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'सहनशीलता सिंधु घाटी सभ्यता की सीख है, इसका हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं है'

श्रिया मोहन | Updated on: 1 December 2015, 19:52 IST
QUICK PILL

पिछले हफ्ते हमने अंबेडकर जयंती और संविधान दिवस मनाया. धर्मनिरपेक्षता और संविधान में शामिल किए गए अन्य मूल्यों को लेकर गर्मागर्म बहस भी देखी.

धर्मनिरपेक्षता, सहनशीलता और हिंदू धर्म को लेकर कैच न्यूज की एसोसिएट एडिटर श्रिया मोहन ने मशहूर समाजशास्त्री आशीष नंदी से बातचीत की. सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता पर जारी मौजूदा बहस की जटिल परतों को समझने में इस बातचीत से मदद मिलेगी.

पढ़ें आशीष नंदी से कैच न्यूज़ की बातचीत के प्रमुख अंशः

धर्मनिरपेक्षता को लेकर हमारे सांसदों के बयान आ रहे हैं. आज के समय में सबसे ज्यादा दुरुपयोग किए जाने वाले शब्द कहने के अलावा गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि देश में सेक्युलर शब्द का अर्थ पंथनिरपेक्ष है न कि धर्मनिरपेक्ष. दोनों शब्दों में क्या अंतर है?

सेक्युलरिज्म एक विचार के तौर पर अधिकांश भारतीयों को समझ में नहीं आता है. यह महज एक जुमला है. संस्कृत में इसे धर्मनिरपेक्षता कहते हैं जिसका मतलब होता है कि आप सभी तरह के विचारों के प्रति न्यूट्रल होते हैं.

यह देखना दिलचस्प है कि राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि सेक्युलरिज्म का अर्थ पंथनिरपेक्षता होता है. आडवाणी भी यह बात पहले कह चुके हैं. इस परिभाषा के जरिए बीजेपी यह बताने की कोशिश कर रही है कि वह वास्तविक सेक्युलर पार्टी है न कि छद्म सेक्युलर. यह बात पचा पाना थोड़ा मुश्किल है.

पंथनिरपेक्षता का अर्ध है कि आप पंथों से निरपेक्ष या मुक्त हैं. यानी कि आप सभी तरह की आस्थाओं से समान दूरी बनाकर रहते हैं. धर्म वह है जिससे आप अपना नैतिक आचार-विचार तय करते हैं. इसका पालन करने के दौरान आप निरपेक्ष नहीं रह सकते. इसकी कुछ चीजें आपको स्वीकार्य हो सकती हैं, कुछ नहीं. एक गांधीवादी ने एक बार मुझे बताया था कि कोई शैतान ही पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हो सकता है.

यहां तक की जानवरों का भी अपना आचार-विचार होता है जिसे स्वधर्म कहा जाता है. एक सांप का स्वधर्म आपको डसना हो सकता है और एक बाघ का धर्म आपको मारना हो सकता है. स्वधर्म संस्कृति, समूह और व्यक्ति से मुक्त होता है. सभी का अपना आचार व्यवहार होता है और हमें उसके साथ रहना होता है.

एक स्टेट के तौर पर मैं कभी धर्म को लेकर निरपेक्ष नहीं हो सकता. सरकार का भी अपना एक धर्म होता है जिसे राष्ट्रधर्म कहते हैं. इसलिए इस मामले में मैं राजनाथ सिंह से कुछ हद तक सहमत हूं. धर्मनिरपेक्षता के बदले पंथनिरपेक्षता सेक्युलरिज्म को ज्यादा अच्छे से पारिभाषित करता है.

धर्म किसी व्यक्ति का निजी मामला होता है. और इसका इस्तेमाल आसानी से किसी हिंसा को न्यायोचित ठहराने के लिए किया जा सकता है. ऐसी कहानियां हैं कि नाजी नेता हिटलर हमेशा अपनी पॉकेट में चमड़े की जिल्द वाली गीता की कॉपी रखा करता था. उसने कहा कि धर्म निजी पसंद और नापसंद से ऊपर होता है जिसकी मदद से आप राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करते हैं. दुर्भाग्यवश उसने नरसंहार को अपनी ड्यूटी माना. धर्म के दर्शन में वहां आपको यह बताने वाला कौन होता है कि आप गलत हैं ?

हां, वह धर्म का विकृत रूप था. वह ऐसा धर्म था जिसे पूरी दुनिया में खासकर संघ परिवार से भी समर्थन मिला. बाल ठाकरे ने भी इसका समर्थन किया, कई और लोगों ने भी इसका समर्थन किया. वह इस बात को नहीं समझ सके कि हिटलर जो कर रहा था वह धर्म का विकृत रूप था.

धर्म अपने आप में एक जटिल विचार है, उसकी व्याख्या आसानी से नहीं की जा सकती. मैं आपको इसकी जटिलता का एक अंश बताता हूं. ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे इसे बिलकुल सटीक तरीके से समझाया जा सके.

अपने धर्म का निर्धारण सिर्फ उसे मानने वाला ही कर सकता है. किसी जैन का धर्म जीवहत्या से दूर रहना है. कोई भी उसे जीवहत्या के लिए मजबूर नहीं कर सकता.

धर्म का दायरा बहुत संकीर्ण होता है. वह खुद ही यह मान लेता है कि नैतिकता की परिभाषा कमोबेश सबके लिए एक समान है.

धर्म की आधुनिक संकल्पना नई है, जिसे 19वीं सदी में पेश किया गया. पहले भारतीयों का कोई संगठित धर्म नहीं था. धर्म की वर्तमान संकल्पना प्रोटेस्टेंट ईसाईयत से निकलती है. सिंधु घाटी सभ्यता असल में एक जीवनशैली थी. इसमें तमाम तरह की विविधताओं को लेकर कोई टकराव नहीं था. यह हमने एक सभ्यता के तौर पर एक सीखा था. इसका हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं है.

धर्म की जरूरत उपनिवेशवाद के खतरे के कारण पैदा हुई. अपनी खोजबीन के दौरान मैंने पाया कि जापानी, चीनी और ऐसी तमाम संस्कृतियों में धर्म शब्द की उत्पत्ति 19वीं सदी में पहली बार हुई. हमें तेजी से पैर पसार रही इस नई संकल्पना से ताल मेल बिठाना था.

सेक्युलरिज्म कहता है कि धर्म का हस्तक्षेप सार्वजनिक जीवन में नहीं होना चाहिए. हर किसी को अपने धर्म की छूट है. लेकिन किसी भी धर्म को बाहर नहीं रखा जाय. सभी धर्म जीवन के सिद्धांत की बात करते हैं. इसलिए वह यह नहीं कहेंगे कि सार्वजनिक जीवन उनके दायरे से बाहर है. लातिन अमेरिका में लिबरेशन (मुक्ति) के सिद्धांत ने तेजी से अलग-अलग देशों में पैर फैलाया. इसकी वजह रही ईसाइयत जिसने अपने धर्म की प्रधानता के नाम पर वहां के सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप शुरू कर दिया था.

तो फिर हिंदुओं को क्यों लगता है कि उनका धर्म सबसे सहनशील धर्म है?

सभी धर्म सहनशील होने का दावा करते हैं. हिंदू धर्म में भी सहनशीलता की एक सीमा है. यह गैर हिंदुओं के गोमांस खाने को सहन नहीं कर पाता. हिंदू अपने ब्रिटिश शासकों के गोमांस खाने को सहन कर लेता था लेकिन वह काम मुस्लिम करे तो उन्हें बर्दाश्त नहीं होता. सबकी सहनशीलता की एक तय सीमा है.

प्रधानमंत्री का कहना है कि सहनशीलता का मतलब ऐसे व्यक्ति के साथ तालमेल बिठाना है जिसके साथ आप असहज होते हैं और हिंदुओं ने हमेशा ही इसे अपनाया है. यह एक किस्म का बड़बोलापन है.

एक हद तक यह बात सही है. लेकिन असहजता को स्वीकार करने का गुण हिंदुत्व का गुण नहीं है. यह सिंधु घाटी सभ्यता की संस्कृति है, चाहे वह हिंदुत्व हो, इस्लाम, जैन या बौद्ध हों. मैं इसे विलक्षण विविधता कहता हूं. सिंधु घाटी सभ्यता में विलक्षण विविधताओं को स्वीकार करने की असीमित क्षमता थी. हमें अपनी विविधताओं के साथ रहना सीखना होगा.

इसराइल में यहूदी बेहद असहिष्णु माने जाते हैं लेकिन भारत में वैसा नहीं है. भारतीय यहूदी कोच्चि या फिर महाराष्ट्र में मुस्लिमों के बेहद करीब रहे हैं. ऐसा कहा भी जाता है कि धर्म को संस्कृति से अलग कर देखना बेहद मुश्किल है. कहां भारतीय संस्कृति खत्म होती है और कहां से हिंदू धर्म की शुरुआत होती है, कहना मुश्किल है.

आपने अपने मशहूर लेख "एंटी सेक्युलरिस्ट मैनिफेस्टो" की शुरुआत गांधी का जिक्र करते हुए किया था कि गांधी खुद को धर्मनिरपेक्ष मानते थे लेकिन उन लोगों के बारे में गांधी के विचार अच्छे नहीं थे जो धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहते थे. आज के आधुनिक भारत में भी धर्म को राजनीति से अलग रखना असंभव क्यों है?

ऐसा उस धार्मिक तंत्र की वजह से है जो यह तय करता है कि किसी की सार्वजनिक जिंदगी कैसी हो, लोगों को कैसा नेता चुनना चाहिए, उसकी नैतिक मर्यादा क्या होगी आदि. गांधी जो कि खुद बेहद आस्थावान थे ने उस राजनीति की नैतिकता को रेखांकित किया था. लोग उनसे सहमत हों या न हों यह अलग मुद्दा है, मसलन चुनाव प्रचार में झूठ बोलने की आजादी है. यह गांधी के विचारों से कतई मेल नहीं खाता. गांधी का मानना था कि राजनीति और धर्म को मिलना होगा.

लोग शिक्षा का स्तर बढ़ने और राजनीति की गहरी समझ होने के बावजूद धार्मिक आधार पर वोट करते हैं. हम 1960 से इसका अध्ययन कर रहे हैं. हम जानते हैं कि ग्रामीण लोगों और यहां तक कि गरीब से गरीब का भी राजनीतिक ज्ञान बहुत गहरा है.

First published: 1 December 2015, 19:52 IST
 
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