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जय भीम: ऐतिहासिक भूल की स्वीकार्यता है या राजनैतिक अवसरवाद?

अनिल चमड़िया | Updated on: 14 April 2016, 8:26 IST
QUICK PILL
  • आज देश की राजनीतिक जमात में डॉ. बीआर अंबेडकर अचानक से बड़े पैमाने पर पूजे-पोसे जाने लगे हैं. यह बात भी जाहिर है कि आजादी के लगभग 60-70 सालों तक अंबेडकर सिर्फ दलितों के रहे. कांग्रेस ने अपनी नेहरू परिक्रमा की हदें इन सालों में पार कर दी तो संघी सामाजिक न्याय की हर छोटी-बड़ी कोशिश की हवा कमंडल आदि से इस पूरे दौर में निकालने के जतन में लीन रहे. लेकिन अब सोनिया गांधी भी जय भीम कह रही हैं और नरेंद्र मोदी भी. जाहिर है सियासत का यह भीम प्रेम सहज और निरुद्देश्य नहीं है. वरिष्ठ लेखक पत्रकार अनिल चमड़िया इस ताजा सूरते हाल की समीक्षा कर रहे हैं.

योग स्टार रामदेव ने हरिद्वार के अपने विशाल पांच सितारा आश्रम में एक बैठक बुलाई थी. मंच पर एक बड़ा सा बैनर लगा था जिसमें मुख्यधारा के सभी बड़े नेताओं और आदर्श पुरुषों की तस्वीरे लगी थी. योग मुस्कान में सदैव दिखते रामदेव वक्ताओं के भाषण सुन रहे थे.

अचानक वे थोड़े परेशान से हो गए जब एक वक्ता के तौर पर खड़े होकर मैंने पूछा कि आपके सुंदर और भव्य बैनर में डा. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर क्यों नहीं है? उन्होने लगभग आंखे चुराते हुए धीमे स्वर में संभावना बताई कि उनकी तस्वीर भी होनी चाहिए. बैठक में उपस्थित सभी लोगों को फिर दोबारा बैनर देखना पड़ा जिसमें डा. अंबेडकर नहीं थे.

अंबेडकर के लिए दलित एक समूह वर्ग था लेकिन संसदीय पार्टियों ने उसे कई जातियों में खंडित कर दिया है

इसके बाद रामदेव को एक दो कार्यक्रमों में मैने देखा कि मुझ पर नजर पड़ते ही बैनर देखने के लिए उनकी गर्दन मशीन की तरह पीछे मुड़ जाती थी. वे आश्वस्त होकर अपनी गर्दन सीधी करते कि डा. अंबेडकर की तस्वीर लगी है.

डा. अंबेडकर को जिस तरह से स्वीकार्य करने का एक संसदीय माहौल देखा जा रहा है उसे समझने के लिए इस घटना की चर्चा की गई. पट्टाभि सीतारमैय्या 1935 में कांग्रेस का इतिहास लिखते हुए बता रहे हैं कि "मौलिक अधिकारों व आर्थिक व्यवस्था वाला प्रस्ताव कार्यसमिति के सामने यकायक तौर पर पेश हुआ था. यह अनुभव से जानी गई बात है कि देश में जैसा वातावरण रहता है उसी के अनुसार कांग्रेस में प्रस्ताव पेश होते है."

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कांगेस का यह अनुभव वास्तव में अंग्रेजों के बाद के भारत में भी राजनीतिक संस्कृति की मुख्यधारा के तौर पर विकसित हुआ है. जिस मौलिक अधिकारों वाले प्रस्ताव के बारे में सीतारमैय्या चर्चा कर रहे हैं वह 1931 में मुंबई में कांग्रेस की महासमिति में पेश किया गया था और उसमें देश के दलितों के बारे में एक शब्द भी नहीं था. यहां तक कि आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रमों की सूची में भी दलितों को लेकर कोई कार्यक्रम नहीं था.

महात्मा गांधी मुख्यधारा की संसदीय राजनीति में राष्ट्रपिता के रूप में स्थापित रहे हैं और 1980 के दशक तक वे संसदीय राजनीति के एक मात्र पदचिन्ह थे. भाजपा ने भी अपनी स्थापना गांधीवादी समाजवाद के नारे से की थी जबकि उसका मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी 1925 में अपनी स्थापना से ही गांधी के धर्म निपरेक्षता और जाति सुधार कार्यक्रमों का विरोधी रहा है और हिन्दुत्ववादी राष्ट्र की परिकल्पना पेश करता रहा है.

अंबेडकर की स्वीकार्यता केवल अनुसूचित जातियों के लोगों के बीच घुसने के लिए दिखती है

डा. भीम राव अंबेडकर कभी कांग्रेस और उससे निकली पार्टियों व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की बनाई पार्टियों को स्वीकार्य नहीं रहे हैं. बल्कि उनके प्रभाव को कम  करने के लिए और खासतौर से दूसरे गोलमेज सम्मेलन के बाद कांग्रेस में दलितों से जुड़े कुछेक मुद्दे बतौर कार्यक्रम शामिल किए जाते रहे हैं और दूसरी तरफ उनके समानांतर किसी दलित नेतृत्व को खड़ा करने की कोशिश चलती रही है. उनमें बाबू जगजीवन राम भी एक बड़ी खोज है.

भाजपा से पहले जनसंघ के चुनावी घोषणा पत्रों को देखा जाए या सामाजिक न्याय के लिए समता मूलक किसी अभियान या कार्यक्रम पर उनकी प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाए तो वे इसके विरोधी रहे हैं. आरक्षण के विरोध में गुजरात में हिंसक आंदोलन हुए.

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1991 में मंडल आयोग की सिफारिशों को विशेष अवसर के सिद्धांत के तहत सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़े वर्गों के आरक्षण देने का फैसला किया गया तो भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने हिन्दुत्ववादी रथयात्रा शुरू कर दी. सामाजिक न्याय की चेतना को साम्प्रदायिकता की आग में झुलसाने की कोशिश देखी गई.

डा. अंबेडकर की स्वीकार्यता अगर राजनीतिक पार्टियों द्वारा इतिहास में की गई भूल को सुधारने की कोशिश है तो भी अच्छी बात समझी जानी चाहिए. लेकिन डा. अंबेडकर की स्वीकार्यता केवल अनुसूचित जातियों के लोगों के बीच घुसने और अपनी संस्कृति की पैठ बनाने के लिए दिखती है. क्योंकि डा. अंबेडकर केवल अनुसूचित जातियों और खासतौर से आरक्षण जैसे संदर्भों में ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा याद किए जाते हैं.

डा. अंबेडकर इस दौर में सबसे ज्यादा व्याख्याओं की प्रक्रिया की पीड़ा से गुजर रहे हैं

डा. अंबेडकर केवल एक प्रतीक के रूप में स्वीकार दिखते हैं. इसीलिए उनसे जुड़े स्थलों व चिन्हों पर अपना हाथ दिखाने व अपना कमल खिलाने की कोशिश दिखती है. उन्हें एक कार्यक्रम के रूप में कांग्रेस और भाजपा शामिल करती नजर आना चाहती है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के एक राज्य मंत्री द्वारा सुनाई गई एक घटना के जरिये इसे समझने की कोशिश जा सकती है.

अपने वरिष्ठ मंत्री के साथ बातचीत का हवाला देते हुए पूर्व राज्यमंत्री ने बताया कि वरिष्ठ मंत्री भाजपा के बड़े नेता भी थे और उन्होंने उनसे कहा कि वे पार्टी में बतौर दलित नेता तो स्वीकार हैं लेकिन दलितों के नेता के तौर पर स्वीकार नहीं किए जा सकते हैं.

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डा. अंबेडकर की विरासत ने वामपंथ के प्रभाव के कमजोर होने के साथ ही संसदीय राजनीति में वंचित वर्गों के एक राजनैतिक प्रतीक के रूप में विस्तार हासिल किया है. डा. अंबेडकर को लेकर इस समय संसदीय पार्टियों के भीतर यह स्थिति है कि हर पार्टी अपनी राजनीतिक अनुकूलता के लिए डा. अंबेडकर के विचारों को व्याख्यित कर रहा है.

संघ के मुख्यपत्रों ने तो उनके एक सौ पच्चीसवें जंयती वर्ष पर एक विशेषांक निकाला और बौद्ध धम्म को स्वीकार करने वाले डा. अंबेडकर को हिन्दुत्ववादी संस्कृति के अनुकूल पेश कर दिया. डा. अंबेडकर जाति  खत्म करने में यकीन रखते थे लेकिन संसदीय पार्टियों ने दलित जातियों के बीच सबसे ज्यादा जातिवाद को बढ़ावा दिया है. डा. अंबेडकर के लिए दलित एक समूह वर्ग था लेकिन संसदीय पार्टियों ने उसे कई जातियों में खंडित कर दिया है.

जब राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर वर्चस्व का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां वंचित वर्ग की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दर्शन को स्वीकार नहीं कर पाती हैं तो वे उनके चिन्हों व प्रतीकों से उसका काम चलाने के हुनर पेश करते हैं.

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डा. अंबेडकर इस दौर में सबसे ज्यादा व्याख्याओं की प्रक्रिया की पीड़ा से गुजर रहे हैं. उनकी जो स्वीकार्यता दिख रही है वास्तव में वह जय की संस्कृति की स्वीकार्यता है. जय वर्चस्ववादी संस्कृति का उदघोष है. जैसे क्रांति का बिगुल इंकलाब-जिंदाबाद के रूप में बजता है.

मैं 9 अप्रैल को चंड़ीगढ़ में डा. अंबेडकर की जंयती समारोह की तैयारी की एक झलक देख रहा था जिसकी धुन हिन्दू देवी देवताओं के गीतों जैसी थी और उसमें जय बाबा भीम को भी पिरोया गया था. डा. अंबेडकर संपूर्णता में एक विचार हैं. वह जय संस्कृति में रचा बसा विचार नहीं है और ना ही वह नीला रंग भर है.

First published: 14 April 2016, 8:26 IST
 
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