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कितना कारगर साबित होगा प्रस्तावित बाल श्रम कानून?

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 21 July 2016, 8:06 IST

राज्यसभा में मंगलवार को चाइल्ड लेबर (प्रॉहिबिशन एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. इस बिल को सदन में केंद्रीय श्रम राज्यमंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने पेश किया था. इसे अभी लोकसभा में पारित किया जाना बाकी है. मूल विधेयक इस संशोधन विधेयक से करीब 30 साल पहले पारित किया गया था.

मूल विधेयक में 14 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी संस्थान में काम कराने पर रोक थी लेकन परिवार द्वारा चलाए जाने वाले कारोबार में काम करने वालों बच्चों को इसमें छूट दी गई थी. हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता इस रियायत की आलोचना करते रहते थे.

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प्रस्तावित विधेयक में 1986 के मूल विधेयक में संशोधन करते हुए 14 से 18 साल के बच्चों के किसी भी तरह के कारोबार में काम करने पर रोक लगाई जा रही है. इसमें पारिवारिक कारोबार और खेती भी शामिल हैं. प्रस्तावित कानून के तहत दोषियों को छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा हो सकती है. ऐसे लोगों पर 20 हजार रुपये से 50 हजार रुपये तक जुर्माना भी लगाया जा सकता है. पहले जुर्माने की राशि 10,000-20,000 रुपये थी.

प्रस्तावित विधेयक में ऐसे हानिकारक उद्योगों की संख्या घटाकर तीन कर दी गई जिनमें बच्चे काम कर सकते हैं. पहले ऐसे उद्योगों की संख्या 80 थी.

प्रस्तावित कानून में बाल मजूदरी से मुक्त कराए गए बच्चों के पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी. सरकार बच्चों के नियोक्ता से लिए गए जुर्माने और अपनी तरफ से 15 हजार रुपये बच्चों के पुनर्वास के लिए देगी.

कैबिनेट की मंजूरी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले साल संशोधन विधेयक को मंजूरी देते हुए एक बयान जारी किया था. बयान में कहा गया था, "बहुत बड़ी संख्या में बच्चे अपने पारिवारिक कामकाज में मदद करते हैं. अभिभावकों की मदद करते समय बच्चे इन कामों का बुनियादी प्रशिक्षण भी लेते हैं. ऐसे में बच्चों की शिक्षा की जरूरतों और सामाजिक-आर्थिक जमीनी हकीकत के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है."

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बच्चों को हानिकारक उद्योगों को छोड़कर अन्य पारिवारिक कारोबार या कामकाज में स्कूल टाइम के बाद या छुट्टियों में परिवार की मदद करने की रियायत दी थी.

दत्तात्रेय ने इसकी तारीफ करते हुए कहा था कि प्रस्तावित विधेयक का लक्ष्य 'बाल मजदूरी को पूरी तरह खत्म करना है.'

पारिवारिक कारोबार के मसले पर दत्तात्रेय ने कहा प्रस्तावित विधेयक में बच्चों को हानिकारक उद्योगों में काम करने से बचाने के तमाम एहतियात हैं और इसमें 'जमीनी हकीकत' का पूरा ध्यान रखा गया है.

विपक्ष का विरोध

सदन में विपक्षी दलों ने प्रस्तावित विधेयक पर कई सवाल उठाए. सीपीआई के राज्यसभा सदस्य डी राजा ने कहा कि बाल मजदूरी विधेयक जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए. राजा ने प्रस्तावित विधेयक में 'पारिवारिक कारोबार' वाले प्रावधान पर विशेष एतराज जताया था.

2009-10 के आंकड़ों के अनुसार देश में 49.8 लाख बच्चे बाल मजदूर हैं

तृणमूल कांग्रेस के नेता विवेक गुप्ता ने भी 'पारिवारिक कारोबार' वाले प्रावधान पर उंगली उठाते हुए कहा कि इससे बच्चों को कई हानिकारक उद्योगों में शामिल किए जाने का डर रहेगा. उन्होंने उदाहरण के तौर पर बीड़ी उद्योग और कारपेट उद्योग में बच्चों से मजूदरी कराने के खतरे की आशंका पर ध्यान दिलाया था. 

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने भी मीडिया से बातचीत में प्रस्तावित विधेयक को निराशाजनक बताया. सत्यार्थी ने कहा, "हानिकारक उद्योगों की संख्या घटाकर तीन कर दी गई है और ये चिंताजनक है."

एक टीवी इंटरव्यू में 'पारिवारिक कारोबार' के प्रावधान पर सवाल उठाते हुए सत्यार्थी ने घरेलू कामगारों का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि अगर माता-पिता किसी जगह काम करते हैं तो बच्चे उनकी मदद कर सकते हैं लेकिन चिंता की बात ये है कि वो बच्चा परिवार का सदस्य है या नहीं इसे जांचने के लिए उचित संसाधन नहीं हैं.

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सत्यार्थी ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक अच्छी नीयत के साथ लाया जा रहा है और ये बाल मजदूरी को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम है लेकिन देश के लाखों बच्चों को बाल मजदूरी के अभिशाप से बचाने के लिए इससे बेहतर कानून की जरूरत है.

वहीं बाल मजूदरी उन्मूलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता संजय गुप्ता कहते हैं कि इसमें सबसे बड़ी दिक्कत ये आती है कि किसी एक जगह पर समस्या का समाधान नहीं होता. गुप्ता कहते हैं, "पुलिस कहती है, श्रम मंत्रालय के पास जाओ, श्रम मंत्रालय कहता है कि महिला एव बाल कल्याण मंत्रालय जाओ."

गुप्ता भी प्रस्तावित विधेयक को निराशाजनक मानते हैं. उनके अनुसार 'पारिवारिक कारोबार' का प्रावधान लाखों बच्चों के लिए मुसीबत का कारण बन सकता है. वो कहते हैं कि प्रस्तावित कानून में ऐसे बच्चों के शोषण की गुंजाइश बची रह जाती है.

निगरानी व्यवस्था की कमी

सामाजिक कार्यकर्ता इस कानून को प्रवासी मजदूरों के बच्चे के लिए भी नाकाफी बता रहे हैं. अपने माता-पिता के बाहर जाने के लिए मजबूर बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रस्तावित कानून में कोई प्रावधान नहीं है.

बच्चों के लिए काम करने वाले एनजीओ क्राई की एसोसिएट जनरल मैनेजर जया सिंह कहती हैं, "इस विधेयक में संशोधन में 30 साल लगे लेकिन अभी भी बच्चों की सुरक्षा पर सरकार का ये रवैया है. प्रस्तावित विधेयक से लगता है कि सरकार मानती है कि बच्चे स्कूल टाइम के बाद परिवार की मदद कर सकते हैं."

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सिंह कहती हैं कि सरकार जिस सामाजिक-आर्थिक 'जमीनी हकीकत' की बात कर रही है वो उसी की नीतियों और राजनीति का नतीजा हैं. सरकार के पास ऐसा सिस्टम नहीं है कि वो बच्चों द्वारा काम कराए जाने की निगरानी रख सके. सिंह कहती हैं, "निगरानी की व्यवस्था के बगैर प्रस्तावित विधेयक का कोई मतलब नहीं."

साल 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में पांच से 14 साल के बीच के 1.26 करोड़ बच्चे बाल मजदूर के रूप में काम कर रहे थे. साल 2011 में ऐसे बच्चों की संख्या घटकर 43.5 लाख हो गई. वहीं नेशनल सैंपल सर्वे के 2009-10 के आंकड़ों के अनुसार देश में 49.8 लाख बच्चे बाल मजदूर के रूप में काम कर रहे थे.

जाहिर है ये आंकड़े बताते हैं कि बाल मजदूरी पर सक्षम कानून की देश को कितनी जरूरत है.

First published: 21 July 2016, 8:06 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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