Home » इंडिया » difficult phase is ahead for Amit Shah
 

अमित शाह ने आसान चुनौती पार कर ली है, कठिन चुनौती से पार पाना बाकी है

अतुल चौरसिया | Updated on: 25 January 2016, 23:21 IST

रविवार को दिल्ली के 11 अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय में जब राजनाथ सिंह ने अमित शाह को अगले तीन साल के लिए अध्यक्ष पद पर मनोनीत होने की बधाई दी तब दर्शकों के बीच खड़े एक भाजपा नेता की त्वरित टिप्पणी थी, 'अध्यक्ष बनना तो सबसे आसान काम था. असली चुनौती इस कार्यकाल को सफल बनाने की होगी.'

अमूमन यही राय ज्यादातर लोगों की है. जिस तरह की पार्टी में भाजपा पिछले डेढ़ सालों में तब्दील हुई है, उसमें मोदी और शाह की जोड़ी के लिए अध्यक्ष पद हासिल करना बहुत आसान था. शाह का पिछला 18 महीने का अध्यक्षीय कार्यकाल मिला जुला रहा है.

उनके अधीन भाजपा हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड के साथ ही जम्मू और कश्मीर में भी साझे की सरकार बनाने में सफल रही. लेकिन अमित शाह का उत्तरार्ध उनके पूर्वार्ध जितना चमकीला नहीं है. उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा को दिल्ली और बिहार में ऐतिहासिक हार का भी सामना करना पड़ा है.

'अध्यक्ष बनना तो सबसे आसान काम था. असली चुनौती इस कार्यकाल को सफल बनाने की होगी'

इन नतीजों के बरक्श देखें तो आने वाला समय भाजपा और अमित शाह के लिए कुछ फौरी और कुछ दीर्घकालिक चुनौतियां लिए खड़ा है.

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री गंगटोक की यात्रा पर थे. वहां फूलों की एक प्रजाति को नमो नाम दिया गया. इस पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया थी, 'मैं कांटों के बीच रहता हूं. मुझे फूलों की तरह न सहेजिए.' आने वाला समय प्रत्यक्ष रूप से अमित शाह के लिए कांटों भरा होने की संभावना है लेकिन परोक्ष रूप से इन फूल और कांटों का असर नरेंद्र मोदी तक हर हाल में जाएगा.

मोदी एक चुकी हुई करेंसी

यह पहली और बड़ी चुनौती अमित शाह के सामने है. विशेषकर तब जब आने वाले दो-तीन महीनों के भीतर चार महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं. अमित शाह की समस्या एक ऐसे व्यक्ति के जैसी है जिसने अपनी सारी जमापूंजी एक ही बैंक में जमा कर दी थी और वह बैंक ही बैंकरप्ट हो गया.

बिहार के चुनावों में उन्होंने जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार के सामने खड़ा किया वह लोगों को अब तक खटकता है. गली-नुक्कड़-चौराहों पर जिस तरह से प्रधानमंत्री की सभाएं हुईं वह प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुकूल नहीं कही जाएगी. कोढ़ में खाज यह कि इसके बावजूद भाजपा बुरी तरह हार गई.

इस लिहाज से अमित शाह के सामने अगले कार्यकाल में दोहरी चुनौती है. एक तो उन्हें अपने सबसे मजबूत दांव (मोदी) को उस छवि से बचाए रखना है कि मोदी अब चुका हुआ हथियार हैं साथ ही उन्हें इसी दौरान कुछ ऐसे चेहरे भी ढूंढ़ने होंगे जिन पर वे मोदी के अलावा भी दांव आजमा सकें.

बिहार के चुनावों में जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीतीश कुमार के सामने खड़ा किया वह लोगों को अब तक खटकता है

खुद उनकी रणनीतिक कुशलता पर भी सवाल उठने लगे हैं. लोकसभा चुनाव में जिस तरह की सफलता का श्रेय उन्हें दिया जाता है उस तरह की सफलता वाले कई और नेता भी भाजपा में हैं. चाहे वो वसुंधरा राजे सिंधिया हों, शिवरज सिंह चौहान हों या रमन सिंह. ये सभी नेता कहीं न कहीं वही काम सफलतापूर्वक दोहरा चुके हैं जो सफलता अमित शाह के नाम दर्ज है. अगर अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में 71 सीटें दिलायी तो राजस्थान में वसुंधरा और मध्य प्रदेश में शिवराज की लोकसभा में सफलता सौ फीसदी के आस-पास है.

पार्टी के अंदर इस बात की उम्मीद है कि अगले कार्यकाल में अमित शाह अपनी शैली को छोड़ कर दोबारा से पुराने ढर्रे पर लौटेंगे और विधानसभा चुनावों में स्थानीय चेहरों को आगे रखकर चुनावी वैतरिणी पार करने की कोशिश करेंगे. इससे उनके पास लगातार अवमूल्यन का शिकार हो रही मोदी करेंसी को बचाने का एक अवसर रहेगा और साथ ही चुनावी हार की स्थिति में ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने की आसानी भी रहेगी. बिहार चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा को ठीकरा फोड़ने के लिए एक अदद सिर की भारी समस्या पेश आई थी.

मजबूत शरीर, मंद दिमाग

अमित शाह के समय में भाजपा के साथ यह तमगा भी जुड़ा है कि पार्टी दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक संगठन बन गया है. हम इस दावे को सच मानते हुए आगे बढ़ते हैं. पार्टी दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक संगठन बन गई है लेकिन पार्टी में मुद्दों, विषयों और दैननंदिन उठापटक से संभालने वाले समझदार, गंभीर लोगों की संख्या सिमट गई है.

पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कुछ दिन पहले कहा था कि भाजपा ने 70 से पार वालों को ब्रेन डेड घोषित कर दिया है. इस बात को आगे बढ़ाते हुए एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, 'अमित शाह के आने से पार्टी शारीरिक तौर पर तो हृष्ट-पुष्ट हुई है लेकिन मानसिक रूप से कमजोर हो गई है. तमाम ऐसे अवसर आए हैं जब पार्टी चौतरफा घिरी हुई थी, लेकिन उसे बचाने के लिए कोई भी सामने नहीं आया. या तो ये लोग शाह-मोदी से खफा है या फिर उन्हें पार्टी ने दरकिनार कर रखा है.'

उनका इशारा हाल ही में हैदराबाद युनिवर्सिटी में आत्महत्या करने वाले छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की तरफ था. इस मामले में एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी की भूमिका पर सवाल उठ रहे थे. दो दिन तक कोई भी वरिष्ठ नेता अपने मंत्री और सरकार की इस किरकिरी पर बचाव के लिए सामने नहीं आया. गौरतलब है कि ईरानी को प्रधानमंत्री का विश्वासपात्र नेता माना जाता है. अंतत: दो दिन बाद ईरानी को अपने बचाव में खुद उतरना पड़ा.

तमाम ऐसे अवसर आए हैं जब पार्टी चौतरफा घिरी हुई थी, लेकिन उसे बचाने के लिए कोई भी सामने नहीं आया

यही स्थिति महीना भर पहले पार्टी में नंबर दो माने जाने वाले अरुण जेटली के सामने पेश आई. उनके ऊपर डीडीसीए में भ्रष्टाचार के आरोप लगे तब उनकी वरिष्ठता के बावजूद कोई नेता खुलकर उनके बचाव में नहीं उतरा. मजबूरन प्रधानमंत्री को जेटली के बचाव में उतरना पड़ा.

पार्टी में मोदी-जेटली-शाह का जो त्रिगुट है उसके खिलाफ कसमसाहट चल रही है. नए कार्यकाल में अमित शाह को इस संकट से पार पाना बड़ी चुनौती होगा. खुद शाह की कार्यशैली को लेकर भी पार्टी काडर में नकारात्मक सोच है. स्थानीय नेताओं को दरकिनार करके अपनी चाल चलना लोगों को लंबे समय तक नहीं भाएगा.

भाजपा की वाराणसी इकाई के एक नेता (प्रधानमंत्री का निर्वाचन क्षेत्र) के साथ हुई एक घटना दिलचस्प है. नाम न छापने की शर्त पर वे बताते हैं, '2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जब मोदीजी बनारस से पर्चा दाखिल करने वाले थे उससे ठीक पहले अमित शाह बनारस दौरे पर आए थे. उन्होंने मुझे बाबतपुर हवाई अड्डे पर मुलाकात के लिए बुलाया. हम वहां पहुंचे. लॉबी में अमित शाह ने एक मिनट के लिए नाम पूछने की औपचारिकता निभाई और उसके बाद अगले 40-45 मिनट तक वे अखबार में मुंह घुसाकर पढ़ते रहे. उन्होंने अपने मुंह से अखबार हटाया तक नहीं. इसके बाद हम उठे और वापस आ गए. तब और अब में बड़ा फर्क है. तब मोदी की भीषण लहर थी अब ऐसा करेंगे तो स्थानीय ईकाई के नेता भितरघात कर सकते हैं.'

अमित शाह की इस शैली की आलोचना बिहार चुनाव के दौरान भी हुई. खैर वहां तो वे मात भी खा गए.

कुछ चुनावी चुनौतियां

आने वाले एक साल में शाह को बार-बार चुनावी रूप से साबित करना है. सबसे पहले दो महीने के भीतर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पांडिचेरी की चुनौती है. केवल असम को छोड़ दिया जाय तो बाकी सभी जगहों पर भाजपा की संभावनाएं शून्य हैं.

पार्टी के एक नेता बताते हैं, 'बंगाल में अगर पार्टी दहाई संख्या तक पहुंच जाती है तो यह अमित शाह के लिए भी बड़ी बात होगी. बाकी तमिलनाडु और केरल में भाजपा का दांव कभी भी मजबूत नहीं रहा है. ले देकर असम है जहां से कुछ उम्मीदें थीं. लेकिन जो अंदरूनी सर्वे के संकेत हैं वो निराशाजनक हैं. कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच अगर कुछ नहीं होगा तो पार्टी असम में भी हाशिए पर चली जाएगी.'

इन चारों राज्यों में भाजपा के खराब प्रदर्शन के बावजूद शाह की सेहत पर कोई खास असर शायद ही पड़े. उनके पास तर्क है कि भाजपा इन राज्यों में कभी भी बड़ी हैसियत नहीं रही. शाह की असली परीक्षा 2017 के शुरुआत में होगी. तब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर के विधानसभा चुनाव होने हैं. केवल मणिपुर को छोड़ दें तो बाकी सभी राज्यों में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर होगा.

बीते दो साल के दौरान पहली बार किसी समारोह में नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद के नारे लगे हैं

उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां से पार्टी के पास लोकसभा में सबसे ज्यादा 71 सांसद हैं. यह संख्या अपने आप में अमित शाह के ऊपर दबाव बनाने के लिए पर्याप्त है. तब अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे अब भाजपा के अध्यक्ष हैं. ऐसे में विधानसभा चुनाव में सफलता को दोहराने का दबाव दोहरा होगा.

एक बार हम उत्तर प्रदेश की मौजूदा स्थितियों के बरक्श भाजपा के प्रदर्शन की समीक्षा करते हैं. बीते दो साल के दौरान पहली बार किसी समारोह में नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद के नारे लगे हैं. यह घटना लखनऊ स्थिति आंबेडकर युनिवर्सिटी की है. प्रधानमंत्री वहां दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेने पहुंचे थे. वहां छात्रों के एक समूह ने मोदी मुर्दाबाद और मोदी गो बैक के नारे लगाए. प्रधानमंत्री इस विरोध के सुर से अचकचा गए थे. काफी देर तक वे कुछ बोल भी नहीं पाए. बीते दो सालों में शायद वे इतने नकारात्मक नारों को भूल चुके होंगे. यानि दो सालों में बहुत कुछ बदल चुका है.

पंजाब से भी भाजपा-अकाली गठबंधन के लिए अच्छी खबरें नहीं आ रही हैं. उत्तराखंड की सभी लोकसभा सीटें भी भाजपा के पास हैं. ऐसे में इन राज्यों के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव रहेगा.

बिखरता दलित समीकरण

रोहिता वेमुला की मौत ने बीते डेढ़ सालों में पनपे भाजपा और संघ के दलितप्रेम को जबर्दस्त धक्का पहुंचाया है. पार्टी और संगठन में इस बात को लेकर काफी चिंता का माहौल है. आंबेडकर के जन्मदिवस को राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित करके भाजपा ने दलितों से जुड़ने की दिशा में गंभीर कोशिश की थी. लेकिन रोहित की मौत से वह तार-तार हो गया है. अमित शाह इस चुनौती से कैसे निपटेंगे?

संघ जिसे ब्राह्मणवादी संगठन कहा जाता है उसने भी बीते दिनों में खुद के भीतर बड़ा बदलाव लाते हुए आंबेडकर और दूसरे दलित महापुरुषों के साथ खुद को जोड़ा था. संघ प्रमुख मोहन भागवत गाहे-बगाहे आंबेडकर को याद करते रहे. संघ ने देश भर के स्वयंसेवकों को यह आदेश जारी किया कि वो दलितों के यहां प्रवास करें, उनके साथ खानपान का रिश्ता जोड़ें.

इसी दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रिजर्वेशन की समीक्षा करने का बयान भी दिया जिस पर काफी हो-हल्ला मचा. नतीजतन उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया. अब भागवत का मानना है कि देश में जब तक ऊंच-नीच है तब तक रिजर्वेशन रहेगा. कहा जाता है कि इस बयान के चलते भी बिहार में भाजपा की मिट्टीपलीद हुई थी. दलित कवि अकेला इसे संघ का दलित प्रेम नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में सत्ता पर काबिज होने की तरकीब मानते हैं.

रोहिता वेमुला की मौत ने बीते डेढ़ सालों में पनपे भाजपा और संघ के दलितप्रेम को जबर्दस्त धक्का पहुंचाया है

इसी दौरान संघ के मुखपत्र पांचजन्य में आंबेडकर पर आधारित 200 पन्नों का विशेषांक भी निकाला गया. लेकिन हैदराबाद में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद यह बात बार-बार उठ रही है कि संघ और भाजपा मूलत: दलित विरोधी हैं. विशेषकर जिस आंबेडकर की विरासत को भाजपा कब्जा करना चाहती है उसी आंबेडकर के नाम पर बने छात्र संघठन को भाजपा नेता बंडारू दत्तात्रेय ने देशद्रोही करार दिया.

अमित शाह के सम्मुख दलितों के साथ बुरी तरह से गड़बड़ा चुके इस समीकरण को फिर से सुधारने की महति चुनौती भी होगी. वरना उनका यूपी का मिशन 2017 औंधे मुंह गिर सकता है.

और अंत में

बुजुर्गों (मार्गदर्शक मंडल) की नाराजगी शाह और मोदी के गले की फांस बन सकती है. बिहार चुनाव के नतीजों के बाद इसकी एक झलक दिखी थी. बाद में जब कीर्ति आज़ाद को पार्टी से निकाला गया तब भी बुजुर्गों ने बैठक की. अब जब रविवार को अमित शाह की ताजपोशी हुई है तब सारे बुजुर्ग एक बार फिर से नदारद थे.

अटकलें है कि शाह की ताजपोशी को बुजुर्गों का आशीर्वाद नहीं मिल पाया है. अगर ऐसा है तो अमित शाह के लिए कई मोर्चे से खतरा है. बुजुर्गों के नेपथ्य में जाने से पार्टी की अनुभवहीनता सतह पर आ गई है. अमूमन हर मुद्दे पर पार्टी घिर जाती है और कायदे से उसका बचाव करने के लिए लोग नहीं मिलते.

सरकार संसद में एक भी बिल पास करवाने की स्थिति में नहीं है. आज की तारीख में पार्टी के पास अटल या आडवाणी जैसा कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी सभी पार्टियों में स्वीकार्यता हो. सरकार की इस नाकामी का असर चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर भी पड़ना तय है.

अमित शाह ने फूलों की सेज पार कर ली है, कांटो का पथ आगे है.
First published: 25 January 2016, 23:21 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

पिछली कहानी
अगली कहानी