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भुखमरी के साम्राज्‍य में अश्‍लीलता के हरे-भरे बांध

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 16 May 2016, 8:13 IST
QUICK PILL
  • बुंदेलखंड में सूखे के हालात इतने विकट है कि लोगों ने अपने पालतू जानवरों को सड़कों के किनारे छोड़ दिया है.
  • जिन बांधों से बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने का दावा किया गया था अव्वल तो उनमें पानी नहीं है और जहां थोड़ा बहुत है उसे थर्मल पॉवर प्लांट वाले चोरी कर रहे हैं.

बुंदेलखंड में पिछले दो साल से जो चल रहा है, उसे सूखे का नाम देना स्थितियों को एक तकनीकी शब्‍दावली में बांध कर व्‍यापक तस्‍वीर से आंख चुराने जैसा काम है. मराठवाड़ा में इस स्थिति के लिए एक सटीक स्‍थानीय शब्‍द चलता है 'दुष्‍काल', जिसका हिंदी में प्रयोग दुर्लभ है.

यह दुष्‍काल दरअसल केवल पानी तक सीमित नहीं है. इसका ताल्‍लुक जीने की बुनियादी सुविधाओं, भोजन, कपड़ा, आजीविका, रोजगार और समूची इंसानी जिंदगी के साथ है. बुंदेलखंड के दुष्‍काल के पीछे भी वही कारण हैं जो मराठवाड़ा में हैं - भ्रष्‍टाचार और विकास का भ्रामक मॉडल.

शायद यही वजह है कि आज जब बुंदेलखंड के सूखे पर चारों ओर बात हो रही है तो उसमें झांसी-ललितपुर पट्टी को उसी तरह उपेक्षित कर दिया गया है जैसे महाराष्‍ट्र में मराठवाड़ा पर बहस के बीच विदर्भ को भुला दिया गया है. 'सेलेक्टिव' और 'सुविधाजनक' हो जाना पत्रकारिता हो गई है.

बुंदेलखंड के दुष्‍काल के पीछे भी वही कारण हैं जो मराठवाड़ा में हैं - भ्रष्‍टाचार और विकास का भ्रामक मॉडल

इसी विडंबना की एक महीन तस्‍वीर हमें झांसी से ललितपुर की सड़कों पर जमघट लगाई गायों के रूप में दिखाई देती है. झांसी शहर में प्रवेश करते ही हाइवे के किनारे एक बछड़े की लाश दिखाई देती है. पानी की कमी के चलते लोगों ने अपने मवेशियों को सड़कों पर इस कदर खुला छोड़ दिया है कि चालीस किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से लगातार एक किलोमीटर चल पाना भी मुश्किल है.

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गायों के लिए ऐसा दुष्‍काल बुंदेलखंड में कभी नहीं आया था, हालांकि सड़क पर अपनी मौत के इंतज़ार में टहलती इन गायों को ललितपुर के कचनौंदा की गायों से रश्‍क होता होगा जो फिलहाल गुड़गांव की इम्‍पोर्टेड घास खाने का सुख ले रही हैं. महज डेढ़ सौ किलोमीटर के भीतर फैली विरोधाभास की यह तस्‍वीर इंसानी गुरबत की हकीकत को खोलकर रख देती है.

ललितपुर से करीब चालीस किलोमीटर दूर सजनाम नदी के ऊपर यूपी का पहला ऑनलाइन प्रबंधित बांध बना है कचनौंदा बांध. इसका लोकार्पण हुए चार साल हो गया हालांकि पिछले साल अक्‍टूबर में पहली बार आए पानी के बाद से नदी अब तक सूखी है.

यह बांध भुखमरी के साम्राज्‍य के बीच अश्‍लीलता का एक ऐसा हरा-भरा टापू है, जहां हर रोज़ शाम को बाइक सवार प्रेमी जोड़े और संपन्‍न परिवार पिकनिक मनाने आते हैं. बांध के ऑपरेटर लखनऊ निवासी संजय यादव को इस बात का दुख है कि 65,000 रुपये प्रति ट्रक के हिसाब से गुड़गांव से मंगाई गई इम्‍पोर्टेड घास पानी के अभाव में पीली पड़ रही है और उसे गायें चर रही हैं. वे कहते हैं, ''करोड़ों रुपये की घास यहां लगाई गई है. ये जो लाइट के पोल आप देख रहे हैं, इनके एक बल्‍ब की कीमत 18000 रुपये है.''

इम्‍पोर्टेड घास, बच्‍चों की खिलौना ट्रेन और महंगी लाइटों की आड़ में पानी की उस नीली झील को छुपा पाना नामुमकिन है जिसमें फाइबर की रंगीन नावें खड़ी हैं. यहां सैलानियों के लिए बोटिंग की सुविधा की गई है जबकि महज आधा किलोमीटर दूर नदी में बचा-खुचा गंदला पानी लोगों की प्‍यास बुझाने के काम आ रहा है.

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यह बांध अपनी तय भूमिका के अलावा दूसरे सारे काम कर रहा है क्‍योंकि अब तक इस बांध से नहरें नहीं निकली हैं. नहरें निकलेंगी, इसकी संभावना कम ही लगती है क्‍योंकि स्‍थानीय जानकारों के मुताबिक इसे बनाने का मूल उद्देश्‍य बजाज कंपनी के उस थर्मल पावर प्‍लांट को पानी देना है, जिसकी चिमनी बांध से साफ दिखाई देती है.

एक आलीशान गेस्‍ट हाउस भी बांध के भीतर है जहां स्‍थानीय लोगों के मुताबिक कंपनी के मालिकान और बड़े अफसर आकर विश्राम करते हैं. उसके अलावा सुरक्षा के लिए एक पुलिस चौकी भी परिसर में बनाई गई है.

इस बांध की लागत 2007 में 89 करोड़ रुपये थी जिसे 2009 में संशोधित कर 425 करोड़ पर ला दिया गया. इसकी आरंभिक परिकल्‍पना यह थी कि इससे जो नहर निकलेगी, वह पहले से मौजूद एक पुरानी नहर को पानी मुहैया कराएगी जिससे इसका पर्यावरणीय व सामाजिक नुकसान न्यूनतम होगा.

बाद में जब लागत बढ़ाई गई, तो मौजूदा नहर के समानांतर लंबी दूरी तक 25 फुट या उससे ऊपर एक नई नहर बनाने की योजना इसमें जोड़ दी गई.

बार ब्‍लॉक स्थित भैलोनी लोध पंचायत के लोगों ने यहां पर्यावरणविद् भारत डोगरा के नेतृत्‍व में 2012 में पहुंची एक फैक्‍ट फाइंडिंग टीम को बताया कि उनसे नहर की ऊंचाई बढ़ाने की इजाज़त नहीं ली गई थी और इससे होने वाला रिसाव न केवल उनके खेतों बल्कि कच्‍चे घरों को भी बरबाद कर देगा जो 25 फुट से नीचे स्थित हैं. छह गांवों की करीब दस हज़ार की आबादी इस बांध के संशोधित रूप से प्रभावित होगी. ये सारे गांव बार ब्‍लॉक में स्थित हैं.

छह गांवों की करीब दस हज़ार की आबादी इस बांध के संशोधित रूप से प्रभावित होगी

वास्‍तविक स्थिति का अंदाज़ा तो तब लगेगा जब बांध में पानी आएगा, लेकिन इस बांध के मूल उद्देश्‍य को लेकर राष्‍ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में झांसी के मोहर सिंह यादव की तरफ से एक केस दर्ज किया गया था जिसे जानना ज़रूरी है.

उनका कहना था कि बजाज कंपनी की ललितपुर पावर जनरेशन कंपनी ने पर्यावरणीय मंजूरी की इस शर्त का उल्‍लंघन किया है कि ''पावर प्‍लांट के परिचालन से जुड़ी गतिविधियों के लिए किसी भी स्‍थानीय जल संसाधन को नहीं छेड़ा जाएगा.''

यादव ने इस प्‍लांट को मिली पर्यावरणीय मंजूरी रद्द करने की मांग इस आरोप के आधार पर की थी कि प्‍लांट सीधे नदी या चकबांध से पानी अपनी ओर मोड़ रहा है जबकि वह पानी खेतीबाड़ी के काम आता है. इस याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने पिछले साल सितंबर में प्‍लांट को निर्देश दिया था कि वह राजघाट लघु नहर से परियोजना स्‍थल तक ''जल्‍द से जल्‍द, अधिकतम तीन महीने के भीतर'' पाइपलाइन के निर्माण का काम पूरा कर ले. यह काम अब तक पूरा नहीं हो सका है.

कचनौंदा बांध का मामला संयोग से मराठवाड़ा के परभणी जिले के मासोली बांध के काफी करीब ठहरता है. यहां पावर प्‍लांट की ओर पानी मोड़ा जा रहा है, तो वहां गन्ना मिल की ओर पानी मोड़े जाने का मामला है.

यहां पावर प्‍लांट की ओर पानी मोड़ा जा रहा है, तो वहां गन्ना मिल की ओर पानी मोड़े जाने का मामला है

मासोली बांध में 2013 की गर्मियों तक जायकवाड़ी या उजनी बांध के मुकाबले (जहां डेड स्टोरेज का पानी इस्तेमाल में लाया जा रहा है और लाइव स्टोरेज शून्य है) 37 फीसदी जल भंडार उपयोग के लायक था (लाइव स्टोरेज) और महाराष्‍ट्र का यह इकलौता बांध था जो 2012 में बिना बारिश के भी 100 फीसदी भरा हुआ था.

इसके बावजूद इस बांध के कमान क्षेत्र में आने वाले आठ गांवों में से सिर्फ तीन को 2013 में इससे पानी मिल रहा था. इसके उलट बांध के करीब स्थित गंगाखेड़ चीनी मिल को आधिकारिक तौर पर यहां से 2 टीएमसी पानी मिलता है जबकि बाकी पानी पाइपलाइनों द्वारा अवैध तरीके से बांटा जाता रहा है. गन्‍ना मिलों या पावर प्‍लांटों के लिए बांधों से पानी की चोरी की परिघटना एक ऐसा खुला सच है जिसे कोई चुनौती नहीं देता.

एनजीटी ने पिछले साल ही मोहर सिंह यादव की याचिका पर सुनवाई पूरी कर केस को बंद कर दिया. अभी अकेले ललितपुर में ऐसे 13 बांध बनाए जाने हैं जिनमें एक बांध तो बालाबेहट में इजरायल की मदद से रबड़ का बनाया जाना है, जिसे लेकर इलाके में काफी चर्चाएं हैं.

ललितपुर जिला सबसे ज्‍यादा बांधों के लिए मशहूर हो चुका है, लेकिन अफसोस कि यहां भूख-प्‍यास से हो रही मौतों की संख्‍या भी लगातार बढ़ती जा रही है. चारों ओर मर रहे इंसानों और पशुओं के साम्राज्‍य में खेती के नाम पर बरबाद किए गए 425 करोड़ रुपये (गुणा 13) की जवाबदेही आखिर किसकी है?

भूख से परलोक सिधार चुके सुखलाल, मिट्टी खा रही शकुन और भीख मांग रही भागवती समेत भुखमरी के कगार पर खड़े बुंदेलखंड के लाखों लोगों के ज़ेहन में फिलहाल यही एक सवाल है.

First published: 16 May 2016, 8:13 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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