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बाल मजदूरी उन्मूलन दिवसः मिलिए, पहली बार स्कूल जाने वाले 250 बच्चों से

श्रिया मोहन | Updated on: 13 June 2016, 15:59 IST
(education-policy)

भारत की राजधानी दिल्ली के एक अंग्रेजी स्कूल में एक साल पढ़ने के बाद निशा कुमारी 'कूल' हो गई हैं. हमने जब उससे पूछा कि वो भविष्य में क्या बनना चाहती है तो उसने कहा, "येह! डॉक्टर"

पश्चिमी दिल्ली के चूना बस्ती के रघुबीर नगर में रहने वाली निशा की मां एक शोरूम में मेड का काम करती हैं और उनके पिता लकड़ी की कुर्सियां बनाते हैं.

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निशा मजदूरों के उन 250 बच्चों में शामिल हैं जो पहली बार स्कूल गए हैं. उनमें से ज्यादातर स्कूलों में प्रवेश लेने के बाद बगैर क्लास किए पढ़ाई छोड़ चुके थे. ऐसा पहली बार हुआ कि इन बच्चों ने एक साल से ज्यादा समय तक स्कूल नहीं छोड़ा. साथ ही उन्हें स्कूल जाने में मजा भी आया.

इनमें से ज्यादातर बच्चे अच्छे अंकों से पास हुए हैं लेकिन निशा ने अपनी क्लास में टॉप किया.

बाल मजदूर

भारत में करीब 55 लाख बाल मजदूर हैं. यानी देश के हर 11 बच्चे में से एक बाल मजदूर है. इनमें से 62.8 प्रतिशत बच्चों की उम्र 15 से 17 के बीच है. 56 प्रतिशत कामगार किशोर स्कूल नहीं जाते. कठोर श्रम से जुड़े 70 प्रतिशत कामगार बच्चे स्कूल नहीं जाते.

दिल्ली स्थित एनजीओ चेतना साल 2002 से बाल मजदूरों और अनाथ बच्चों के पुनर्वास का कार्य कर रहा है. इन बच्चों में कूड़ा बीनने वाले बच्चों से लेकर घरों और दुकानों में काम करने वाले बच्चे शामिल हैं.

चेतना के संस्थापक संजय गुप्ता कहते हैं, "राह में कई अड़चनें आईं. हर मुश्किल का सामना करना बड़ा काम था."

अभिभावक की राय

संजय गुप्ता कहते हैं कि ऐसे बच्चों के पुनर्वास में पहली दिक्कत उनके अभिभावकों को राजी करना होता है.

निशा की मां घरेलू कामगार हैं. वो छह वर्षीय निशा को अपने साथ ले जाती थीं जहां वो काम में उनका हाथ बंटाती थी. इसे उन दोनों को 15 हजार रुपये महीने की कमाई होती थी.

निशा की मां को लगता था कि वो स्कूल जाने के लिए काफी बड़ी हो गई है. उन्हें ये भी लगता था कि उनके पास दिल्ली का निवास प्रमाणपत्र और दूसरे दस्तावेज नहीं है. इसलिए निशा का एडमिशन नहीं हो सकेगा.

उनका परिवार बिहार से समस्तीपुर से कमाने के लिए दिल्ली आया थे. तब निशा तीन साल की थी. 

आखिरकार चेतना के स्वयंसेवी उनके घर पहुंचे. उन्होंने उनके दस्तावेज बनवाए और निशा का एडमिशन पास के प्राइमरी स्कूल में कराया.

सीमा के अनुसार निशा के बगैर उनकी आमदनी आधी हो जाएगी. वो कहती हैं, "लेकिन अगर वो पढ़ती है और जिंदगी में कुछ बन सकती है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं."

बड़ी उम्र के बच्चों को स्कूल भेजने में एक बड़ी चुनौती उनकी स्कूल में रुचि जगानी होती है

चेतना से जुड़ी टीचर गीता शर्मा कहती हैं कि जब मां-बाप तैयार हो जाते हैं कि स्कूल तैयार नहीं होते.

गुप्ता कहती हैं कि स्कूल वालों को मनाना सबसे मुश्किल काम होता है. इसके लिए वो स्कूलों को प्रिंसिपलों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम का हवाला देती हैं. इस कानून के तहत सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का अधिकार है.

बड़ी उम्र के बच्चे को छोटी क्लास में लेने में एक मानसिक बाधा भी होती है. बच्चों को स्कूल भेजने की राह में एक बड़ी चुनौती उनकी स्कूल में रुचि जगानी होती है.

स्कूल बढ़े, पढ़ाई का स्तर गिरा

इसके लिए गुप्ता और उनके साथी स्कूल एडमिशन से महीनों पहले ऐसे बच्चों के लिए विशेष कैम्प लगाते हैं.

निशा और उसके साथियों के एडमिशन के बाद चुना बस्ती में पढ़ाई को लेकर एक नई ललक जग गई लगती है. तेज गर्मी के बावजूद बस्ती के एक खुले मंदिर के पीपल के पेड़ के नीचे यहां के बच्चे छुट्टी का होमवर्क कर रहे हैं.

स्कूल के अंदर का संकट

निशा जब पहली बार स्कूल गई तो लोग उसे अजीब नजरों से देख रहे थे. वो अपने क्लास के बाकी बच्चों से करीब चार साल बड़ी थी. निशा कहती है, "लोग मेरे संग ऐसे बरताव कर रहे थे जैसे मैं फेल हो हो कर इसी क्लास में रह गई हूं. मुझसे कोई दोस्ती नहीं करता था. मैं एक कोने में अकेले बैठती थी. मेरे दोस्त बनने में कुछ वक्त लगा."

10 वर्षीय ऋषिकांत अपने परिवार के साथ बिहार के रामनगर से कुछ साल पहले दिल्ली आए. वो पुराने कपड़ों के बाजार में अपनी मां के साथ कपड़े धोने और बेचने का काम करते थे. इसके अलावा वो खाना बनाने, सफाई करने और अपने छोटे भाई की देखभाल का काम भी करते थे.

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अब वो दूसरी क्लास अच्छे अंकों से पास कर चुके हैं.  ऋषिकांत कहते हैं, "मुझे पढ़ना अच्छा लगता है लेकिन यहां बहुत शोर और भीड़ है. कई बार काफी गंदगी भी रहती है."

निशा का परिवार भी 30 वर्गफीट एक छोटे से कमरे में रहता है. उनके पिता शराब पीकर सीमा को मारते पीटते भी हैं. ज्यादातर ये लड़ाई पैसे को लेकर होती है.

निशा के दोस्त दीपू कहते हैं, ""मैं पढ़कर पुलिसवाला बनना चाहता हूं ताकि जो लोग शराब पीकर दूसरों को परेशान करते हैं उन्हें जेल भेज सकूं. 10 वर्षीय दीपू अब सर्वोदय विद्यालय के छात्र हैं.

इन बच्चों की बातें सुनकर आंखों में आए आंसू पोछती सीमा कहती हैं, "मुझे यकीन है स्कूल की पढ़ाई हमारी जिंदगी बदल सकती है."

First published: 13 June 2016, 15:59 IST
 
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