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क्यों नहीं विधान परिषदों को भंग दिया जाए: चुनाव आयोग

चारू कार्तिकेय | Updated on: 23 October 2016, 7:09 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • चुनाव आयोग ने विधान परिषदों के ज़रूरत पर सवालिया निशान लगाते हुए एक बार फिर सरकार को प्रस्ताव भेजा है कि क्या राज्यों की विधान परिषदों को सदा के लिए भंग कर दिया जाना चाहिए?
  • प्रस्ताव में विधान परिषदों की उपयोगिता पर सवाल उठाए गए हैं. ज्यादातर राज्यों में विधान परिषदों का कोई खास महत्व नहीं है, बस इतना कि वे संविधान के अनुसार चलती हैं.
  • इन विधान परिषदों को ख़त्म करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा, जो काफी मुश्किल है.

विधान परिषदों को भंग करने के सिलसिले में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने आयोग को एक चिट्ठी लिखी थी. अग्रवाल ने हाल ही उत्तर प्रदेश में संपन्न हुए विधान परिषद चुनाव के संदर्भ में यह बात कही, जिसमें समाजवादी पार्टी ने 35 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 

अग्रवाल का कहना है ये विधान परिषद ‘सफेद हाथी’ की तरह हैं. जनता के पैसे पर चल रही हैं और जनहित के काम की नहीं हैं. उन्होंने राज्यों में विधान परिषदों को भंग करने के पक्ष में बहुत से उदाहरण पेश किए. इस पर चुनाव आयोग ने देश में विधान परिषदों का इतिहास खोल कर रख दिया है और विधि मंत्रालय को चिट्ठी सौंपकर आयोग के पुराने प्रस्तावों का भी जिक्र कर दिया है. 

1999 में मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल ने कानून मंत्रालय को इस प्रस्ताव के पक्ष-विपक्ष में तर्क देते हुए काफी विस्तार से लिखा था और सरकार से अपील की थी कि वह इस विषय पर राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श करे.

क्या है विधान परिषद?

यह राज्य विधायिका का ही एक अंग होता है. राज्य सभा की तरह ही राज्यों में ऊपरी सदन. इसके सदस्यों का चुनाव जनता नहीं करती बल्कि संविधान में परिभाषित विधायिकाओं के समूह से होता है.

इसके सदस्य कौन हैं?

संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार

1- एक तिहाई-स्थानीय इकाइयां जैसे नगरपालिकाएं, जिला बोर्ड आदि.

2- बारहवां भाग-ऐसे स्नातक, जिन्होंने तीन साल में पढ़ाई की

3- बारहवां भाग- ऐेसे व्यक्ति जो कम से कम तीन साल के लिए सेकेंड्री स्कूल में शिक्षक रहे हों.

4- एक तिहाई- राज्य विधायिका के सदस्यों द्वारा, जो विधानसभा के सदस्य नहीं हैं.

5- बाकी का नामांकन राज्यपाल द्वारा किया जाता है.

क्या सभी राज्यों में विधान परिषद है?

अभी तक केवल 7 राज्यों में ऐसी परिषदें हैं. इनमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. कई राज्यों में विधायिका में यह दूसरी इकाई है ही नहीं और कुछ राज्यों ने कभी-कभार ये बनाईं और भंग कर दी गईं.

मजेदार बात यह है कि आज भी देश में तकरीबन उतनी ही विधान परिषदें हैं जितनी स्वतंत्रता के समय थीं. उस वक्त 8 विधान परिषदें हुआ करती थीं. इनमें आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं. 

इन परिषदों में क्या काम होता है?

एक, इनसे राज्य में विधायिका के कार्य को जांच के एक और स्तर से गुजरना होता है. दूसरा, इससे कुछ लोगों को चुनाव की कठिन प्रक्रिया से गुजरे बिना ही राज्य के लिए कानून बनाने में भागीदारी का अवसर मिलता है.

चुनाव आयोग को उनमें क्या खामी नजर आई?

गिल ने कहा कि बहुत से राज्यों ने विधान परिषदों को भंग कर दिया है. इससे यह संकेत मिलते हैं कि इन परिषदों की विधायिका में गंभीर विषयों पर बहस में काफी कम योगदान रहा है. दूसरा यह कि इनमें से ज्यादातर का गठन संविधान के अनुसार नहीं हुआ है. जैसे कि बिहार विधान परिषद पिछले 17 सालों से नाकारा ही साबित हुई है. इसकी एक तिहाई सीटें खाली पड़ी हैं.

तीसरा, हो सकता है स्वाधीनता के बाद उस वक्त केवल शिक्षकों की काउंसिल की जरूरत हो, जब अच्छे-खासे पढ़े लिखे और जानकारों की काफी कमी थी. अब हालात पूरी तरह बदल गए हैं. इसलिए इसके पुनरावलोकन की जरूरत है.

विशेषज्ञों का मत

विचारधारा में फर्क है. यहां तक कि राज्यपाल द्वारा नामित सदस्यों पर भी न्यायिक जांच की कार्यवाही होती है. मिसाल के तौर पर, पटना उच्च न्यायालय द्वारा विधान परिषद के सभी 12 नामित विधायकों को नोटिस दिया जाना. इस नोटिस में विधान परिषद के सदस्यों से अपने-अपने क्षेत्र में प्राप्त विशेषज्ञता साबित करने के लिए कहा गया है, जिसकी वजह से वे विधान परिषद में नामित किए गए हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षकों की तरह ही स्नातक विधायकों की अवधारणा भी अब पुरानी हो चुकी है और इसे भंग कर दिया जाना चाहिए.

संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर विस्तृत बहस और गहन जांच की जरूरत है. लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने कैच को बताया इस मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में काफी कुछ कहा जा सकता है लेकिन अभी देश में यही एक मुद्दा नहीं है और भी जरूरी मुद्दे हैं. 

उन्होंने कहा, चुनाव आयोग के आकलन इस बात से बिल्कुल मेल नहीं खाते कि विधान परिषदों को कुछ काम निपटाने होते हैं.

उन्होंने कहा, अगर विधान परिषदों की उपयोगिता पर बहस करने लगे तो बात राज्य सभा की उपयोगिता पर भी उठ सकती है क्योंकि इनकी कार्य प्रणाली, भूमिका और समस्याएं कुछ-कुछ एक जैसी ही है. 

कुछ लोग पहले ही कह चुके हैं कि राज्य सभा बेकार है और वह सिर्फ सरकार के निर्णयों को अटकाए रखती है. और अगर वह उस पर केवल रबर स्टैम्प की तरह हां भी कर देती है तो भी उसके अस्तित्व का कोई औचित्य नहीं. इसलिए, अगर यह बहस छिड़ गई तो पार्टियां इस पर भी बस राजनीतिक रोटियां ही सेकेंगी.

First published: 23 October 2016, 7:09 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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