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बार एसोसिएशन की राजनीति में नप गए गौरव भाटिया?

अतुल चौरसिया | Updated on: 28 March 2016, 9:08 IST
QUICK PILL
  • 2012 में\r\nउत्तर प्रदेश में समाजवादी\r\nपार्टी की सरकार बनने के साथ\r\nही गौरव भाटिया को उत्तर प्रदेश\r\nसरकार ने एडिशनल एडवोकेट जनरल\r\n(एएजी)\r\nके पद पर\r\nनियुक्त किया था. लेकिन\r\n23 मार्च\r\nको अचानक से उन्हें इस पद से हटा\r\nदिया गया.
  • अटकलें हैं कि सुप्रीम\r\nकोर्ट बार एसोसिएशन की राजनीति\r\nमें उनकी हद से ज्यादा सक्रियता\r\nउत्तर प्रदेश सरकार को रास\r\nनहीं आ रही थी. गौरतलब\r\nहै कि भाटिया इस समय भी सुप्रीम\r\nकोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव\r\nहैं.
दिल्ली के सियासी और कानूनी हलकों में गौरव भाटिया समाजवादी पार्टी का प्रमुख चेहरा हुआ करते थे. टीवी चैनलों पर पार्टी का पक्ष हिंदी और अंग्रेजी में एक सी सहजता के साथ रखने के कारण पार्टी में उनकी एक खास छवि निर्मित हुई थी. 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के साथ ही गौरव भाटिया को उत्तर प्रदेश सरकार ने एडिशनल एडवोकेट जनरल (एएजी) के पद पर नियुक्त किया था. इस पद की खास महत्ता है. राज्य के मसलों को सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से रखने में एएजी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

लेकिन 23 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार ने अचानक से उन्हें इस पद से हटा दिया. हालांकि बार एंड बेंच नामक वेबसाइट से बातचीत में भाटिया ने बताया कि उन्होंने खुद ही इस्तीफा दिया है क्योंकि सरकारी जिम्मेदारियों के चलते वो अपनी निजी वकालत पर ध्यान नहीं दे पा रहे थे.

अब इस इस्तीफे और उसके कारणों से जुड़ी खबरें धीरे-धीरे बाहर आ रही हैं. जितने सीधे शब्दों में गौरव इस मामले को रफा दफा कर रहे हैं, शायद बात उतनी सीधी नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार और समाजवादी पार्टी से जुड़े कुछ सूत्रों की मानें तो भाटिया की विदाई पिछले कुछ समय से तय थी. इसकी वजह उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है. यह महत्वाकांक्षा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की राजनीति से जुड़ी है.

बीते आठ-नौ महीनों के दौरान बार-बार भाटिया को लखनऊ से संदेश दिया गया कि वे प्रदेश सरकार के मुकदमों की पैरवी पर ध्यान दें

सपा के एक नेता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की राजनीति में उनकी हद से ज्यादा सक्रियता उत्तर प्रदेश सरकार को रास नहीं आ रही थी. गौरतलब है कि भाटिया इस समय भी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सचिव हैं. जानकारों के मुताबिक बीते आठ-नौ महीनों के दौरान कम से कम तीन बार भाटिया को लखनऊ से सीधा संदेश दिया गया था कि वे बार एसोसिएशन की राजनीति में हद से ज्यादा शरीक होने की बजाय प्रदेश सरकार के मुकदमों की पैरवी पर ध्यान दें. लेकिन भाटिया इन संदेशों की लगातार अनदेखी कर रहे थे. इससे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उनसे बेहद नाराज थे.

बार की राजनीति में भाटिया की दिलचस्पी का नतीजा पिछले महीने एक अलग टकराव के रूप में सामने आया. भाटिया से टकराव के चलते सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने 15 फरवरी को इस्तीफा दे दिया था. दवे और भाटिया के बीच टकराव की खबर पहली बार तब सामने आई जब जस्टिस एमवाई इकबाल के फेयरवेल पार्टी से दुष्यंत दवे अनुपस्थित रहे. हालांकि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ और वे एक बार फिर से इस पद पर वापस आ गए हैं.

समाजवादी पार्टी के सूत्रों के मुताबिक बार एसोसिएशन की इस जटिल राजनीति का विपरीत प्रभाव उत्तर प्रदेश सरकार के मुकदमों पर पड़ रहा था. दुष्यंत दवे के साथ हुए टकराव में देश के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने भी बयान दिया था कि उम्मीद है बार एसोसिएशन में चीजें जल्द ही सही हो जाएंगी.

बार में चीजें सही हो पाती उससे पहले ही भाटिया के लिए चीजें खराब हो गईं. समाजवादी पार्टी के सूत्रों की मानें तो बार एसोसिएशन की राजनीति तो उन्हें हटाने का मौका भर बना. इसके काफी पहले से उनके जाने की भूमिका तैयार हो चुकी थी.

लोकायुक्त के मामले में जिस तरह से उत्तर प्रदेश सरकार की छीछालेदर हुई उससे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव काफी खफा थे. सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए खुद ही उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति कर थी. 16 दिसंबर को फैसला लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस विरेंद्र सिंह को उत्तर प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था. इस नियुक्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायादीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने सवाल खड़ा किया तो सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को जस्टिस संजय मिश्रा को उत्तर प्रदेश का नया लोकायुक्त नियुक्त कर दिया. इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की राष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त किरकिरी हुई.

लोकायुक्त के मामले में जिस तरह से उत्तर प्रदेश सरकार की छीछालेदर हुई उससे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव काफी खफा थे

इसी समय के आस पास अगस्त महीने में उत्तर प्रदेश सरकार का एक और मामला सुप्रीम कोर्ट में औंधे मुंह गिरा. यह मामला नोएडा के पूर्व चीफ इंजीनियर रहे यादव सिंह की सीबीआई जांच का था. भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे यादव सिंह की सीबीआई जांच का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया था. इसे रुकवाने के लिए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची. सुप्रीम कोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए सीबीआई जांच को हरी झंडी दिखाई कि एक अधिकारी की जांच रुकवाने के लिए राज्य सरकार इतनी परेशान क्यों है.

गौरतलब है कि यादव सिंह की बेनामी कंपनियों में समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेता और मुलायम सिंह के भाई राम गोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव और उनकी पत्नी का भी नाम उछल चुका है.

इन तमाम असफलताओं के बाद से ही गौरव के रिश्ते लखनऊ से तल्ख हो चले थे. एएजी के पद पर गौरव की नियुक्ति को लेकर भी तमाम तरह की कहानियां हैं. मसलन क्या गौरव को यह पद उनकी योग्यता के आधार पर मिला था? मुलायम सिंह के परिवार के एक करीबी नेता बताते हैं, 'गौरव के पिता वीरेंद्र भाटिया मुलायम सिंह के करीबी हुआ करते थे. मुलायम सिंह ने उन्हें भी एडवोकट जनरल बनाया था. उनकी मृत्यु कैंसर से हुई. लिहाजा मुलायम सिंह ने कम उम्र गौरव की देखरेख का जिम्मा उठा लिया. जब 2012 में उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार बनी तो उन्होंने अपने पुराने दोस्त के बेटे को एएजी बनाकर उपकृत किया.'

गौरव के पिता वीरेंद्र भाटिया मुलायम सिंह के करीबी हुआ करते थे. मुलायम सिंह ने उन्हें भी एडवोकट जनरल बनाया था

यह तथ्य भी दिलचस्प है कि एएजी का पद संवैधानिक पद है. इस पर बैठे व्यक्ति का काम कोर्ट में सरकार के कानूनी पक्ष को रखना होता है. लेकिन गौरव भाटिया के आने के साथ ही यह पद भी राजनैतिक नियुक्ति का जरिया बन गया. इस पर बैठा व्यक्ति पार्टी प्रवक्ता की तर्ज पर हर टीवी, हर अखबार में पार्टी के हर सही गलत फैसले का बचाव करने लगा.

समाजवादी पार्टी के अंदर चल रही खबरों की माने तो गौरव भाटिया को उनके पद से हटाया गया है क्योंकि वे अपनी भूमिका सही तरीके से अंजाम नहीं दे पा रहे थे. लेकिन मुलायम सिंह और उनके चलते पार्टी का अभी तक उनसे पूरी तरह मोहभंग नहीं हुआ है. पार्टी की लीगल सेल के अध्यक्ष वो अभी भी हैं. भविष्य में शायद उन्हें उत्तर प्रदेश की विधान परिषद भी भेजा जा सकता है. यह सब हो सकता है क्योंकि मुलायम सिंह उन्हें चाहते हैं, पुराने संबंधों के नाते. अखिलेश यादव इस तरह के किसी नैतिक दबाव में नहीं हैं.
First published: 28 March 2016, 9:08 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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