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दिल्ली यूनिवर्सिटी के निलंबित प्रोफ़ेसर जीएन साईंबाबा सहित 5 को आजीवन कारावास

अश्विन अघोर | Updated on: 8 March 2017, 9:10 IST

महाराष्ट्र की गढ़चिरौली अदालत ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईंबाबा सहित 5 लोगों को माओवादी संगठनों के संपर्क में होने और देश के खिलाफ षडयंत्र रचने का आरोपी माना है. अदालत ने साईंबाबा सहित 5 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, जबकि एक अन्य साथी विजय टिर्की को 10 साल की सजा दी है. साईबाबा के साथ जिन 4 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है, वे हैं जेएनयू के छात्र और डीएसयू के सदस्य हेम मिश्रा, पूर्व पत्रकार प्रशांत राही, सामाजिक कार्यकर्ता महेश तिर्की और पांडु नारोटे. विजय तिर्की भी सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

क्या थे सबूत?

इस मामले में अंतिम कार्रवाई पिछले साल नवंबर में शुरू हुई थी. प्रो. साईंबाबा और उनके साथियों पर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादियों) के साथ संबंध होने का आरोप था. मिश्रा और राही को सितंबर 2013 में गिरफ्तार किया गया था. मिश्रा को गढ़चिरौली जिले की अहेरी से और राही को छतीसगढ़ से. इस मामले की जांच कर रही पुलिस का दावा है कि उसे दस्तावेज, कंप्यूटर हार्ड डिस्क और पैन ड्राइव मिले हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि प्रो. साईबाबा गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त थे.

इसके अलावा पुलिस पूछताछ के दौरान दिए गए मिश्रा और राही के बयान भी इस बात के साक्षी थे. बरामद सामग्री और दोनों के बयान के आधार पर साईंबाबा को मई 2014 में दिल्ली में उनके आवास से गिरफ्तार किया गया था. इसी से खुलासा हुआ कि साईंबाबा नक्सल समर्थक गतिविधियों में लिप्त हैं.

ज़मानत

मई 2014 में गिरफ्तारी के बाद प्रो. साईबाबा को नागपुर सेंट्रल जेल में रखा गया था. स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उन्होंने बार-बार जमानत की मांग की लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने उनके सभी आवेदन रद्द कर दिए. अंतत: उन्हें अप्रैल 2015 में बेल मिल गई. उनकी सेहत को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें बेल पर रिहा करने का फैसला दे दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने बिना किसी ठोस वजह के उनकी बेल का विरोध करने के लिए महाराष्ट्र सरकार को फटकार भी लगाई.

जस्टिस जेएस खेहर की सर्वोच्च न्यायालय बेंच ने सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार को व्हीलचेयर पर रहने वाले एक प्रोफेसर के लिए संवेदनहीन बताया था. अभियोग पक्ष का आरोप था कि यदि प्रोफेसर को रिहा कर दिया गया, तो वे माओवादी विचारधारा का प्रचार करेंगे. पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया और उन्हें बेल दे दी. इस शर्त के साथ कि जब भी जरूरत पड़ेगी, उन्हें कोर्ट में हाजिर होना होगा.

माओवाद का प्रचार

तत्कालीन आईजी रवींद्र कदम के मुताबिक साईंबाबा डीयू और जेएनयू में वामपंथी रुझान वाले छात्र संगठनों के साथ सक्रिय थे. वे नक्सलियों के लिए शहरी इलाकोंं में रिक्रूटमेंट एजेंट के रूप में काम करते थे. कदम ने कहा, ‘वे छात्रों का मानस तैयार करते थे और उन्हें माओवादी आंदोलनों में शामिल करते थे. हमारे पास प्रामाणिक दस्तावेज हैं कि साईंबाबा माओवादी गतिविधियों और प्रतिबंधित संगठनों में छात्रों को शामिल करवाते थे. हालांकि साईंबाबा डीयू में पढ़ाते थे, पर वे जेएनयू और डीयू के छात्र संघ के कार्यों में भी हिस्सा लेते थे. वे दोनों विश्वविद्यालयों में पीएचडी छात्रों के गाइड थे.’

कदम ने आगे कहा, ‘जेएनयू स्कॉलर रितुपर्णा गोस्वामी को साईंबाबा ने भर्ती किया था. वे जेएनयू से पीएचडी हैं और सीपीआई (माओवादी) के अंडरग्राउंड काडरों में शामिल हैं. अब वे प्रतिबंधित संगठन में महत्वपूर्ण ओहदे पर हैं. हमने साईंबाबा और गोस्वामी के संबंधों को प्रमाणित करने के लिए ठोस सबूत इकट्टे किए हैं.’

First published: 8 March 2017, 7:47 IST
 
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