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अखिलेश यादव: कानून व्यवस्था भी यहां वोट पाने का जरिया भर है

सौरव दत्ता | Updated on: 16 March 2016, 8:59 IST
QUICK PILL
  • यूपी की अखिलेश यादव सरकार ने सत्ता में आते ही राज्य में हुए विभिन्न बम धमाकों के 19 अभियुक्तों को बरी कर दिया था.
  • वकील और सामाजिक कार्यकर्ता रंजना अग्निहोत्री ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके दी यूपी सरकार के फैसले को चुनौती.

यूपी के सीएम अखिलेश यादव पर लंबे समय से हिंदुत्ववादियों के संग उदारता से पेश आने का आरोप लगता रहा है. उनपर आतंकी मामलों के अभियुक्त मुसलमानों के संग भी नरमी से पेश आने का आरोप है.

सपा सरकार खुद को 'सेकुलर' बताती रही है लेकिन उसपर मुजफ्फरनगर दंगों के अभियुक्तों को सजा दिलाने के लिए समुचित कार्रवाई न करने का आरोप है.

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ऐसा ही एक मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच चुका है. यूपी की राजधानी लखनऊ स्थित वकील और सामाजिक कार्यकर्ता रंजना अग्निहोत्री ने 2014 में एक याचिका दायर करके कहा कि अखिलेश सरकार आतंकी मामलों से जुड़े मामलों में हेरफेर कर रही है. याचिकाकर्ता के अनुसार अखिलेश सरकार ने अपना चुनावी वादा निभाने के लिए ये कदम उठाया.

याचिकाकर्ता के अनुसार 2006 और 2007 में प्रदेश में हुए बम धमाकों के 19 मुस्लिम अभियुक्तों को कानून का खुला उल्लंघन करते हुए बरी कर दिया गया.

मुख्यमंत्री के आदेश


रंजना अग्निहोत्री ने अपनी याचिका में कहा है कि कोई भी नेता (भले ही वो सीएम ही हो) के निर्देश न्यायपालिका और संविधान में दखल नहीं दे सकते.

अग्निहोत्री ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में सभी बम धमाकों के 19 अभियुक्तों को बगैर किसी शर्त रिहा कर देने के फैसले को चुनौती दी है.

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अग्निहोत्री ने अखिलेश सरकार पर सीआरपीसी (भारतीय दंड संहिता प्रक्रिया) की धारा 321(राज्य सरकार के किसी व्यक्ति पर से आपराधिक मामलों को वापस लेने से संबंधित) के उल्लंघन का आरोप लगाया है. उन्होंने ये भी कहा है कि अखिलेश सरकार ने भारतीय गणराज्य के संघीय सिद्धांतों का भी उल्लंघन किया है.

सपा ने यूपी में सत्ता में आते ही राज्य में हुए विभिन्न बम धमाकों के 19 अभियुक्तों को बरी कर दिया

भारतीय संविधान की धारा 93 के तहत कोई भी राज्य सरकार केंद्रीय कानून के तहत अभियुक्त बनाए गए किसी व्यक्ति से केंद्र सरकार की सहमति के बिना आरोप वापस नहीं ले सकती.

इन सभी 19 अभियुक्तों पर कई केंद्रीय कानूनों(पासपोर्ट कानू, विस्फोटक कानून, यूएपीए एवं अन्य) के तहत मामला दर्ज था.

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कानून अगर किसी व्यक्ति पर इन कानूनों के तहत मामला दर्ज है और कुछ मामलों की सुनवाई भी शुरू हो चुकी है तो केवल सरकारी वकील ही आरोप वापस ले सकते हैं. सरकारी वकील भी ऐसा करते समय कानूनी सीमाओं का उल्लंघन या अनदेखी नहीं कर सकते.
 
संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री भी राजनीतिक कारणों से कानून का उल्लंघन नहीं कर सकते. अग्निहोत्री का आरोप है कि अखिलेश सरकार और उनके मंत्रियों ने यही किया है.

मामले की पृष्ठभूमि


मार्च, 2012 में विधान सभा चुनावों से पहले अखिलेश यादव के पिता और यूपी के पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव ने 'सांप्रदायिक' मायावती सरकार द्वारा अभियुक्त बनाए गए मुसलमानों को सत्ता में आने पर रिहा करने का वादा किया था.

सरकार बनने के कुछ ही दिन बाद 28 मार्च को सपा सरकार ने मुख्यमंत्री की मुहर लगा एक आदेश जारी किया. इस आदेश में सभी जिलाधिकारियों, सरकारी वकीलों गृह विभागों को निर्देश दिया कि सभी अभियुक्तों को तत्काल रिहा किया जाए और उन्हें हर्जाना भी दिया जाए.

सीएम ने उन पुलिसवालों के खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई शुरू करने का भी आदेश दिया जिन्होंने इन मामलों की जांच करके कार्रवाई की थी.

राज्य के मुख्यमंत्री भी राजनीतिक कारणों से कानून का उल्लंघन नहीं कर सकतेः रंजना अग्निहोत्री

राज्य के सरकारी वकीलों, जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों के विरोध को सरकार ने सिरे से नकार दिया. वहीं राज्य के एडवोकेट जनरल को सरकार के फैसले में कुछ भी गलत नजर नहीं आया और उन्होंने इसे अपनी सहमति दे दी.

जनहित का फैसला


शिवनंदन पासवान बनाम बिहार सरकार(1987) मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से निर्णय दिया था कि धारा 321 के तहत कोई मामला 'सदिच्छा, जनहित और न्याय दिलाने के लिए" वापस लिया जाना चाहिए, "न कि कानूनी प्रक्रिया के दमन के लिए."

धारा 321 सरकारी वकील को किसी सरकारी प्रभाव में आए बगैर किसी व्यक्ति से आपराधिक मामला वापस लेने का निर्णय करने का अंतिम अधिकार देती है. उसके बाद सरकारी वकील अदालत में अपना निर्णय पेश कर सकते है. फिर अदालत उसपर आखिरी फैसला लेती है. जबकि इन मामलों में सरकारी वकील अदालत को फैसले का कोई आधार देने में विफल रहे थे.

यूपी सरकार को समझना होगा कि'अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा' एक बात है और 'उदार सेकुलरिज्म' की आड़ में समुदाय के साथ छल करना दूसरी बात है.

First published: 16 March 2016, 8:59 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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