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प्रधानमंत्रीजी, क्या कश्मीर की समस्या सिर्फ ‘विकास’ की समस्या है?

वज़ाहत क़ाजी | Updated on: 11 August 2016, 8:31 IST

दो दिन पहले आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी. महीने भर से कश्मीर घाटी में जारी अशांति पर अपनी बात रखने के लिए मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले में स्थित चंद्रशेखर आजाद के गांव भाबरा को चुना. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बलिदान देने वालों की याद में भारत छोड़ो दिवस के दौरान मंच से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में शांति सुनिश्चित करने का काम सिर्फ बाचतीत और विकास के जरिये ही संभव है.

बुधवार को संसद भवन में कश्मीर पर बयान देते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी करीब इसी तरह की बातें कहीं. उन्होंने अपने बयान में गैस सिलेंडर, चीनी, चावल जैसी रोजमर्रा की आपूर्ति की चीजों से इस अभूतपूर्व संकट की तुलना कर डाली.

प्रधानमंत्री ने अपने बयान में कहा, ‘कश्मीर शांति चाहता है और सरकार इस क्षेत्र के विकास के लिये प्रतिबद्ध है. कश्मीरियों के बेहतर जीवन के लिये जो भी आवश्यक होगा केंद्र सरकार उन्हें उपलब्ध करवाएगी. हम सिर्फ जम्मू-कश्मीर का विकास चाहते हैं.’

एक तरफ जहां मोदी बातचीत के मोर्चे पर तो बिल्कुल ठीक हैं लेकिन उनकी जो सोच है कि विकास के जरिये कश्मीर में चल रहे तनाव को दूर किया जा सकता है तो वह सही नहीं कही जा सकती. इसका कारण पूरी तरह से मौजूदा संघर्ष के स्वभाव में निहित है - उसका इतिहास और वर्तमान हमें बहुत कुछ बताता है.

असल मुद्दे से आंख मूंदना

असल में कश्मीर का मुद्दा अपनी मूल प्रकृति में धार्मिक-राष्ट्रवादी तर्ज का संघर्ष है जिसमें भारत, पाकिस्तान और कश्मीरी तीनों ही शामिल हैं. किसी भी रूप में किसी एक हिस्सेदार को इसमें से अलग करना सच्चाई को नजरअंदाज करने के बराबर है.

इस संघर्ष में धर्म और राष्ट्रवाद का घालमेल इस क्षेत्र में त्रिआयामी महत्व रखता है. यह इस सारे संघर्ष को शून्य कर देता है क्योंकि इस संघर्ष में शामिल कोई भी पक्ष अपने पांव पीछे खींचने और रणनीति बदलने को तैयार नहीं है.

एक तरफ जहां कश्मीर को लेकर चल रहा सशस्त्र संघर्ष अपनी पुरानी स्थिति में अटका हुआ है वहीं कश्मीर के भीतर जारी लोगों का संघर्ष समय-समय पर उठता रहता है. 2016 का मौजूदा संघर्ष जो विभिन्न कारकों के चलते विरोध प्रदर्शनों की एक श्रृंखला के रूप में सामने आ रहा है, इस बिंदु को स्पष्ट करते हैं.

यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि कश्मीर को लेकर चल रहे इस संघर्ष में क्षेत्र के अंदर और बाहर विविध आयाम नजर आते हैं. इनमें से सिर्फ किसी एक पर अपना ध्यान केंद्रित करना बाकियों की तरफ आंख मूंदना होगा. और मोदी ठीक ऐसा ही कर रहे हैं.

संघर्ष के समाधान की जगह दमन का रास्ता

देखा जाए तो मूल रूप से मोदी का विकास पर जोर देना और संघर्ष का समाधान खोजने की जगह दमन का रास्ता अपनाना है. आज कश्मीर में स्थितियां अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई हैं. विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई और समर्थन कर रहे लोगों को क्या सिर्फ विकास का माध्यम से ही शांत किया जा सकता है? यह न केवल एक गलत सोच है बल्कि एक भ्रम का वातावरण तैयार करने जैसा भी है. यह कश्मीर की बेहद जटिल और बहुस्तरीय समस्या को विकास की एक एकपरती सरल व्याख्या करना है.

मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के जरिए पुरानी पीढ़ी ने संघर्ष का झंडा बड़ी सफाई से नई और युवा पीढ़ी के हवाले कर दिया है

दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर की परिवारवादी और संरक्षणवादी राजनीतिक व्यवस्था को मद्देनजर रखते हुए ऐसे प्रयास पहले भी किये जा चुके हैं. जितने त्रुटिपूर्ण ये तमाम निर्णय रहे हैं उतने ही गलत इनके परिणाम भी रहे हैं. तो क्या इस बार परिणाम अलग हो सकते हैं? नहीं. बिल्कुल भी नहीं.

अगर व्यवसायिक नजरिये से देखें तोे कश्मीर एक ‘विभक्त बिंदु’ पर है. कश्मीरियों की युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की जगह ले रही है. इस नई पीढ़ी की सोच और चेतना कश्मीर में चल रहे संघर्ष से भरी हुई है. 2016 के विरोध प्रदर्शनों ने अगर कुछ किया है तो वह यह कि इस दौरान संघर्ष का झंडा बड़ी सफाई से इस नई और युवा पीढ़ी के हवाले कर दी गई है.

इसके चलते यह मुद्दा जिसकी भावना, संवेदनशीलता और चेतना की प्रकृति कुल मिलाकर कश्मीर में चल रहे इस संघर्ष को ही परिलक्षित करती है.

मोदी का विकास का मंत्र कश्मीरी संघर्ष के इस आयामों को संबोधित करने की दिशा में कुछ नहीं कर रहा है. वास्तव में मोदी ऐसा करके एक बार फिर से इस संघर्ष को नजरअंदाज करने की पुरानी भूल दोहरा रहे हैं. राजनीतिक समस्या का इलाज नौकरशाही में खोजा जा रहा है.

समस्या यह है कि नौकरशाही स्वाभाव से ही ‘तर्कसंगत’ होती है जबकि जन संघर्ष पूरी तरह से तर्कहीन होते हैं. वास्तव में इसका नौकरशाहीकरण करना मूल रूप से इस राजनीतिक समस्या की तरफ टेक्नोक्रेटिक रवैया अपनाने जैसा है.

इस सबको पीछे छोड़ भी दें तो यह एक वास्तविकता है कि कश्मीर में विकास कभी भी संघर्ष का मुद्दा नहीं रहा बल्कि यह सबकुछ सिर्फ संरक्षण और संरक्षवादी राजनीति के चलते हैं जिसका फायदा सिर्फ राजनीतिक दल और राजनेता ही उठाते आए हैं.

इसके स्पष्ट निहितार्थ हैं. भले ही मैं कल्पना में बोलूं कि कश्मीर में चल रहा तमाम विवाद सिर्फ विकास को लेकर है लेकिन यह जुमला यहां कामयाब नहीं होगा क्योंकि यहां कि राजनीति संरक्षण के दम पर चलती है.

मोदी का विकास का नारा, भले ही वे पूरे उत्साह से इसका प्रचार करें स्वाभावतः एक गलत दिशा में किया जा रहा प्रयास ही है. न तो कोई इसपर कान देगा और न ही यह कश्मीर में सफल होगा.

2016 के इस विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से कश्मीरियों का संदेश बिल्कुल स्पष्ट हैः कश्मीर एक विवादग्रस्त क्षेत्र है और इसे जल्द से जल्द सुलझाया जाना चाहिये. इस विवाद के बहुस्तरीय, जटिल और विकट स्वरूप को देखते हुए इसका हल सिर्फ विकास के माध्यम से करने की सोचना भी इसे टालने जैसा है. इसके अलावा कश्मीर की राजनीतिक व्यवस्था की प्रकृति को देखते हुए कश्मीर के विकास का नारा देना, टालू रवैया अपनाना है.

लोगों को लगता था कि इतने वर्षों के अंतराल में केंद्र में सरकार, चाहे वह किसी भी दल की हो, कुछ तो समझदार हुई होगी. लेकिन मोदी का भाषण स्पष्ट करता है कि यह अभी भी दूर की कौड़ी है. काश!

First published: 11 August 2016, 8:31 IST
 
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