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नोटबंदी ने छीना मासूम बच्चों के मुंह से निवाला!

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 February 2017, 6:41 IST
(एजेंसी)

मोदी सरकार के द्वारा लागू नोटबंदी से केवल आम जनता की जान ही सांसत में नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव के कारण मासूम बच्चों को भी खाना नसीब नहीं हो पा रहा है. नोटबंदी के कारण एक-एक निवाले को तरस रहे आंगनवाड़ी के मासूम बच्चों की सुध कौन ले, यह एक बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है.

इसी मामले में छत्तीसगढ़ के राजनांद गांव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता निशा चौरसिया ने बताया कि उन्होंने और उनके सहयोगियों ने नोटबंदी के फैसले के बाद किस तरह नवजात और बच्चों को खाना मुहैया कराया.

निशा बताती हैं कि स्वयंसेवी संस्था ने सभी लोगों से उधार लिए, बैंकों की लाइनों में खड़े रहे, अधिकारियों से मदद मांगी और यहां तक कि बच्चों और मां बनने वाली महिलाओं को खाना खिलाने के लिए अपनी जमा पूंजी भी खर्च कर दी, लेकिन अब मुश्किलें आ रही हैं. कहीं से कैश नहीं मिल पा रहा है, जिससे खाने-पीने की सामान्य वस्तुओं को जुटा पाना बेहद कठिन होता जा रहा है.

निशा चौरसिया दुनिया का सबसे बड़ा शिशु और बाल पोषण कार्यक्रम आईसीडीएस चला रही हैं. यह कार्यक्रम उस देश के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जहां 6 साल से कम उम्र के आधे से ज्यादा बच्चों में खून की कमी है, लेकिन 500 और 1000 रुपये के नोटों पर अचानक सरकार द्वारा बैन लगने से आईसीडीएस नेटवर्क मुश्किल में आ गया और बच्चों के लिए खाने का प्रबंध कर पाना मुश्किल होता जा रहा है.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा चलाए जाने वाले आईसीडीएस कार्यक्रम के मासिक आंकड़ों के मुताबिक नवंबर में बच्चों को आंगनवाड़ी से मिलने वाले खाने में 6 फीसदी की गिरावट आई.

इसका मतलब है कि करीब 16 लाख बच्चों को जो अनाज और सब्जियां दी जानी चाहिए थी वह उन्हें नहीं मिल पाईं. इम्यूनिटी शॉट्स नहीं मिलने के कारण उनकी स्वास्थ्य जांच भी नहीं हो पाई.

आंकड़ों के मुताबिक पिछले आठ महीनों की बात करें तो नवंबर में आंगनवाड़ी में बच्चों की संख्या में भी गिरावट देखी गई. यहां 16 फीसदी लड़के और 14 फीसदी लड़कियां नहीं आईं थीं.

अंग्रेजी अखबार टाइम्स अॉफ इंडिया से बातचीत में मुरादाबाद से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता चमन अारा ने बताया कि वह बैंकों से पैसा ही नहीं निकाल पा रहे थे और अनाज व सब्जियों पर डीलर्स द्वारा दिए जाने वाले उधार की भी एक सीमा है.

चमन अारा बताती हैं कि केंद्र सरकार को कम से कम बच्चों के लिए तो कुछ इंतजाम करने ही चाहिए थे. हमारे लिए बड़ा ही कठिन होता जा रहा है कि हम मासूम बच्चों के लिए खाने का इंतजाम कर पायें. यह भी पता नहीं चल पा रहा है कि हालात में कब सुधार आएगा.

First published: 24 December 2016, 1:46 IST
 
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