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द्रविड़ आंदोलन जिसने करुणानिधि को तमिलनाडु की राजनीति में स्थापित कर दिया

कैच ब्यूरो | Updated on: 8 August 2018, 11:20 IST

करुणानिधि एक ऐसा नाम जिसने कि 60 सालों के राजनीति करियर में कभी हार का सामना नहीं किया. 94 साल की उम्र में भी राजनीति में सक्रिय रहे. आज पंचतत्व में विलीन करुणानिधि ने 60 सालों में अपनी जो जननेता की चावो बनाई वो आज उनके निधन पर सडकों पर साफ़ दिख रही है. करुणानिधि के समर्थकों में कल शाम से ही शोक की लहर है.

राजनीति में करुणानिधि का आगमन द्रविड़ आंदोलन के माध्यम से हुआ था. इसी आंदोलन से उन्होने अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसे आज तक के राजनीति के करियर में कोई भी चुनौती नहीं दे सका. अपनी उसी पहचान के चलते आज तक करुनानिधि ने हार का सामना नहीं किया.

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द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत ब्राह्मणवादी सोच, धार्मिक अंधविश्वासों और हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों पर करारा प्रहार करने के लिए की गई थी. रामास्‍वामी 'पेरियार' को इसका जनक माना जाता है. इस आंदोलन में मनुस्मृति जैसी किताबों को भी जलाया गया था.

राजनीतिक पार्टी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कडगम) ने तमिलनाडु में पेरियार के विचारों को अपनाया और अपनी एक अलग जगह बनाई. पेरियार ने 1944 में द्रविड़ कडगम का गठन किया, लेकिन 1949 में पेरियार के बेहद करीबी सीएन अन्‍नादुरै का उनके साथ मतभेद हो गया.

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वहीं अन्‍नादुरै ने 17 सितंबर, 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डीएमके) की स्‍थापना की. उधार पेरियार की मांग थी की स्‍वतंत्र द्रविड़ देश बने जबकि अन्‍नादुरे की मांग एक अलग राज्य की ही थी.

डीएमके के साथ पहले करुणानिधि नहीं आए, वो पेरियार के समर्थक थे. लेकिन 1969 में सीएन अन्‍नादुरई के निधन के बाद करुणानिधि ने डीएमके की कमान संभाली और 50 सालों तक उसके मुखिया बने रहे. अब इस पार्टी की कमान उनके बेटे एमके स्‍टालिन के पास है.

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1957 में करुणानिधि पहली बार तमिलनाडु विधानसभा के विधायक बने और 1967 में वे सत्ता में आए और उन्हें लोक निर्माण मंत्री बनाया गया. 1969 में अन्नादुरै के निधन के बाद पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने.

First published: 8 August 2018, 10:16 IST
 
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