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भाजपा तिरंगा यात्रा निकाल रही है लेकिन संघ इस तिरंगे से हमेशा नफरत करता रहा है

सुहास मुंशी | Updated on: 7 February 2017, 8:24 IST

भारत सरकार जिस योजना के तहत स्वतंता दिवस मनाने जा रही वह शायद भारत में स्वतंत्रता का सबसे बड़ा और सबसे लंबे समय तक चलने वाला आयोजन हो सकता है. सरकार ने अपने सभी सांसदों और विधायकों को अगले 15 दिनों में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के स्मारकों सहित 150 स्थानों तक कम से कम 8 फिट ऊंचा तिरंगा लेकर यात्रा करने को कहा है.

स्मृति ईरानी इस स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना लेकर सुदूर सियाचिन तक जा रही हैं, जहां वो वीर सैनिकों को राखी बांधेंगी. साथ ही देश की आजादी की 70वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में सरकारी और पार्टी के स्तर पर आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के लिये नामचीन हस्तियों की एक पूरी फौज भी उतारने की योजना है.

इसके अलावा 23 अगस्त को सरकार की 15 दिवसीय ‘याद करो कुर्बानी’ यात्रा के समापन के मौके पर देशभर के स्कूली बच्चों को इकट्ठा होकर राष्ट्रगान गाने के लिये भी कहा गया है.

एक तरफ जहां बीजेपी के शासन वाली सरकारें भारत की प्रशंसा में अपना सर्वस्व झोंक रही हैं वहीं दूसरी तरफ बीजेपी का वैचारिक जन्मदाता माना जाने वाला, हिंदू आंदोलनों का प्रेरणास्रोत, आरएसएस क्या कर रहा है? शायद तिरंगा फहराने की रस्म अदायगी से अधिक कुछ नहीं.

1950 के बाद से संघ ने कभी भी नागपुर स्थित अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया

1950 के बाद से संघ ने कभी भी नागपुर स्थित अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया. उन्होंने वहां पर सिर्फ भगवा ध्वज ही फहराया. फिर चाहे मौका स्वतंत्रता दिवस का रहा हो या फिर गणतंत्र दिवस का. अधी सदी से ज्यादा गुजर जाने के बाद उन्होंने 2002 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने के बाद पहली बार नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर तिरंगा फहराना प्रारंभ किया.

आरएसएस द्वारा वर्णित और चित्रित की जाने वाली भारत माता के हाथों में कभी भी तिरंगा ध्वज नहीं रहा बल्कि वे भगवा ध्वज लिए दिखती हैं. संघ और बीजेपी के सभी सदस्यों के लिए, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, एचआरडी मंत्री प्रकाश जावड़ेकर समेत तमाम नेता शामिल हैं, के लिए यही भगवा ध्वज ‘गुरु’ के समान हैं.

इसी वर्ष दो अप्रैल को आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े नेता सर कार्यवाह सुरेश ‘भैय्याजी’ जोशी ने तिरंगे झंडे और आरएसएस के ‘गुरु’ या भगवा ध्वज को बराबर का सम्मान देने का आग्रह किया.

संघ की आधिकारिक मीडिया वेबसाइट के हवाले से महासचिव सुरेश ‘भैयाजी’ जोशी ने कहा, ‘हमारे लिये तिरंगा और भगवा समान रूप से वंदनीय हैं.’

एक मीडिया संस्थान ने जोशी को उद्धृत करते हुए कहा कि भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज की तरह सम्मान देने में कोई हर्ज नहीं है क्योंकि तिरंगा भी भगवा ध्वज से अलग नहीं है.

प्रारंभ से ही आरएसएस का भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रतीकों, जैसे राष्ट्रीय ध्वज और संविधान, से दूरी बनाए रखने का इतिहास रहा है.

22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान सभा ने सर्वसम्मति से राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया. यह एक बेहद ही भावनात्मक क्षण था जब आजादी की शैशवावस्था में कदम रख रहे भारत ने स्वयं की पहचान स्थापित करने की दिशा में पहला कदम बढ़ाया था और एक राष्ट्रीय प्रतीक के माध्यम से अपनी तमाम विविधताओ को एक सूत्र में पिरोया था.

आरएसएस द्वारा वर्णित और चित्रित की जाने वाली भारत माता के हाथों में कभी भी तिरंगा ध्वज नहीं रहा

लेकिन इसके सिर्फ एक सप्ताह बाद ही, यानि 29 जुलाई को हिंदू दक्षिणपंथ के प्रमुख आध्यात्मिक चेहरे विनायक दामोदर सावरकर, जिनका जन्मदिवस नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद निरंतर रूप मनाया जा रहा है, का भारत के राष्ट्रीय ध्वज के संबंध में यह कहना था- ‘भारतीय संघ द्वारा अपनाये गए नए ध्वज में मौजूद अच्छाईयों, जो कम आपत्तिजनक हैं, का उल्लेख करते हुए मैं जोरदार ढंग से यह बात कहना चाहता हूं कि इसे कभी भी हिंदुस्तान के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में मान्यता नहीं मिलेगी.’

‘हिंदुत्व’ शब्द को गढ़ने वाले सावरकर ने अपनी बात के पक्ष में दो तर्क प्रस्तुत किये थे जो पाॅपुलर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘हिस्टोरिक स्टेटमेंट्स बाइ वीडी सावरकर’ नाम की किताब में संकलित हैं. उनके अनुसार भारतीय संघ या फिर ‘तथाकथित’ संविधान सभा अंग्रेजों द्वारा गठित की गई थी और इसका चुनाव देशवासियों ने राष्ट्रीय स्तर के जनमत संग्रह के माध्यम से नहीं किया था.

इसके अलावा एक और कारण था भारत संघ का जिक्र उन्हें ‘भारत की एकता के टूटने’ की याद दिलाता था.

सावरकर आगे कहते हैं, ‘नहीं, हमारी मातृभूमि और देवभूमि हिंदुस्तान जो कि इंडस से लेकर सिंधु तक अविभाजित और अविभाज्य है का आधिकारिक ध्वज एक कृपाण और कुंडलिनी से परिपूर्ण भगवा ध्वज के अलावा और कुछ नहीं हो सकता... हिंदुत्व किसी भी सूरत में इस अखिल भारतीय भगवा ध्वज के अलावा किसी अन्य झंडे के सामने अपना सिर नहीं झुका सकता.’

गांधीजी और नेहरू को कभी भी आरएसएस और उसके राष्ट्रवाद के ब्रांड पर भरोसा नहीं था

कुछ इसी से मिलते जुलते विचार श्री गुरूजी के उपनाम से जाने जाने वाले एमएस गोलवलकर के भी थे. वे संघ के दूसरे सरसंघचालक और भारत में अभी तक सक्रिय हिंदुत्व आंदोलन के प्रेरणास्रोत रहे हैं. गोलवलकर ने न सिर्फ भारतीय तिरंगे के विचार का खुलकर विरोध किया बल्कि उनका तो भारतीय संविधान में भी विश्वास नहीं था.

अपनी किताब ‘विचार नवनीत’ जिसे अंग्रेजी में ‘बंच आॅफ थाट्स’ के नाम से अनुवादित किया गया है, में गोलवलकर कहते हैं, ‘हमारे नेताओं ने हमारे लिये एक नया ध्वज चुनने का फैसला किया है. उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह हमारी समृद्ध विरासत को अस्वीकृत करने और बिना सोचे-समझे दूसरों की नकल करने का एक स्पष्ट उदाहरण है.’

वो आगे लिखते हैं, 'कौन इसे सही और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण मानेगा? यह सिर्फ एक जल्दबाजी में लिया गया राजनीतिक समाधान है. हमारा देश समृद्ध विरासत से भरपूर प्राचीन और महान देश है. क्या तब भी हमारे पास अपना एक झंडा तक नहीं है? बेशक हमारे पास है. तो फिर यह दिवालियापन क्यों?’

लेकिन संविधान का विकल्प क्या हो, जिसे बीआर अंबेडकर के नेतृत्व वाली एक समिति ने कड़ी मशक्कत के बाद तैयार किया था?

आॅर्गनाइजर के एक अंक में, 30 नवंबर 1949 के संपादकीय में गोलवलकर इसका भी समाधान सुझाते हैं- ‘मनु संहिता के कानून स्पार्टा के लाईकुर्गूस या पर्शिया के सोलोन से काफी पहले ही लिखे गए थे. आज की तारीख तक भी मनुसमृति में लिखे गए कानून दुनिया भर की प्रशंसा पाते हैं ओर सहज रूप से सर्वमान्य हैं. लेकिन हमारे संविधान के जानकारों की नजर में इनकी कोई अहमियत ही नहीं है.’

भारत के संविधान और तिरंगे के प्रति आरएसएस की नफरत उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की नजरों से बच नहीं सकी.

4 फरवरी 1948 को, गांधीजी की हत्या के तीन दिन बाद और आरएसएस पर पाबंदी के दो दिन बाद गोलवलकर और सरकार के बीच हुए पत्राचार के संकलन ‘जस्टिस आॅन ट्रायल’ के अनुसार, गृह मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति कहती है:

‘तथापि संघ की हानिकारक और आपत्तिजक गतिविधियां बेरोकटोक जारी हैं और संघ की गतिविधियों से प्रेरित और प्रायोजित कई लोगों को अपना शिकार बना चुकी है. इसका सबसे ताजा औैर कीमती शिकार खुद गांधीजी हुए हैं.’

महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. और उस पूरे वर्ष गोलवलकर संघ पर से प्रतिबंध को हटवाने के लिये सरकार से मिन्नतें करते रहे थे.

आरएसएस से प्रतिबंध हटाने के बदले सरदार पटेल ने जो शर्त रचाी थीं उनमें राष्ट्रीय ध्वज को ‘‘स्पष्ट स्वीकृति’’ देने की शर्त भी थी. और संघ पर लगे प्रतिबंध को हटवाने की एवज में गोलवलकर ने स्वयं आरएसएस की ओर से राष्ट्रीय ध्वज और संविधान को स्वीकार करने की सहमति दी थी.

14 नवंबर 1948 को गृह मंत्रालय द्वारा जारी की गई एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार:

‘उन्होंने (गोलवलकर) ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों को ही पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि आरएसएस पूरी तरह से भारत के धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा से सहमत हैं और साथ ही वे देश के राष्ट्रीय ध्वज को भी अपनाते हैं और साथ ही गुजारिश करते हैं कि फरवरी से उनके सगठन पर लगा प्रतिबंध अब हटा लेना चाहिये.’

नेहरू को कभी भी आरएसएस और उसके राष्ट्रवाद के ब्रांड पर भरोसा नहीं था. और जैसा कि स्पष्ट है गांधीजी को भी नहीं था.

27 अक्टूबर 1948 को नेहरू द्वारा पटेल को लिखे गए एक पत्र में जो ‘सरदार पटेल्स सिलेक्ट काॅरसपोंडेंस 1945-50’ नाम से उपलब्ध है, में नेहरू संघ को लेकर गांधीजी की राय का हवाला देते हैं:

‘मुझे याद है कि बापू ने गोलवलकर के साथ अपनी पहली मुलाकात के बारे में बताते हुए कहा था कि वे उनसे आंशिक रूप से प्रभावित तो हुए हैं लेकिन वे उनपर भरोसा नहीं कर सकते. अपनी दूसरी या तीसरी मुलाकात के बाद उन्होंने गोलवलकर और आरएसएस को लेकर बेहद कड़ी राय व्यक्त की और कहा कि उनकी बातों पर भरोसा करना नामुमकिन है. वे अपनी बातचीत मे तो बेहद संतुलित प्रतीत होते थे लेकिन उन्हें अपने कहे शब्दों के उलट करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था.’

नेहरू आगे कहते हैं कि उनकी सोच भी बिल्कुल ऐसी ही है: ‘हमें देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी रिपोर्ट प्राप्त हो रही हैं जो आरएसएस की अवांछनीय गतिविधियों के बारे में बता रही हैं. इसलिये मेरा सुझाव है कि हमें मौजूदा परिस्थितियों में आरएसएस से संबंधित कोई भी निर्णय लेते समय अत्याधिक सावधान रहने की आवश्यकता है.’

First published: 12 August 2016, 8:06 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

प्रिंसिपल कॉरेसपॉडेंट, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में आने से पहले इंजीनियर के रूप में कम्प्यूटर कोड लिखा करते थे. शुरुआत साल 2010 में मिंट में इंटर्न के रूप में की. उसके बाद मिंट, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मेल टुडे में बाइलाइन मिली.

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