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जमानत पर बाहर आए वंजारा भाजपा के लिए बने गूढ़ पहेली

सुधाकर सिंह | Updated on: 22 June 2016, 6:54 IST
(गूगल)

सेवानिवृत्त एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डीजी वंजारा ने सरदार पटेल की प्रतिमा पर एक खिलौना पिस्तौल और कुछ कलमों के साथ माल्यार्पण किया. यह भले सुर्खियों में रहने का उनका नया नाटक हो, लेकिन वे तब से ही सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए एक तरह की गूढ़ पहेली बन चुके हैं, जब से जमानत पर बाहर आए इस अधिकारी को मुंबई की एक अदालत ने गुजरात में पुनः प्रवेश की अनुमति दी है.

हालांकि मुंबई की कॉलेज छात्रा इशरत जहां और उसके प्रेमी जावेद पिल्लई तथा दो अन्य की फर्जी मुठभेड़ में हत्या के प्रमुख आरोपी पूर्व डीआईजी वंजारा पहले ही जेल से बाहर आ चुके थे. लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया की वजह से वे वापस गुजरात आज पहुंच पाए. फिर भी इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ ही उनकी गुजरात वापसी निश्चित हो गई थी.

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अपने सभी सार्वजनिक बयानों में वंजारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस और जेल में बंद बलात्कार के आरोपी 'तांत्रिक' आसाराम बापू को उच्च सम्मान देते रहे हैं. वास्तव में इस तरह से गुजरात में सत्तारूढ़ भाजपा के साथ संबंधों को अकाट्य साबित कर रहे हैं.

यहां तक कि जब 2007 में गिरफ्तारी के बाद से वंजारा को अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद किया गया था, वहां भी उन्हें 'वीआईपी ट्रीटमेंट' मिलता रहा. वंजारा कभी मंत्रियों तो कभी नौकरशाहों के साथ जेल परिसर में अपनी कविताओं और अन्य 'विचारों' वाली पुस्तकों के विमोचन के बहाने वीआईपी सुविधाएं भोगते रहे.

जमानत पर मुम्बई जेल से बाहर आने के बाद भी उनके गुजरात में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, परन्तु वह प्रतिबंध भी अदालत ने उस समय हटा लिया जब वंजारा ने दावा किया कि पश्चिमी महानगर में उसे अंडरवर्ल्ड से खतरा है.

गर्मजोशी भरा स्वागत

इस साल मार्च में गुजरात वापसी पर वंजारा को इस तरह का गर्मजोशी भरा स्वागत मिला कि लोग यह भूल ही गए कि वह एक हत्या के मामले में आरोपी है जो सिर्फ जमानत पर बाहर आया है और वह सम्मानजनक ढंग से बरी कर दिया गया निर्दोष व्यक्ति नहीं है. 

वंजारा को शामिल कर भाजपा पटेल वोट बैंक को हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई की उम्मीद कर सकती है

न्यायपालिका की भावनाओं की अनदेखी करते हुए, राज्य की राजधानी का टाउन हॉल वंजारा के भव्य स्वागत के लिए उपलब्ध करा दिया गया. इस भव्य स्वागत में जमानत पर आए एक और आरोपी शीर्ष आईपीएस अधिकारी पीपी पांडेय ने भी भाग लिया. कुछ दिनों बाद ही पांडे को पुलिस के प्रभारी महानिदेशक के रूप में पदोन्नति दे दी गई. हालांकि इस नियुक्ति को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है.

वंजारा के सम्मान में आयोजित समारोहों में खुद वंजारा और दूसरों के द्वारा दिए गए भाषणों के सुर और लहजे ने आरोपी पूर्व आईपीएस अधिकारी को एक 'हिंदू हृदय सम्राट' का दर्जा दे दिया है, भले ही  कनिष्ठ अवतार के तौर पर.

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इस प्रकार, सत्तारूढ़ भाजपा को नए युग के 'हिंदू हृदय सम्राट' के रूप में वंजारा की छवि से उत्पन्न होने वाले लाभ को प्राप्त करने के लिए आदर्श रूप में उसका स्वागत करना चाहिए. वंजारा को शामिल कर भाजपा उस आंदोलन से अपने पारंपरिक वोट बैंक (पटेल वोट बैंक) को हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई की उम्मीद कर सकती है, जो पटेलों ने नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग को लेकर किया था.

यह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के समय पार्टी के लिए वांछनीय होगा, खासकर इस कारण भी कि वंजारा उत्तरी क्षेत्रों की आदिवासी पट्टी में अच्छा-खासा प्रभाव रखते हैं. इसी पट्टी में कभी भी कांग्रेस की तरफ वापसी करने की प्रवृत्ति नजर आ रही है.

वरिष्ठ राजनीतिक स्तंभकार प्रशांत दयाल की राय है कि भाजपा के लिए वंजारा को पार्टी में शामिल करने को लेकर अपनी मजबूरी है. वह भी ऐसे समय में जब उसे देश के उन हिस्सों में अपनी 'धर्मनिरपेक्ष' छवि पेश करने की जरूरत है, जहां यह अपने पंख फैलाना चाहती है.

'हिंदू हृदय सम्राट'

प्रशांत दयाल ने समझाया कि भले ही वंजारा की 'हिंदू हृदय सम्राट' की छवि पटेल वोट बैंक का तीन दशक पुराना साथ छूटने को बेअसर कर सकती है, लेकिन यदि गुजरात में इस एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को भाजपा अपने साथ मिलाती है तो यह बात पार्टी के अन्य चुनावी सहयोगी दलों को चिढ़ा सकती है, क्योंकि वे अपने-अपने राज्यों में अब भी अल्पसंख्यक वोट बैंक के साथ अच्छा तालमेल बनाए रखने की कोशिश में जुटे हैं.

अपनी तरफ से वंजारा राज्य में 2017 के विधानसभा चुनाव लड़ने का अपना इरादा साफ कर चुके हैं. उन्होंने यह भी कहा है कि वह एक राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं, हालांकि उन्होंने इसके साथ ही यह भी जोड़ दिया था कि "यदि आवश्यकता हुई तो...".

यह स्पष्ट रूप से निहित है कि "आवश्यकता" केवल तब पैदा होगी जब कोई पार्टी उनकी पसंद की एक सीट से उन्हें मनोनीत करने के लिए इनकार कर दे. शायद उनकी पसंद की सीट उत्तर गुजरात के साबरकांठा जिले में अपना पैतृक नगर इदार (अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित) होगी.

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लेकिन राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि वंजारा राज्य में किसी भी सीट से चुनाव जीत सकते हैं, जरूरी नहीं कि आदिवासियों के लिए आरक्षित सीट से ही चुनाव लड़ें.

अब तक की बात करें तो सत्तारूढ़ भाजपा तब भी आरोपी वंजारा से एक सुरक्षित दूरी रखे हुए हैं, जब केंद्र सरकार की सभी एजेंसियों उस फर्जी मुठभेड़ को असली साबित करने के लिए अतिरिक्त मेहनत कर रही हैं. 

यह तय माना जा रहा है कि एक न एक दिन उन्हें बरी होना ही है, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक के रूप में वंजारा की छवि को उभारा जा सकता है, जो बंदूकप्रेमी इस एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की एक बड़ी राजनीतिक भूमिका का मार्ग प्रशस्त कर देगी.

First published: 22 June 2016, 6:54 IST
 
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