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क्या भारतीय कालों से नफरत करते हैं और गोरों की पूजा

दुर्गा एम सेनगुप्ता | Updated on: 5 February 2016, 11:27 IST
QUICK PILL
  • बीते रविवार को बेंगलुरु में तंजानिया की एक 21 वर्षीय छात्रा के संग भीड़ ने बदसलूकी. बेंगलुरु में पिछले एक साल में अफ्रीकी लोगों के साथ हिंसा और भेदभाव की कई घटनाएं हो चुकी हैं. पुलिस ने भी पहले छात्रा की मदद नहीं की.
  • काले लोगों के संग भारतीयों के बरताव से उनकी नफरत जाहिर होती है. अफ्रीकी छात्रों के अनुसार भारतीयों के गोरों और कालों के संग व्यवहार में काफी फर्क होता है.

पिछले साल मार्च में बेंगलुरु में अफ्रीकी नौजवानों, जिनमें लड़कियां भी शामिल थीं, से मारपीट की कुछ घटनाओं के बाद शहर की पुलिस ने अप्रैल, 2015 में अफ्रीकी छात्रों को बुलाकर उनसे एक बैठक की. पुलिस ने उन्हें समझाया कि उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है.

महज 11 महीने बाद इस शहर के नस्लभेदी रवैया फिर सामने आया. इस बार एक 21 वर्षीय तंजानियाई छात्रा के कपड़े सरेआम फाड़े गए.

उसका अपराध बस इतना था कि वो उसी जगह से गुजर रही थी जहां आधे घंटे पहले एक सूडानी नागरिक ने अपनी कार से 35 वर्षीय महिला को टक्कर मार दी थी. इसके बाद महिला की मौत हो गयी.

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ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि पुलिस घटनास्थल के पास मौजूद थी और उसने कुछ नहीं किया. जब लड़की ने घटना के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की तो उसे उस सूडानी (जिसे लड़की जानती तक नहीं थी) को लेकर आने के लिए कहा गया जिसकी गाड़ी ने स्थानीय महिला को टक्कर मारी थी. पहले भी पुलिस वालों पर भी अफ्रीकी लोगों के संग भेदभाव आरोप लगते रहे हैं.

दर्घटना में महिला की मौत के बाद लोगों का आक्रोशित होना स्वाभाविक है लेकिन किसी अफ्रीकी को देखते हुए उस पर हिंसक तरह से टूट पड़ना हम भारतीयों की मानसिकता पर सवाल खड़ा करता है.

बेंगलुरु में पिछले एक साल में अफ्रीकियों के संग बदसलूकी और हिंसा की कई घटनाएं हो चुकी हैं

मान लीजिए एक भारतीय महिला किसी दूसरे देश में पढ़ने गयी है. वहां रहने वाला कोई दूसरा भारतीय किसी नागरिक को टक्कर मार देता. वहां मौजूद लोग वहां से आधे घंटे बाद गुजरने वाली इस भारतीय महिला को कार से निकालकर बगैर कुछ पूछे उसपर टूट पड़ते हैं. उसकी कार को आग लगा देते हैं. ऐसे में आप वहां के लोगों के बारे में क्या सोचते?

आपको ये उदाहरण अजीब लग सकता है लेकिन भारत में रहने वाले अफ्रीकियों के लिए ये बहुत परिचित बात है. भारत में गोरे विदेशियों और काले विदेशियों के बीच होने वाले बरताव में काफी फर्क है.

सूडान के एक छात्र ने कैच को बताया, "हमें भारत में हर तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है. हमें किराए पर मकान लेने में दिक्कत होती है. मकान मिल भी जाए तो लोग ज्यादा किराया मांगते हैं. ऑटो और टैक्सी वाले भी हमसे ज्यादा किराया लेते हैं."

कुछ अफ्रीकी छात्रों ने मीडिया को बताया कि कुछ निजी भारतीय संस्थानों में प्रवेश के बाद उनका पासपोर्ट ले लिया जाता है और अगर फीस देने में देर होती है तो वो उसे जरूरत पर वापस देने से इनकार कर देते हैं.

भारत में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे एक नाइजीरियाई छात्र ने कैच को बताया, "लोगों को जब पता चलता है कि मैं नाइजीरिया से हूं तो कुछ लोग मुझसे ड्र्ग्स मांगने लगते हैं."

"ज्यादातर भारतीय गोरे लोगों को भगवान समझते हैं. वो अफ्रीकियों को धोखेबाज और हत्यारा समझते हैं"

जेएनयू में पढ़ने वाले एक केन्याई छात्र ने कैच को बताया, "भारत आने से पहले मुझे लगता था कि यहां के लोग भूरे हैं तो वो काले लोगों से नफरत नहीं करते होंगे."

भारत में गोरे रंग के प्रति दीवानगी और काले लोगों के प्रति नफरत की जड़ शायद लंबी औपनिवेशिक गुलामी में है.

कांगो के ज्यां क्राइस्ट ने बेंगलुरु से बीसीए की पढ़ाई की है. वो कहते हैं, "ज्यादातर भारतीय गोरे लोगों को भगवान समझते हैं. वो अफ्रीकियों को धोखेबाज और हत्यारा समझते हैं."

क्राइस्ट बेंगलुरु पुलिस के रवैये को लेकर भी नाराज नजर आते हैं. वो कहते हैं, "वो कोई मदद नहीं करते. न ही उन्हें हमारी कोई परवाह होती है."

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क्राइस्ट मामते हैं कि पुलिस के बरताव में एक वजह भाषा की दीवार भी है. वो कहते हैं, "पुलिस से संवाद करना मुश्किल होता है क्योंकि वो अंग्रेजी नहीं समझते."

बेंगलुरु पुलिस ने गुरुवार को इस मामले में पांच संदिग्धों को गिरफ्तार किया. मामला दर्ज कराने के दो दिन और घटना के चार दिन बाद. यानी पुलिस के बरताव के लिए केवल भाषाई समझ जिम्मेदार नहीं हो सकता. इससे भारतीयों के काले लोगों के प्रति पूर्वाग्रह वाले नजरिये का पता चलता है.

एक अफ्रीकी छात्र के अनुसार,"हम सब काले हैं. इसलिए हम सब नाइजीरियाई हैं. सारे भारतीय हमें ऐसे ही देखते हैं."

First published: 5 February 2016, 11:27 IST
 
दुर्गा एम सेनगुप्ता @the_bongrel

Feminist and culturally displaced, Durga tries her best to live up to her overpowering name. She speaks four languages, by default, and has an unhealthy love for cheesy foods. Assistant Editor at Catch, Durga hopes to bring in a focus on gender politics and the role in plays in all our interactions.

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