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आईसीएचआर प्रमुख के इस्तीफे के पीछे का सच

सौम्या शंकर | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • सुदर्शन राव ने \'निजी\' कारणों का हवाला देते हुए पिछले साल नवंबर महीने में अपने पद से इस्तीफा दिया था. मीडिया में यह खबर आई कि वह प्रति माह 1.5 लाख रुपये मानदेय नहीं दिए जाने के फैसले से नाराज चल रहे थे. राव ने आधिकारिक तौर पर विज्ञप्ति जारी कर इसका खंडन किया. 
  • आईसीएचआर उस वक्त विवादों में आ गया जब राव ने भारत में जाति व्यवस्था की तारीफ की. राव भारतीय इतिहास को फिर से लिखे जाने को लेकर काफी मुखर रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता को साबित करना चाहते हैं.

पिछले साल नवंबर में वाई सुदर्शन राव ने इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे दिया था. उन्हें बतौर चेयरमैन काम करते हुए महज 16 महीना ही हुआ था. मीडिया में उनके इस्तीफे की जोर-शोर से चर्चा हुई. लेकिन जिस एक बात की चर्चा नहीं हुई वह यह रही कि उन्होंने 'इस्तीफे' के तीन-चार दिन बाद ही फिर से काम करना शुरू कर दिया.

राव ने सफाई देते हुए कहा कि उन्हें अपने इस्तीफे के बारे में शिक्षा मंत्रालय से कोई जवाब नहीं मिला और फिर इसके बाद उन्होंने काम जारी रखने का फैसला किया. शायद विरोध की वजह से वह आईसीएचआर के दिल्ली ऑफिस में बैठने की बजाए हैदराबाद से काम कर रहे हैं.

राव ने 'निजी' कारणों का हवाला देते हुए पिछले साल नवंबर महीने में अपने पद से इस्तीफा दिया था. मीडिया में इस बारे में यह खबर आई कि वह प्रतिमाह 1.5 लाख रुपये मानदेय नहीं दिए जाने के फैसले से नाराज चल रहे थे. राव ने आधिकारिक तौर पर विज्ञप्ति जारी कर इसका खंडन किया. 

राव ने कहा कि उन्होंने निजी कारणों से इस्तीफा दिया था और वह इसे सार्वजनिक तौर पर बताने को इच्छुक नहीं हैं.

इस्तीफा

यह जानने की जरूरत है कि आईसीएचआर का पद मानद पद होता है. ऐसे में आईसीएचआर के प्रमुख को सरकार से कोई तय वेतन नहीं मिलता है. इससे पहले के भी चेयरपर्सन को कोई मासिक वेतन नहीं मिला है और राव इस बात से अवगत थे.

पिछले साल 23 सितंबर को आईसीएचआर के जनरल काउंसिल की 81वीं बैठक में राव को मानदेय देने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया. प्रस्ताव को शिक्षा मंत्रालय को भेज दिया गया और चूंकि यह बैठक उनकी चेयरमैनशिप को लेकर था इसलिए वह इस बैठक में शामिल नहीं हुए.

हालांकि रिकॉर्ड में किसी निश्चित रकम के बारे में जानकारी नहीं है लेकिन मीडिया में आई खबरों के मुताबिक काउंसिल ने राव के लिए प्रति माह 1.5 लाख रुपये की मांग की थी. सार्वजनिक तौर पर दिए गए बयान में राव ने स्वीकार किया कि उन्होंने 'शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी से बीच में ही पद छोड़ कर जाने की वजह से सरकार को हुई असुविधा के लिए माफी मांग ली है.' 

प्रेस को जारी किए गए बयान में उन्होंने कहा, 'मैंने हमारे प्रिय नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के तहत आईसीएचआर का चेयरपर्सन बनाए जाने का आभार व्यक्त करते हुए शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी को निजी कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा भेजा था.' उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्हें शिक्षा मंत्रालय की तरफ से इस्तीफा खारिज किए जाने या स्वीकार किए जाने का कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि यह समझना मुश्किल है कि आखिर क्यों राव ने आईसीएचआर के चेयरमैन के पद से इस्तीफा देने के बाद फिर से काम करना शुरू कर दिया है. जब हमने इस बारे में राव से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि वह बेहद 'सक्रियता' के साथ काम कर रहे हैं.

राव ने कैच को बताया, 'काम पर वापस आने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि मुझे शिक्षा मंत्रालय की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला. मैं तब तक काम करता रहूंगा.' उन्होंने कहा कि वह इस्तीफा देने के बाद एक ब्रेक पर चले गए थे और अब वह काम पर फिर से वापस आ गए हैं.

वहीं आईसीएचआर  में काम कर रहे उच्च पदस्थ सूत्र ने बताया कि राव ने कुछ दिनों बाद ही अपना इस्तीफा वापस ले लिया था.

अभी तक कैसा रहा कार्यकाल

राव को चेयरपर्सन बनाए जाने को लेकर काफी विवाद हुआ क्योंकि वह आरएसएस के करीब रहे हैं. तब से लेकर आईसीएचआर अक्सर विवादों में रहा है. इतिहासकारों का कहना है कि काउंसिल अप्रत्याशित तौर पर दक्षिणपंथियों की तरफ झुकी है.

नियुक्ति से पहले राव काकातिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. वह आखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के आंध्र चैप्टर के भी प्रमुख रह चुके हैं जो आरएसएस की सहायक संस्था है. चेयरपर्सन बनाए जाने के तत्काल बाद ही उन्होंने परिषद के लिए संघ परिवार के कुछ लोगों का नाम सुझाया था.

जानकारों का कहना है कि राव के पास आईसीएचआर का चेयरपर्सन बनने की पर्याप्त काबिलियत नहीं है. राव के इस्तीफा देने से पहले आईसीएचआर में पर्याप्त बदलाव हो चुका है.

पहला बदलाव तब हुआ जब उन्होंने इंडियन हिस्टोरिकल रिव्यू जर्नल की 22 सदस्यीय सलाहकार बोर्ड को भंग कर दिया. इस बोर्ड में रोमिला थापर, सतीश चंद्रा, इरफान हबीबी और मुजफ्फर आलम जैसे इतिहासकार शामिल थे. इससे महीने भर पहले ही इसके चीफ एडिटर सब्यसाची भट्टाचार्य ने इस्तीफा दे दिया था. बाद में राव से मतभेदों की वजह से आईसीएचआर के सेक्रेटरी गोपीनाथ रविंद्रन ने भी इस्तीफा दे दिया.

आईसीएचआर उस वक्त विवादों में आ गया जब राव ने भारत में जाति व्यवस्था की तारीफ की. राव भारतीय इतिहास को फिर से लिखे जाने को लेकर काफी मुखर रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता को साबित करना चाहते हैं.

First published: 28 January 2016, 11:05 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

संवाददाता, कैच न्यूज़. राजनीति, शिक्षा, कला, संस्कृति और फोटोग्रॉफी में रुचि.

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