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खड़से की मुसीबतें अभी शुरू हुई हैं, इस्तीफे से आगे बहुत कुछ बाकी है

अश्विन अघोर | Updated on: 6 June 2016, 13:24 IST
(पीटीआई)
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र के पूर्व राजस्व मंत्री एकनाथ खड़से को पुणे के निकट महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम की जमीन के अवैध खरीद-फरोख्त और कुख्यात दाऊद इब्राहिम के साथ कथित संबंधों की वजह से इस्तीफा देना पड़ा
  • खड़से ने इस्तीफा के बाद खुद को बेकसूर बताते हुए फंसाये जाने और ‘‘मीडिया ट्रायल’’ का आरोप लगाया है

जिसकी उम्मीद थी आखिरकार वह हो ही गया. महाराष्ट्र बीजेपी के बेहद कद्दावर नेता और राज्य सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले राजस्व मंत्री एकनाथ खड़से ने आखिरकार गंभीर आरोपों के चलते अपने पद से इस्तीफा दे ही दिया.

हालांकि खड़से ने खुद को बेदाग साबित करने के पूरे प्रयास किये लेकिन ऐसा लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह सहित पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया.

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बीजेपी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि पुणे के निकट महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (एमआईडीसी) की जमीन को अवैध तरीके से खरीद-फरोख्त ने खड़से के ताबूत में आखिरी कील का काम किया.

एक सूत्र का कहना है, ‘‘उन पर लगे अन्य आरोपों की बात आती तो खड़से तकनीकी पहलुओं की आड़ में बच निकलते. लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि घोटाला और उसकी एवज में उठाया गया फायदा पार्टी झेल नहीं सकती. तमाम पहलुओं के सामने आने के बाद मोदी और शाह खासे नाराज थे और उन्होंने खड़से को तुरंत मंत्रिमंडल से हटाने का निर्णय लिया.’’

बेगुनाही दोहराते खड़से

इस्तीफा देने के बाद मुंबई में प्रदेश बीजेपी कार्यालय पर मीडिया से बातचीत के दौरान खड़से ने खुद को एक बार फिर बेकसूर बताते हुए फंसाये जाने का आरोप लगाया. साथ ही उनका कहना था कि उनके खिलाफ ‘‘मीडिया ट्रायल’’ चलाया जा रहा है, जो काफी खेदजनक है क्योंकि ऐसा करके उनकी और पार्टी की छवि के नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘‘जो लोग आरोप लगा रहे हैं उनके पास इन आरोपों को साबित करने के लिये कोई ठोस सबूत नहीं है.’’

वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने खड़से पर लगे आरोपों की जांच उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा करवाने की घोषणा की है.

स्थानापन्न की खोज

अब जब खड़से ने इस्तीफा दे दिया है तो विपक्षी दल इसे अपनी जीत मानकर जश्न मनाने में व्यस्त हैं और बीजेपी खड़से के उत्तराधिकारी के चयन को लेकर मंथन करने में मशगूल है.

वर्तमान में पार्टी ऐसे अनुभवी चेहरों की कमी से जुझ रही है जो खड़से की जगह ले सकें और और राजस्व और कृषि विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा सकें.

बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि खड़से द्वारा संभाले जा रहे एक दर्जन से भी अधिक मंत्रालयों को वित्तमंत्री सुधीर मुनवंटीगर और पीडब्लूडी मंत्री चंद्रकांत पाटिल के बीच बांटा जा सकता है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता स्वीकारते हैं कि खड़से के इस्तीफा देने के बाद पार्टी के भीतर उनका स्थान लेने वाले चेहरे को खोजना काफी टेढ़ी खीर है. वे कहते हैं, ‘‘खड़से का स्थान लेने लायक एक नेता को खोजने का काम रस्सी पर चलने जैसा है.’’

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे को लगता है कि बीजेपी को आने वाले विधासभा सत्र में खड़से को मंत्रिमंडल से निकाले जाने का नतीजा भुगतना पड़ेगा.

देशपांडे कहते हैं, ‘‘हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि खड़से के पास एक विधायक के रूप में करीब चार दशक का राजनीतिक अनुभव है. यह मुख्यमंत्री फड़नवीस सहित राज्य के किसी भी बीजेपी नेता के मुकाबले कहीं अधिक है. कई बार ऐसे मौके आए हैं जब खड़से दोनों सदनों मे बेहद मजबूती के साथ खड़े नजर आए हैं और उन्होंने विपक्ष के सभी हमलों को सफलतापूर्वक नाकाम किया है.’’

देशपांडे के मुताबिक खड़से का इस्तीफा बीजेपी के लिहाज से बहुत गलत समय पर हुआ हैं क्योंकि कांग्रेस ने हाल ही में तेजतर्रार नेता नारायण राणे को विधान परिषद का सदस्य बनाया है और राणे सरकार पर हमला करने का कोई मौका छोड़ने वाले नहीं हैं.

देशपांडे कहते हैं, ‘‘हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि यह इस्तीफा बेहद महत्वपूर्ण समय पर हुआ है और अब जब मानसून का समय सिर पर है और राज्य में कोई राजस्व और कृषि मंत्री नहीं है और ऐसे में इन दोंनों ही विभागों में किसी प्राकृतिक आपदा जैसी दशा में त्वरित निर्णय लेने में सक्षम एक अनुभवी मंत्री का होना बेहद आवश्यक है.’’‘‘इसके अलावा राज्य विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में सरकार को कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ेगा.’’

ओबीसी फैक्टर

इस बात की पूरी संभावना है कि खड़से के इस्तीफा देने के बाद बीजेपी के ओबीसी नेता स्वयं को पीड़ित महसूस करना प्रारंभ कर दें. वास्तव मेें इसे ही खड़से के खिलाफ हुई कार्रवाई का मूल कारण माना जा रहा है.

कांग्रेस के राणे कहते हैं, ‘‘स्पष्ट है कि खड़से के खिलाफ की गई कार्रवाई राज्य से ओबीसी नेतृत्व का सफाया करने के इरादे से की गई है. पहले छगन भुजबल को निशाना बनाया गया और अब खड़से. ऐसा लगता है कि इस सरकार ने ओबीसी नेताओं को निशाना बनाने का फैसला कर लिया है.’’

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हालांकि वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कुमार केतकर का मानना बिल्कुल इतर है. उनके अनुसार नेतृत्व की कमी का मुद्दा बीजेपी में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है.

केतकर कहते हैं, ‘‘आज के घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बीजेपी ने पहली बार इस तरह के बड़े झटके का सामना किया है और वह भी एक ओबीसी चेहरे के चलते. यह क्षण राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण साबित होगा.’’

उनका कहना है कि इस्तीफा और जांच का दिया गया आदेश आंखों में धूल झोंकने के अलावा और कुछ नहीं है. ‘‘खड़से को पहले से ही क्लीन-चिट देने का आश्वासन दे दिया गया है और उन्हें ग्रेटर मुंबई नगर निगम के चुनाव से पहले मंत्रिमंडल में दोबारा शामिल कर लिया जाएगा.’’

First published: 6 June 2016, 13:24 IST
 
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