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बिहार की बाढ़ पर कूटनीति का ‘बैराज’

व्यालोक | Updated on: 3 September 2016, 7:33 IST
(गेट्टी इमेजेज़)

अखबारों और न्यूज़ चैनल की हेडिंग्स चल रही है, ‘1975 के बाद की सबसे भीषण बाढ़..’ लेखक इन शीर्षकों को देखकर अपने बचपन में लौटता है और बाढ़ की पुरानी तस्वीरों को याद करने की कोशिश करता है. वह 1986-87 की बाढ़ में अपने बचपन को लोटते भुगत चुका है. 

समस्तीपुर में बाढ़ की विभीषिका का आंखों देखा हाल जानने हम निकल पड़ते हैं, सबसे अधिक पीड़ित मोहिउद्दीननगर और मोहनपुर की ओर. वैसे तो, समस्तीपुर की लगभग 34 पंचायतें बाढ़ से प्रभावित हैं, लेकिन कुल चार प्रखंडों में बाढ़ की स्थिति भयावह है.

हमारे एक मित्र वहां अपने दम पर राहत कार्य चला रहे हैं. उनसे ही जायजा मिलता है कि सरकारी अमला अपनी रवायतों के मुताबिक ही काम कर रहा है. मुख्य सड़क से दोनों ओर फैले खेतों में पानी तो पसरा हुआ मिलता है, लेकिन बाढ़ की विभीषिका नहीं दिखती. जब मुख्य सड़क को छोड़कर गांवों में घुसते हैं, तो बाढ़ का मंज़र दिखता है.

चारों ओर बाढ़ का पानी, बीच-बीच में मरी हुई गाएं. ये गाएं उन किसानों की है, जो यह सोचकर गए थे कि पहले राउंड में तो अपनी बाकी वस्तुएं बचा लें, फिर मवेशी ले जाएंगे. उनकी वापसी तक पानी इतना बढ़ चुका था कि वे लौट कर नहीं आ सके. खड़ी गाएं, बकरी और बाकी पशु अब मर चुके हैं, उनकी लाशें सड़ रही हैं.

चारों तरफ हरे और पीले रंग का पानी है. गंगा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, बागमती सबका पानी मिलकर एकमेक हो गया है. रास्ते में किसी के घर का छप्पर, तो किसी के घर का बर्तन बहता हुआ दिख रहा है. जहां-तहां ऊंची जगहों पर लोग मदद के आसरे में टिके हुए हैं. 

सरकारी राहत दूर-दूर तक नहीं दिख रही है. हमारे साथ चल रहे 'पैक्स' के अध्यक्ष कुणाल कुमार कहते हैं, ‘भाईसाब, राहत के साथ यही तो मज़े की बात है. सारी राहत बांधों और ऊंची जगहों पर चलती रहती है. उसमें भी होड़ इसी बात की होती है कि कब ये राहत-शिविर वाले अपने घरों में लौट जाएं. अब, इन अंदर के इलाकों में तो लोग पहुंचते ही नहीं और सारी मदद की असली जरूरत यहीं होती है.’

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बहरहाल, समस्तीपुर के दो प्रखंडों में हालात बेहद खराब हैं और दो प्रखंडों में खराब. वैसे, विद्यापतिनगर में महज दो पंचायतों में पानी घुसा है, लेकिन सरकार ने पूरे प्रखंड को बाढ़ग्रस्त घोषित कर दिया है. मुस्कुराते हुए कुणाल हमें याद दिलाते हैं कि बाढ़ पूरे बिहार में राजनीति का प्रतीक है और यहां बाढ़ कभी खत्म नहीं होगी. 

वह कहते हैं, ‘सर बाढ़ यहां कई के लिए मरण का सवाल है, तो कई के लिए जीवन का भी. बाढ़ राहत तो एक सनातन सरकारी व्यवस्था का भी हिस्सा है. सभी सरकारें उपाय जानते हुए भी नहीं करेंगी, क्योंकि उपाय का मतलब है, राजनीति खत्म.’

उनके ही दिए सूत्र को पकड़ते हुए हमें नीतीश कुमार का एक और चेहरा याद आता है. महज आठ साल पहले कोसी-त्रासदी के समय गुजरात के तत्कालीन सीएम ने बिहार को सहायता राशि भेजी थी, वह राशि नीतीश कुमार ने लौटा दी. 

फिलहाल वे देश के प्रधानमंत्री से सहायता मांगने दिल्ली पहुंचे. दिल्ली तो पहुंचे ही, उस पर कोई बहस भी नहीं, लेकिन वहां फरक्का बराज को तोड़ने की बात कहकर एक नया राजनीतिक बवाल भी शुरू कर दिया. यह फरक्का विरोध नीतीश कुमार के इंजीनियर का, प्रशासक का पुनर्जागरण था, या फिर महज एक राजनीतिक स्टंट?

पटना के दीघा घाट की ओर जब आप बढ़ते हैं, तो भैंस, आदमी, औरतें, बच्चे, साइकिल, रिक्शों की अजीब सी रेलमपेल, पसीने का भभका और शोरोगुल आपका स्वागत करता है. एक मरियल सा बैनर दिखता है, जो बाढ़ पीड़ितों के लिए शिविर की घोषणा करता है. 

वहीं, पास में कुछ पुलिसवाले बैठे सुस्ता रहे हैं. यहां लोगों के लिए बाढ़ विभीषिका नहीं, मनोरंजन और उद्यम का साधन है. कुछ युवा गंगा के पानी में मछली तलाश रहे हैं, तो कुछ ने बाढ़-टूरिज्म का फायदा उठाते हुए सिगरेट, समोसे की दुकान खोल चुके हैं.

शायद, नीतीश भी सच बोल रहे होंगे, जब वह कहते हैं कि फरक्का बराज को तोड़ देना चाहिए

हमारे साथ यूनिसेफ के एक बड़े अधिकारी हैं, हम अभी-अभी बालश्रम के विरोध में हुए एक सेमिनार से लौटे हैं, इसलिए एकदम ‘ताज़ा मानवतावादी’ हैं. जब हम ऊपर (नए रेलवे-ट्रैक पर) चढ़कर चींटीनुमा लोगों को और गंगा की उद्दाम लहरों को देखते हैं, तो च्च..च्च...च्च..के वांछित टेक के बाद हमारे मित्र कहते हैं, ‘महाराज, लालू त ठीके न कहा था. गंगा माई तो बस अपना ओसारा देखने आई है. अब सब गंगा के पेटी में जाके बइठ जाएगा, तो गंगा कहां जाएगी?'

गंगा कहां जाएगी? यह सचमुच एक बड़ा सवाल है और लालूजी सच बोलते हैं, यह भी एक सामान्य सच है. वह तब भी सच बोल रहे होते हैं, जब इस बाढ़ को अपनी मसखरी में उड़ाते हुए वह कहते हैं कि यह तो गंगा माइ सबसे मिलने, सबको प्रसाद देने चली आयी हैं. 

शायद, नीतीश भी सच बोल रहे होंगे, जब वह कहते हैं कि फरक्का बराज को तोड़ देना चाहिए. लेकिन, और यह एक बड़ा लेकिन है. नीतीश के फरक्का विरोध का एक प्रतीकात्मक विरोध है, क्योंकि केंद्र सरकार गंगा में फरक्का जैसे 27 बराज और बनाने की तैयारी कर रही है. फरक्का और टिहरी के अलावा भी गंगा में दो और बराज बन चुके है. यही राजनीति का फर्क है और यही सत्ता और विपक्ष का फर्क है.

नीतीश कुमार के इस राजनीतिक स्टंट को प्रख्यात पर्यावरणविद् (व बाढ़ मुक्ति अभियान के पूर्व संयोजक) दिनेश मिश्र साफ शब्दों में खोल भी देते हैं, ‘देखिए, नीतीश केंद्र सरकार में कृषिमंत्री, रेलमंत्री रह चुके हैं. विधायक और मुख्यमंत्री हैं, तो ऐसा नहीं है कि उनको अचानक से सच्चाई का पता चला है. वह तो कोसी को कई दशक से देख रहे हैं, वह बस गेंद केंद्र के पाले में धकेल रहे हैं. उनका प्रस्ताव बहुत अच्छा है, टाइमिंग खराब है.’

उनकी ही बात का भाष्य करें, तो यह समझ में आता है कि फरक्का लंबे ससमय से समस्या की जड़ बना हुआ है, उसके बाद नीतीश केंद्र में मंत्री भी थे, बहुत कुछ करने की हालत में, फिर उनको कुछ याद क्यों नहीं आया?

फरक्का पर सियासत

नीतीश की इस टाइमिंग का राज़ एक पत्रकार खोलते हैं. वह कहते हैं, ‘आप नाहक ही इस मुद्दे को केवल फरक्का या बिहार की बाढ़ के संदर्भ में देख रहे हैं. देखिए, नीतीश को नरेंद्र मोदी का जवाब बनना है और यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी उन्होंने स्वयंभू तरीके से ओढ़ ली है. अब देखिए, बांगलादेश के साथ भारत की दो मुख्य समस्याएं क्या हैं? एनक्लेव (ज़मीन) और फरक्का ही न... अब ज़मीन का मुद्दा चूंकि मोदी ने बहुत सफलतापूर्वक सुलझा लिया, तो फरक्का की जिम्मेदारी तो नीतीश पर ही आती है न!’

उनकी हास्य में कही गयी इस गंभीरतम बात को समझें तो नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि फरक्का राष्ट्रीय तो छोड़िए, अंतरराष्ट्रीय मुद्दा भी है. आखिर, बांगलादेश अपने जन्म के समय से ही अपने यहां की 54 नदियों के रोकने और भारत पर उसकी मर्जी के मुताबिक बाढ़-सूखा पैदा करने का आरोप तो लगाता रहा है. बिहार के मुख्यमंत्री जानते हैं कि फरक्का को तोड़ा नहीं जा सकता, इसलिए बयानबाजी से भला जाता ही क्या है?

वैसे, दिनेश मिश्र की मानें तो समस्या न तो पानी की है, न उसके फैलाव की है. समस्या सिल्ट यानी गाद की है. इसीलिए, वह नदियों के अविरल प्रवाह को बेहद ज़रूरी मुद्दा मानते हैं, हालांकि, नीतीश कुमार पर तंज कसने से भी नहीं चूकते, ‘अब तो नदी-जोड़ो योजना भी आ रही है, और वह तो शुरू ही उस एनडीए में हुई जिसमें नीतीश मंत्री थे.’ 

वह कहते हैं कि नीतीश ने मौके को देखकर बिल्कुल सही मसला पकड़ लिया है, जिसका ज़मीन पर राज्य की जनता को भले फायदा न हो, उनको राजनीतिक फायदा जरूर हो जाएगा. सवालिया निशान में मिश्र कहते हैं, ‘गंगा हो या कोई भी नदी, उसकी अविरलता को कायम रखना बहुत जरूरी है, लेकिन नीतीश कुमार अपने राज्य की नदियों की अविरलता की बिलकुल फिक्र नहीं करते. कोसी, कमला, बागमती, गंडक जैसी तमाम नदियां तटबंधों की वजह से सिल्ट से भरी है. और तो और, गंगा नदी भी तटबंधों से घिरी है. इनका समाधान तो आपके ही हाथ में है.’

नीतीश कुमार खुद को राष्ट्रीय राजनीति में विकल्प के तौर पर खड़ा करने के लिए हर तरह से तैनात हैं. उन्हें कोई भी मौका दिखे, वह भुनाने से नहीं चूकते. राज्य की फिक्र उन्होंने गठबंधन की सरकार पर छोड़ दी है. मज़े की बात है कि बाढ़-बाढ़ के शोर में लोग यह भूल चुके हैं कि राज्य के लगभग डेढ़ दर्जन ज़िलों में सूखा भी पड़ा है और खाद्यान्न का उत्पादन न्यूनतम होने वाला है.

...अचानक, ही पुलिस वाले रेलवे पुल पर जमा लोगों को खदेड़ने लगते हैं, जो हमारे साथ ही गंगा का नज़ारा लेने पुल और पटरी पर आकर खड़े हो गए थे. हम भी अपने वर्तमान में लौटते और चौंकते हैं. मुझे लगता है, गंगा भी तो यही कर रही हैं, उनकी पेटी और गोद में बैठे लोगों को खदेड़ ही तो रही है.

First published: 3 September 2016, 7:33 IST
 
व्यालोक @catchhindi

आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई करके 13 सालों तक मुख्यधारा की पत्रकारिता की. अब स्वतंत्र पत्रकारिता और बागवानी करते हैं.

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