नहीं करनी होती है. लेकिन मलचिंग के काम में श्रम लागत ज्यादा आती है.

हैप्पी सीडर

हैप्पी सीडर एक नई तकनीकि वाली मशीन है जो वास्तव में धान की खेती की सारी समस्याएं हल कर देती है. यह मशीन फसल काटती है, अगली फसल के लिए बीज बोती है और फसल की बेकार की चीजों को एकतरफ उठाकर रख देती है. लेकिन इसकी लागत लगभग 1,25,000 रुपए है. 

पंजाब सरकार इस पर 48,000 रुपए की सब्सिडी भी देती है, इसके बावजूद यह मशीन उपयोग में कम लाई जाती है.

एक रिपोर्ट के अनुसार पिछली रबी फसल की कटाई में पूरे पंजाब में सिर्फ 700 मशीनें ही उपयोग में लाई गईं. इसमें से आधी तीन जिलों- अमृतसर, लुधियाना और संगरूर तक ही सीमित रह गईं. इन जिलों में खुद की 100 मशीनें थीं. एक आर्थिक शोध के अनुसार किसान यह मशीन इसलिए नहीं खरीदते हैं कि इसकी लागत ज्यादा है बनिस्बत जितना वे कमाएंगे.

इस पर सरकार को आगे आने की जरूरत है. एक अध्ययन में गणना की गई है और इस बात पर जोर दिया गया है कि इन अवशेषों को हटाने में जितनी कुल लागत आए, उसका भुगतान किसानों को किया जाना चाहिए. अध्ययन में इस राशि को वसूल करने के तर्क भी दिए गए हैं. एक विकल्प यह भी बताया गया है कि सरकार इस खर्च को वहन करे.

लुधियाना स्थित बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया के वरिष्ठ रिसर्च इंजीनियर एचएस सिद्धू कहते हैं कि सरकार को ऐसा रास्ता निकालने की जरूरत है कि जनता को किराए के आधार पर हैप्पी सीडर मिल सकें, जिस तरह से कम्बाइंड हार्वेस्टर मिलते हैं. 

सिद्धू कहते हैं कि यहां सभी किसान अपनी भूमि के अनुसार किराए पर कम्बाइंड हार्वेस्टर लेते हैं. किसी का खुद का हार्वेस्टर नहीं है. सरकार को मदद के लिए आगे आते हुए किराए पर हार्वेस्टर देने वाली फर्मों को इनरोल करना चाहिए. इससे किसान भी हैप्पी सीडर लेने के लिए उत्साहित होंगे.

First published: 21 September 2016, 7:16 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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