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क्यों बार-बार रंग बदलते हैं कश्मीर के अब्दुल्ला और मुफ्ती

गौहर गिलानी | Updated on: 2 December 2015, 22:41 IST
QUICK PILL
  • फारूक़ अब्दुल्ला और मुफ्ती मोहम्मद सईद, जब सत्ता से बाहर होते हैं तब अक्सर हुर्रियत की भाषा बोलते हैं और जब कुर्सी मिल जाती है तो दिल्ली के गुण गाने लगते हैं. 
  • ये \'उदार अलगाववादी\' कश्मीर में तो नई दिल्ली का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन नई दिल्ली में कश्मीर का पक्ष नहीं लेते. चुनाव जीतने के बाद ये \'देशभक्त भारतीय\' हो जाने का दिखावा करते हैं.

कश्मीर के राजनेताओं की बयानबाजी का एक निर्धारित पैटर्न देखकर उनके सत्ता में होने या बाहर होने का पता चल जाता है. 

अबदुल्ला और मुफ्ती परिवार राज्य के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार माने जाते हैं. जब वो सत्ता से बाहर होते हैं तो अक्सर हुर्रियत की भाषा बोलते हैं और जब कुर्सी मिल जाती है तो दिल्ली के गुण गाने लगते हैं. जब वे सत्ता में नहीं होते तब 'उदार अलगाववादी' हो जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद 'देशभक्त भारतीय' हो जाते हैं. 

शायद इसी कारण से इस धारणा को बल मिलता जा रहा है कि वे कश्मीर में तो नई दिल्ली का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन नई दिल्ली में कश्मीर का पक्ष नहीं लेते. 

पूर्व मुख्यमंत्री फारूक़ अब्दुल्ला की एक बुरी आदत है खबरों में बने रहने के लिए बयानबाजी करने की. इसमें कोई दो राय नहीं कि वे मीडिया के चहेते हैं. 

एक संगोष्ठी में दिए गए एक कथित रूप से ताजा बयान में उन्होंने कहा, "दक्षिण एशिया में शांति के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे संबंध जरूरी हैं."

उन्होंने कहा, "यदि राज्य में पूरी भारतीय सेना भी तैनात कर दी जाए, यह तब भी आतंकवादियों और उग्रवादियों से लोगों की रक्षा नहीं कर सकती."

दोनों मुल्कों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों और वार्ता के लिए उन्होंने कहा, "यदि ऐसा नहीं होता है तो जो फारूक़ अब्दुल्ला आज आपके सामने बोल रहा है, कल यहां नहीं होगा. कोई आतंकवादी आएंगा और मुझे मार डालेगा."

सबकुछ यहीं खत्म नहीं होता.

बदलते बयान वाले व्यक्ति

एक सप्ताह पहले, न्यूज एजेंसी एएनआई के हवाले से उनका एक बयान आया था. जिसमें कहा गया था, "पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर पाकिस्तान में है और वहीं रहेगा. जम्मू और कश्मीर भारत में हैं और यहीं रहेंगे. हमें यह समझने की जरूरत है."

इस बयान ने अनिवार्य रूप से कश्मीर में भारत की स्थिति को चुनौती दी. 22 फरवरी 1994 को संसद ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए घोषणा की, "जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग थे, हैं और रहेंगे और इसे देश से अलग करने के किसी भी प्रयास को समस्त आवश्यक तरीके अपनाते हुए विरोध किया जाएगा."

इसके अलावा प्रस्ताव में मांग की गई थी "पाकिस्तान ने भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य के जिस हिस्से में चढ़ाई कर कब्जा कर लिया है, उसे खाली करना होगा."

फारूक़ का ताजा बयान के मद्देनज़र याद करें कि जब वो राज्य के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कहा था, "पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के अंदर बने आतंकी शिविरों को भारत को बम से उड़ा देना चाहिए."

लगता है उमर अबदुल्ला भी अपने पिता के रास्ते पर चलते हैं. 2014 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री उमर ट्विटर पर काफी सक्रिय हो गए थे. 

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर उनकी टिप्पणी अक्सर दिलचस्प होती है. अब तक किए गए उनके कुछ ट्वीट तो ऐसे लगते हैं जैसे वो हुर्रियत नेताओं के ट्वीट हों.

भाजपा के साथ गठबंधन के कुछ सप्ताह पूर्व महबूबा मुफ्ती ने वादा किया था कि कश्मीरी कभी भाजपा का साथ नहीं देंगे

एएनआई पर अपने पिता के बयान के बारे में उमर ने ट्वीट किया, "मैं बहुत आश्चर्यचकित हूं कि चैनल मेरे पिता के विचारों को ऐसे दिखा रहे हैं जैसे आज तक उन्होंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं."

7 नवंबर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रीनगर में एक रैली को संबोधित कर रहे थे, उस समय उमर ने कई ट्वीट किए जिनमें से एक में उन्होने लिखा, "श्रीनगर में दर्शकों के रूप में मौजूद बिहार के लोगों की संख्या देखते हुए माननीय प्रधानमंत्री को राज्य में चुनाव खत्म होने से पहले आना चाहिए था."

उन्होंने लिखा, "मुफ्ती सैयद (सईद) सही हैं कि 7 नवंबर को प्रधानमंत्री की श्रीनगर रैली ऐतिहासिक होगी- रैली को संभव बनाने के लिए गिरफ्तार लोगों की संख्या के हिसाब से."

उमर ने ईद-उल-अजहा त्योहार के मौके पर इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने के लिए पीडीपी-भाजपा सरकार की आलोचना की.  उन्होंने ट्वीट किया, "ओह प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया पर भाषण को सुनने की विडंबना यह है कि उनकी पार्टी और सहयोगी दलों की वजह से जम्मू-कश्मीर तीन दिन पूरी तरह से संपर्क से कट गया है."

बेशक, उमर ने इस बात को आसानी से छिपा लिया कि उनकी सरकार भी असंतोष दबाने के लिए अक्सर इंटरनेट सेवाओं को बंद कर देती थी. उन्हीं के शासन के दौरान 2010 की गर्मियों में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान 120 से ज्यादा युवा जिनमें अधिकांश किशोर थे, पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा मार दिए गए थे.

साथ देने में कमी

अब्दुल्ला के बयान पर की गई टिप्पणी के विरोध में अब उनके प्रतिद्वंदी और मौजूदा शासक मुफ्ती भी सामने आ गए हैं. 

2000 के दशक की शुरुआत में सत्ता पाने के बाद, मुफ्ती मोहम्मद सईद की मशहूर बात, "कश्मीरी आतंकवादियों को अब और बंदूक उठाने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनके प्रतिनिधि अब विधानसभा में आ गए हैं."

इस साल मार्च में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपने वैचारिक विरोधी भाजपा के साथ गठबंधन सरकार को "ऐतिहासिक" बताया. जबकि मीडिया ने इस गठबंधन को "नरम अलगाववादियों और कट्टरपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों के बीच वैवाहिक संबंध" करार दिया.

बीते दशक की शुरुआत में सईद की बेटी और वारिस महबूबा मुफ्ती ने भारतीय सेना द्वारा मारे गए आतंकवादियों के परिवारों से मुलाकात की थी. वो अक्सर मारे गए आतंकवादियों की विलाप करती मां-बहनों के बीच जाकर उन्हें सांत्वना देते हुए उनके साथ खुद आंसू बहाती थीं. 

मतदाताओं को खुश रखने के साथ ही दिल्ली का समर्थन पाने के लिए मुफ्ती और अबदुल्ला 'उदार अलगाववाद' का इस्तेमाल करते हैं

पिछले चुनाव में प्रचार के दौरान महबूबा ने मतदाताओं से वादा किया था, "कश्मीरी अपना सबकुछ बलिदान कर देंगे लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाएंगे. कश्मीरी कभी अपने सम्मान और गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे."

उनके इस भाषण का वीडियो वायरल भी हुआ था. इंटरनेट पर उनका दोहरेपन को उजागर करने के लिए यूजर्स ने इसे जमकर शेयर किया. 

इस सवाल ये है कि ऐसी स्थितियों में कश्मीर के शीर्ष नेताओं दिखावा क्यों करते हैं? यह 'एक तीर से दो निशाने' वाली रणनीति है.

वे 'उदार अलगाववाद' का इस्तेमाल करते हैं ताकि नई दिल्ली को ब्लैकमेल कर उनका पक्ष पा सकें, जबकि खुद को 'आजादी भावना' का सच्चा प्रतिनिधि होने का ढोंग करते हैं. 

First published: 2 December 2015, 22:41 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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