Home » इंडिया » Devdutt Pattanaik’s Ramayana celebrates Sita’s power to choose
 

देवदत्त पटनायक: रामायण की ताकत सीता के चुनने की आजादी में निहित है

श्रिया मोहन | Updated on: 10 July 2016, 8:44 IST
QUICK PILL
  • जब राम 14 साल के वनवास के लिए अयोध्या से निकलने की तैयारी कर रहे थे तब उन्होंने साथ आने की जिद कर रही सीता से कहा था कि जंगल स्त्रियों के लिए ठीक नहीं है. सीता ने बेहद शांत तरीके से जवाब देते हुए कहा, \'आप नियमों से बंधे हुए हैं लेकिन मैं नहीं. मैं चुनने के लिए आजाद हूं. मैं आपके पीछे आ सकती हूं.\'
  • जब सुपर्णखा ने राम को चाहा तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया. उसने सीता पर यह सोच कर हमला किया कि वह नहीं रहेगी तब राम दूसरी पत्नी ला सकते थे. पटनायक बताते हैं, \'निश्चित तौर पर पर वह एक राक्षस थी जिसे दूसरे की इच्छा से कोई मतलब नहीं था. उसके लिए सिर्फ अपनी इच्छा मायने रखती थी.\'

जब राम 14 साल के वनवास के लिए अयोध्या से निकलने की तैयारी कर रहे थे तब उन्होंने साथ आने की जिद कर रही सीता से कहा था कि जंगल स्त्रियों के लिए ठीक नहीं है. सीता ने बेहद शांत तरीके से जवाब देते हुए कहा, 'आप नियमों से बंधे हुए हैं लेकिन मैं नहीं. मैं चुनने के लिए आजाद हूं. मैं आपके पीछे आ सकती हूं.' सीता ने राम के साथ जाने का फैसला लिया. यह उन पांच विकल्पों में से एक था जिसे सीता ने चुना और फिर वाल्मीकि के रामायाण का आधार तैयार हुआ.

अंत में देवदत्त पटनायक बेहद साधारण तरीके से अच्छे और बुरे और ऋ षि एवं राक्षस के बीच का फर्क बताते हैं. वह कहते हैं, 'इंसानों को लगता है कि उन्हें धरती को कृषि और दिमाग को नियमों से नियंत्रित करना चाहिए. इंसान विकल्पों और नियमों को चुनते हैं ताकि दुनिया बनाई जा सके. जहां दयालुता ज्यादा हो और क्रूरता कम.' वहीं दूसरी तरफ राक्षस जानवर की तरह होते हैं और वह सिर्फ अपने लिए जीते हैं. इसलिए संघर्ष होता है.

कुछ इंसान अपने हितों की खारित नियमों को तोड़ते मरोड़ते हैं. कैकेयी ने दशरथ से अपना वचन पूरा करते हुए राम को 14 सालों के लिए वनवास भेजने की बात कही थी. पटनायक बताते हैं कि नियमों का मकसद लोगों की मदद करना होता है न कि उन्हें नुकसान पहुंचाना.

विकल्प की ताकत

दो थीम शुरू से अंत तक बनी रहती है. लड़की जिसने चुना क्योंकि सीता ऐसा करने को आजाद थी. वहीं राम नियमों का अनुसरण करने के लिए प्रतिबद्ध थे और यह उनके व्यक्तित्व को पारिभाषित करता है. दोनों में संघर्ष होता है और इसे पूरा करना मुश्किल होता है. दोनों में से कोई भी अलगाव में नहीं होता है.

राम नियमों से बंधे थे लेकिन उन्होंने दुबारा शादी करने का विकल्प नहीं चुना, जबकि नियम इसकी आजादी दे रहे थे. सीता ने अपने विकल्पों को चुना लेकिन वह साथ ही सामाजिक व्यवहार के नियमों से बंधी रही. जब वह लंका से आईं तो उन्होंने लव और कुश को जन्म दिया. सीता के दोनों बच्चे इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने राम की पूरी सेना को परास्त कर दिया. लेकिन फिर उसने रावण से लड़ना क्यों नहीं उचित समझा, जब वह उनका अपहरण कर उन्हें लंका ले गया?

जब उनके पास हनुमान के साथ लंका से भागने का विकल्प था तब सीता ने हनुमान से कहा, 'मैं चाहती हूं कि मेरे पति समंदर लांघ कर लंका आएं और रावण को मारकर मुझे यहां से ले जाएं. ताकि उनके परिवार की इज्जत बनी रहे. राम युवराज थे और उनकी महारानी के लिए उनकी इज्जत बहुत मायने रखती थी.'

सबसे दिलचस्प किसी के विकल्प से सीख लेने का है. जब सुपर्णखा ने राम को चाहा तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया. उसने सीता पर यह सोच कर हमला किया कि वह भाग जाएगी. राम दूसरी पत्नी ला सकते थे. पटनायक बताते हैं, 'निश्चित तौर पर पर वह एक राक्षस थी जिसे दूसरे की इच्छा से कोई मतलब नहीं था. उसके लिए सिर्फ उसकी इच्छा मायने रखती थी.'

राम नियमों को लेकर बंधे हुए प्रतीत होते हैं और इस दौरान वह प्यार जैसे एहसास को भी भूल जाते हैं. कैच के साथ बातचीत में पटनायक बताते हैं:

राम का बयान यह बताता है कि उनसे क्या किए जाने की उम्मीद थी क्योंकि वह एक शाही खानदान के वंशज थे. हम जैसे आधुनिक उनकी तरह नहीं हो सकते. लेकिन यह कहानी है. परिवार की विरासत पर सवाल करना संभव नहीं है. जैसे कि एक सैनिक से जो कहा जाए वह करता है. वह सवााल नहीं करता. यही वजह है कि सैनिका जीवन बेहद कठिन होता है. उनकी हिंसा राज्य के निर्देश होती है न कि किसी व्यक्ति की इच्छा पर.

सीता ने जब फिर से राम के साथ अयोध्या लौटने का फैसला किया तो सीता को लेकर अफवाहें चल पड़ीं. राम को बेहतर मिल सकता था. जनता का राजा होने के नाते राम ने सीता को एक बार फिर से जंग में छोड़ दिया. जब उन्होंने अपने परित्यक्त बेटे लव और कुश को छोड़े जाने के फैसले का बचाव किया, तो इस फैसले में कई स्तरों पर खामी थी. तो फिर राम कैसे महान भगवान बन गए?

खामियों वाले भगवान की अवधारणा आधुनिक है और संयोगवश यह अब्राहमिक कल्पना पर आधारित है न कि हिंदू मिथक पर. क्या आप गांजा खींचते शिव को आदर्श मानेंगे? क्या आप कृष्ण को आदर्श मानेंगे जो कई स्त्रियों से प्यार करते थे लेकिन किसी के प्रति वफादार नहीं थे? क्या अपनी मां का वध करने वाले परशुराम को आदर्श मानेंगे? क्या बुद्ध को आदर्श माना जाएगा जिन्होंने अपनी पत्नी और नवजात को छोड़ दिया? सैनिकों के लिए यह मुश्किल होता है क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं होता. शाही परिवार के बड़े बेटे होने के नाते किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि वह राजा बनना भी चाहते हैं या नहीं. फैसला देना आसान है और किसी से सहानुभूति रखना भी.

नैतिक सीख

आखिर में सीता अपने बच्चों को बताती है, 'कुछ लोगों के पास चुनने की आजादी होती है. अन्य लोगों के पास ऐसा नहीं होता. उन्हें नियमों का पालन करना होता है. दुनिया सभी तरह के लोगों के भरी है.'

आज की असंतुलित दुनिया में क्या हमें वैसे समाज की जरूरत है जो ज्यादा नियमों से बंधी हो या फिर वैसा समाज जिसमें विकल्पों को चुनने की आजादी हो?

पटनायक हालांकि सतर्कतापूर्वक यह भी कहते हैं कि सब कुछ मर्जी के मुताबिक नहीं हो सकता. सीता कहती हैं, 'मैंने अपने पति को नहीं चुना. मेरे पिता और शिव के धनुष ने राम को मेरे लिए चुना. जिंदगी में कई बार हमें चुनना नहीं पड़ता. लेकिन यह हमेशा बुरा नहीं होता. आपको भरोसा करना होता है और बेहतर के लिए उम्मीद करनी होती है.'

पटनायक की कहानी 'द गर्ल हू चूज' को कोई अपने बच्चों को पढ़ा सकता है. जिसमें नियमों का आदर और दूसरे की मर्जी का सम्मान करना बताया गया है. अगर आपके पास खड़ा होने की क्षमता है और चुनने की आजादी है तो आपको कमजोर नहीं होना चाहिए. सभी नतीजों को ताकत और इनायत से स्वीकार करें, जैसे सीता ने किया था.

First published: 10 July 2016, 8:44 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी