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भारत-अमेरिका के बीच सैन्य सुविधाओं का समझौता किसके पक्ष में हैं

सादिक़ नक़वी | Updated on: 15 April 2016, 22:35 IST

आखिरकार पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जाॅर्ज डब्लू बुश और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दस्तखत करने के दस वर्ष बाद लाॅजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (रसद सहयोग समझौता) अब एक वास्तविकता बन सकता है. यह अलग बात है कि इसका स्वरूप कुछ और ही होगा.

भारत के दौरे पर आए अमरीकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर और भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने घोषणा की कि दोनों सरकारों ने अंततः सैन्य सामग्रियों को साझा करने के फैसले पर सैद्धांतिक सहमति प्रदान कर दी है. इसकी व्यापक रूपरेखा तैयार की जा चुकी है, लेकिन अभी इसे अंतिम रूप दिया जाना बाकी है.

मनोहर पर्रिकर ने कहा, ‘‘मैंने और सचिव कार्टर ने आने वाले महीनों में सैद्धांतिक रूप से लाॅजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम आॅफ एग्रीमेंट (एलईएमओए) को निबटाने पर सहमति प्रदान कर दी है और इसका मसौदा अगर कुछ सप्ताहों में नहीं तो एक महीने में जरूर तैयार हो जाएगा.’’ ऐसा माना जा रहा है कि यह समझौता जून के महीने तक हस्ताक्षर करने के लिये तैयार हो जाएगा.

इस समझौते से भारतीय जमीन पर अमरीकी सैन्य बलों की उपस्थिति का मार्ग प्रशस्त होगा: वाम दल

सैन्य संबंधों को मजबूत करने वाले इस समझौते के लागू होने के बाद दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल सहूलियत, मरम्मत, ईंधन भरने और अन्य आकस्मिक मौकों पर कर सकेंगे.

इस अहम घोषणा के मौके पर दोनों देशो के रक्षामंत्रियों ने स्पष्ट किया कि इस समझौते के लागू होने के बाद भारतीय ठिकानों पर अमरीकी सशस्त्र बलों की तैनाती नहीं होगी. पर्रिकर ने बताया कि यह समझौता हाल की नेपाल त्रासदी जैसे मानवीय संकट की स्थितियों में काफी उपयोगी साबित होगी. बातचीत में इस बात के भी संकेत मिले कि भारत सरकार अपनी मौके और अपनी सहूलियत के आधार पर ऐसी सहायता को लेकर अंतिम फैसला कर सकती है.

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इस समझौते में प्रतिपूर्ति के आधार पर समर्थन, आपूर्ति और सेवाओं का प्रावधान है. हालांकि अभी संचालन से संबंधित कुछ बिंदुओं पर सहमति होनी बाकी है. भारत की तीन-दिवसीय यात्रा पर आए कार्टर ने कहा, ‘‘यह समझौता हमारे लॉजिस्टिकल संचालन को और अधिक सुगम और आम बनाएगा. अभी कुछ मुद्दों को हल किया जाना है. अभी समझौते को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है.’’

यूपीए सरकार ने वाम दलों के कड़े विरोध के चलते इस समझौते को ठंडे बस्ते में डाल दिया था. उनका कहना था कि इस समझौते के लागू होने से भारतीय जमीन पर अमरीकी सैनिकों की मौजूदगी का रास्ता आसान हो जाएगा. यहां तक कि हाल की घोषणा के बाद सीपीआई (एम) ने कथित तौर पर इसे एक खतरनाक कदम बताते हुए कहा कि इसके परिणामस्वरूप भारतीय जमीन पर अमरीकी सैन्य बलों की उपस्थिति का मार्ग प्रशस्त होगा.

लाॅजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट (रसद सहयोग समझौता) अब एक वास्तविकता बन सकता है

विशेषकर हिंद महासागर में चीन के बढ़ते हुए आक्रामक रवैये को ध्यान में रखकर नरेंद्र मोदी सरकार इस समझौते को भारतीय उपस्थिति को मजबूत करने वाले एक कदम के रूप में देख रही है.

‘‘मैं निश्चित रूप से इसे लेकर अधिक उत्साहित नहीं हूं,’’ यह कहना है पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन का. हालांकि उन्होंने साथ ही कहा कि उन्होंने अभी तक इसे विस्तार से नहीं परखा है.

इस कदम का स्वागत करने वालों में से एक पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लीला पोनप्पा सावधानी से आगे बढ़ने की नसीहत देती हैं. उन्होंने कैच से कहा, ‘‘हम इस बारे में दस वर्ष से भी अधिक समय से बात कर रहे हैं. आपसी सहयोग एक निश्चित हद तक अच्छा है लेकिन हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी प्रकार से हमारे हितों की अनदेखी न हो.’’

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पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं कि एलईएमओए उच्च स्तर की सैन्य प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और सैन्य संबंधों को मजबूत करने के लिये आवश्यक उन तीन समझौतों से कम संवेदनशील है, जिनके लिये अमरीका भारत पर बीते कई वर्षों से दबाव डाल रहा है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वर्तमान में पश्चिमी एशिया में अमरीका द्वारा संचालित की जा रही ऐसी सैन्य कार्रवाईयों को लेकर भी पूरी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है, जिनका भारत विरोध करता है. भारत पश्चिम एशिया के विवादों से खुद को दूर रखे हुए है जहां भारी मात्रा में पश्चिमी देशों के सुरक्षा बल तैनात हैं.

नौसेना के वाइस चीफ के रूप में देश की सेवा करने वाले और वर्तमान में नेशनल मेरीटाइम फाउंडेशन के अध्यक्ष वाइस एडमिरल केके नायर कहते हैं, ‘‘यह दोनों देशों के बीच बढ़ते हुए संबधों की दिशा में एक तार्किक कदम है जिसका दोनों ही पक्षों को भरपूर फायदा होगा.’’ उनका कहना है कि इस कदम का भारतीय जहाजों को उन क्षेत्रों में काफी फायदा होगा जहां अभी तक देश की उपस्थिति नगण्य है.

भारत पश्चिम एशिया के विवादों से खुद को दूर रखे हुए है जहां भारी मात्रा में पश्चिमी देशों के सुरक्षा बल तैनात हैं

पूर्व राजनयिक और जदयू नेता पवन वर्मा कहते हैं कि चूंकि अभी इस समझौते के विवरण सामने आने बाकी हैं, ऐसे में यह देखना आवश्यक होगा कि वास्तव में यहां पर ‘लाॅजिस्टिक्स’ के क्या मायने हैं. उन्होंने कैच से कहा, ‘‘पूर्व में भी भारत और अमरीका संयुक्त सैन्य अभ्यास करते आए हैं. यह देखना बाकी है कि हम कितना आगे बढ़े हैं और बारीक विवरण क्या हैं.’’

समीक्षक मोहन गुरुस्वामी अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘‘चूंकि बड़ी संख्या में अमेरिकी जहाज और विमान हिंद महासागर में संचालित होते हैं और भारतीय सेना काफी कम संख्या में इन तटों का इस्तेमाल करती हैं ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि अधिकांश समय अमेरिका ही भारतीय सुविधाओं का उपयोग करेगा.’’

उन्होंने लिखा, ‘‘यह कदम भारत के वाणिज्यिक हितों के लिये कोई बुरा नहीं होगा. हम अमेरिका की कोका कोला और टाॅयलेट रोल से लेकर समुद्री जहाजों और विमानों के इंजनों की मरम्मत करने जैसी सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले एक लाभदायक औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना कर सकते हैं.”

भारत भी एक प्रभावशाली देश है और उसकी एक स्वतंत्र विदेश नीति और राजनयिक नीति है: चीन

इस बीच चीन ने अपनी प्रतिक्रिया काफी संतुलित रखी है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने मीडिया से कहा, ‘‘हमनें अमेरिकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर की भारत यात्रा पर प्रासंगिक रिपोर्ट तैयार की हैं.’’

यह बताते हुए कि भारतीय रक्षा मंत्री जल्द ही चीन की यात्रा करेंगे, उन्होंने कहा, ‘‘भारत भी एक प्रभावशाली देश है और उसकी एक स्वतंत्र विदेश नीति और राजनयिक नीति है. भारत अपने हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियों का निर्माण करेगा.’’ हालांकि अभी पर्रिकर के दौरे की तारीख निश्चित नहीं हुई हैं लेकिन उनकी इस यात्रा के दौरान चीन इस मुद्देे को प्रमुखता से उठा सकता है.

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नैय्यर कहते हैं, ‘‘हमारे जैसे आकार वाले देश को इस बात की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि किसी दूसरे देश के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों को लेकर चीन क्या सोचता है.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘चीन के अमेरिका के साथ इससे कहीं अधिक बेहतर और घनिष्ठ संबंध रहे हैं.’’

सिब्बल पूछते हैं, ‘‘हमें चीन को लेकर चिंता करने की क्या जरूरत है? क्या वे कभी हमारे बारे में सोचते हैं जैसा उन्होंने हाल ही में यूएन में आतंकी मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई करने के भारत के अनुरोध को अवरुद्ध करवाकर किया.’’ वे आगे कहते हैं, ‘‘इस पहल का बड़ा मुद्दा चीन नहीं बल्कि पश्चिमी एशिया में अमेरिका के सैन्य अभियान हैं.’’

First published: 15 April 2016, 22:35 IST
 
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