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एक ही सवाल- डॉक्टर शैबाल का गुनाह क्या था?

राजकुमार सोनी | Updated on: 28 March 2016, 23:40 IST

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 130 किलोमीटर दूर लौह नगरी के रूप में मशहूर दल्लीराजहरा में जैसे ही आप प्रवेश करते हैं, वहां चौक-चौराहे पर लगे पोस्टर आपका ध्यान खींचने लगते हैं. पोस्टरों में चिकित्सक डॉक्टर शैबाल जाना हाथों में हथकड़ी पहने हुए नजर आते हैं और लिखा है- क्या शैबाल जाना का गुनाह यह है कि वे अस्पताल खोलकर पैसा कमाने के बजाय जनता की सेवा कर रहे हैं? मजदूर-किसानों का इलाज करना किस गुनाह की श्रेणी में आता है?

शहीद अस्पताल के सामने एक चाय सेंटर को संचालित करने वाले भोलाराम साहू कहते हैं, 'जाना साहब को आदिवासी डॉक्टर नहीं भगवान मानते हैं. सरकार ने हमारे भगवान को ही जेल भेज दिया था, लेकिन भगवान को कोई कितने दिनों तक जेल में रख पाएगा.' डॉक्टर शैबाल को 24 साल पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया था. अब वे जमानत पर रिहा होकर दल्लीराजहरा लौट आए हैं.

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मजदूर और किसानों के सहयोग से बनाए गए शहीद अस्पताल में डॉक्टर शैबाल की अनुपस्थिति में नेशनल मेडिकल कॉलेज कलकत्ता में उनके सहपाठी रहे दीपांकर सेन गुप्ता ने मरीजों की देखरेख का जिम्मा संभाल रखा था. वे कहते हैं, 'मजदूरों के इलाज को गुनाह नहीं माना जा सकता, लेकिन छत्तीसगढ़ में जो कुछ घट रहा है उसके बाद यहां कुछ भी हो सकता है और कोई भी किसी भी आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है.'

डॉक्टर शैबाल जाना को 24 साल पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया था

शहीद अस्पताल में ही कार्यरत चिकित्सक पीडी लालवानी उन्हें हथकड़ी पहनाकर जेल भेजने पर आपत्ति जताते हुए कहते हैं, 'सामान्यत: किसी वरिष्ठ नागरिक को हथकड़ी पहनाकर जेल नहीं भेजा जाता, लेकिन पुलिस ने एक डॉक्टर के साथ अपराधी जैसा व्यवहार क्यों किया, यह समझ से परे है.'

शहीद अस्पताल के पास मौजूद उनके निवास पर गत 15 साल से घरेलू कामकाज कर रही दुर्गा बाई उनके जेल जाने पर कहती हैं, 'सरकार को यह तो बताना चाहिए कि उनका अपराध क्या है?'

जेल भेजने का सच

माओवाद प्रभावित राजहरा में आदिवासियों की चिकित्सा सेवा में लगे डॉक्टर जाना वर्ष 1984 में राजहरा आए थे. उन्हें जानने वाले बताते हैं कि प्रसिद्ध श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के संपर्क में आने के बाद वे यहीं के होकर रहे गए. नियोगी ने शराब के खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ रखा था. डॉक्टर जाना भी उनके साथ गांव-गांव जाते और मजदूरों और किसानों को शराब छोड़ने के लिए प्रेरित करते.

इसी दौरान 1992 में भिलाई में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की तरफ से रेल रोको आंदोलन का आयोजन हुआ और पुलिस फायरिंग में 16 मजदूर मारे गए. इस घटना में कई मजदूर घायल भी हुए थे जिनका इलाज डॉक्टर जाना और उनकी टीम ने किया था. मामला काफी तूल पकड़ चुका था, लिहाजा पुलिस इसकी पड़ताल कर रही थी.

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मजदूरों के साथ टकराव होने के कारण पुलिस ने मजदूर नेता कपिलदेव शुक्ला सहित 57 लोगों पर सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज किया था. लगभग 24 साल पहले दर्ज किए गए इस मामले में कुछ लोग पेशी पर आते-जाते रहे. इसी महीने 16 मार्च को छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता जनकलाल ठाकुर, बंसत साहू, शेख अंसारी, मेघनाथ साहू के साथ डॉक्टर जाना भी दुर्ग कोर्ट पहुंचे तो उन्हें यह बताया गया कि वे लंबे समय से फरारी काट रहे थे इसलिए उन्हें जेल जाना होगा.

किसी वरिष्ठ नागरिक को हथकड़ी पहनाकर जेल नहीं भेजा जाता: चिकित्सक पीडी लालवानी

एक डॉक्टर के लिए यह फरमान किसी आफत से कम नहीं था. इससे पहले कि डॉक्टर जाना कुछ समझ पाते पुलिस ने उन्हें हथकड़ी पहनाकर जेल भेज दिया. जानकारों का कहना है कि पुलिस ने डॉ. जाना को हथकड़ी सिर्फ इसलिए पहनाई क्योंकि इसी इलाके में काम करने वाले एक और प्रसिद्ध डॉक्टर विनायक सेन कभी उनके शहीद अस्पताल में अपनी सेवाएं दे चुके थे. पुलिस का इस मामले में कहना है कि हथकड़ी इसलिए लगाई गई, क्योंकि डॉ. जाना 24 साल से फरारी काट रहे थे.

फरारी पर सवाल

जमानत पर रिहा डॉ. जाना अपनी फरारी को लेकर सवाल उठाते हुए कहते हैं, 'अव्वल तो मुझे कभी किसी ने कोई समन ही नहीं भेजा था, लिहाजा मेरे फरार होने का सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं सरकार के स्वास्थ्य विभाग के हर प्रशिक्षण कार्यक्रम में शरीक होता रहा हूं. यदि फरार होता तो क्या सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी दर्ज करता? यदि मैं फरार था तो पुलिस 24 सालों से क्या कर रही थी?'


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यह चर्चा लगातार हो रही है कि डॉ. जाना को जानबूझकर हथकड़ी पहनाकर जेल भेजा गया. जनमुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष जीतगुहा नियोगी का कहना है कि डॉ. जाना की गिरफ्तारी राजहरा के शहीद अस्पताल को ध्वस्त करने की साजिश थी. छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा से जुड़े वरिष्ठ नेता शेख अंसार कहते हैं, 'डॉ. जाना को जेल भेजकर प्रदेश की रमन सिंह सरकार ने जमीनी सरोकार रखने वालों को एक तरह से डराने-धमकाने का काम किया है.'

बीते कुछ हफ्तों और महीनों के दौरान छत्तीसगढ़ में सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों के साथ पुलिस का जो रवैया रहा है वह डर पैदा करता है. यह अनुमान लगाना आसान है कि डॉ. शैबाल जाना को हाथ में हथकड़ी लागकर जेल भेजना इसी भय की अगली कड़ी है.

First published: 28 March 2016, 23:40 IST
 
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