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इस भारत में मौत भी आपको गैर बराबरी, भेदभाव से बचा नहीं सकती

आदित्य मेनन | Updated on: 10 October 2016, 1:43 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • शहीद जाफरी, अख़लाक़ और वेमुला के अलावा हिन्दू दक्षिणपंथियों ने 26/11 के पीड़ित शहीद हेमन्त करकरे तक को नहीं छोड़ा. उन्हें राष्ट्रद्रोही कहा गया था.
  • हिन्दूवादियों की नज़र में करकरे कहीं बड़े दोषी थे क्योंकि उन्होंने ही हिन्दूपंथियों का राष्ट्रविरोधी रवैया उजागर किया था.

दादरी कांड में अख़लाक़ की हत्या के आरोपी रवि सिसोदिया का शव तिरंगे में लिपटा देखने से एक बात तो साफ हो गई है कि हम भारतीय न तो जन्म से समान हैं और न ही मौत होने पर.

मोहम्मद अख़लाक़ और रवि सिसोदिया उत्तर प्रदेश में दादरी के पास एक ही गांव बिसहड़ा में रहते थे. मोहम्मद अख़लाक़ को पिछले साल भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला क्योंकि उन्हें शक था कि उसने अपने घर में बीफ रखा हुआ है. रवि भी इस भीड़ में से ही एक था और कथित तौर पर अख़लाक़ की हत्या में उसकी मुख्य भूमिका थी.

इसी सप्ताह रवि की हिरासत में मौत हो गई. उसके अंगों ने काम करना छोड़ दिया था. उसका शव राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में लपेटा गया जो कि सामान्यतः सशस्त्र बलों और पुलिस के जवानों और सार्वजनिक अधिकारियों के सम्मान में किया जाता है.

केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा औरविधायक संगीत सोम रवि केे अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. गांव वाले उसे शहीद का सम्मान दे रहे थे. हिन्दुत्व कार्यकर्ता उसके अंतिम संस्कार में हिन्दू एकता जिंदाबाद और हम सब हिन्दू हैं जैसे नारे लगा रहे थे.

अगर आप हिन्दूवादी हिंसा का विरोध करते हैं तो आपके आक्रोश का दमन कर दिया जाता है.

अख़लाक़ के मामले में क्या हुआ? कुछ आरोपियों द्वारा दायर की गई याचिका के आधार पर उसके खिलाफ गौ हत्या का मामला दर्ज किया गया. यूपी सरकार ने तो यहां तक जांच करवाई कि अख़लाक़ के घर में रखा गया मीट बीफ था कि नहीं. एक मृतक के खिलाफ उसके कथित हत्यारों के कहने पर मामला दर्ज किया गया जबकि अब उसके कथित हत्यारों में से एक का अंतिम संस्कार किसी राष्ट्रीय नायक के तौर पर किया जा रहा है.

अख़लाक़ मामले से एक बात तो साबित हो गई है कि अगर आप हिन्दूवादी हिंसा के खिलाफ आवाज उठाते हो तो आपके आक्रोश तक का दमन कर दिया जाता हैै. लेकिन अख़लाक़ अकेला ऐसा नहीं है, जिसके साथ ऐसा हुआ है.

एक आत्महत्या और एक नरसंहार हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला को सबने ‘राष्ट्र द्रोही' बता दिया था और एचसीयू में एबीवीपी से लेकर बीजेपी सांसद बंडारू दत्तात्रेय और तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी सहित पूरी हिन्दू ब्रिगेड जैसे उसके पीछे पड़ गई. उसकी छात्रवृत्ति रोक दी गई और उसे हॉस्टल से भी निकाल दिया गया और आख़िरकार उसने आत्महत्या कर ली.

एक दलित होने के कारण उसे जीवन भर संघर्ष करना पड़ा. वह दलित के तौर पर ही जिया, दलित ही मरा और अपने सुसाइड नोट में भी उसने अंत में ‘जय भीम’ लिखा.

लेकिन उसकी मौत के बाद सरकार ने यह साबित करने की भरपूर कोशिश की कि वह दलित नहीं था. जैसे कि इससे उसके खुदकुशी करने की त्रासदी कम हो जाएगी. बीजेपी महासचिव पी.मुरलीधरन राव मृतक छात्र रोहित को राष्ट्र द्रोही कहने से भी नहीं चूके.

रोहित दलित के तौर पर ही जिया, दलित ही मरा और अपने सुसाइड नोट में भी उसने अंत में ‘जय भीम’ लिखा.

यहां तक कि मानव संसाधन मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि वेमुला दलित नहीं ओबीसी था. उसकी मां ने इसका खंडन किया है. इस मामले में भी स्पष्ट है कि हिन्दूवादी अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले को मौत के बाद भी नहीं बख्श रहे.

तीसरा मामला 2002 का है जब नरेंद्र मोदी से संबंधित कहानियों की शुरूआत हुई थी. अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में गुजरात दंगों के दौरान एक भीड़ ने कांग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे एहसान जाफरी सहित 68 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था.

जाफरी दंगा पीडितों के आइकन बन गए. एक तो वे सांसद थे, इसलिए, दूसरा उनकी पत्नी जकिया जाफरी ने अपने पति के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. चौदह साल बाद 2016 में निचली अदालत ने फैसला दिया कि जाफरी की गोलीबारी से गुस्साई भीड़ ने ही इतने लागों की हत्या की. बीजेपी शासित राज्य में अभियोजन पक्ष की नाकामी के कारण ऐसा फैसला आया. तो अहसान जाफरी केवल अपनी ही नहीं बाकी 68 लोगों की भी मौत का जिम्मेदार हो गए!

करकरे भी नहीं बच सके

शहीद जाफरी, अख़लाक़ और वेमूला को छोड़िए. हिन्दू दक्षिण पंथियों ने 26-11 के पीड़ित शहीद हेमन्त करकरे तक को नहीं छोड़ा. जब एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ आरोप वापस लिए तो कहा गया प्रज्ञा के खिलाफ ये आरोप करकरे ने ही लगाए थे और उन्हें राष्ट्र द्रोही भी कह दिया.

वेमुला, अख़लाक़ और जाफरी जहां दक्षिण पंथी हिंसा के पीड़ित चेहरा बने, वहीं करकरे उनकी नजरों में कहीं बड़े दोषी निकले.  उन्होंने हिन्दूपंथियों का राष्ट्रविरोधी रवैया जो उजागर कर दिया था. हिन्दू ब्रिगेड के लिए करकरे को दोषी ठहराना जरूरी था, भले ही उनकी मौत के आठ साल बाद ही क्यों न ऐसा किया गया हो.

इन मामलों से जाहिर है कि हिन्दूवादी ताकतों को लगता है कि वे ही किसी को भी हीरो बना सकते हैं, भले ही वह रवि सिसोदिया हो या वीडी सावरकर, जिन्हें अकारण ही ‘वीर’ की उपाधि दे दी गई.

उनके खिलाफ खड़े हुए आइकन या तो नष्ट कर दिए जाते हैं या बदनाम कर दिए जाते हैं. हम ऐसे देश में रह रहे हैं, जहां रवि सिसोदिया को शहीद कहा जाता है और करकरे जैसे शहीद की बेइज्जती की जाती है.

जहां अहसान जाफरी को 68 लोगों की मौत का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और जिस व्यक्ति से उसने तब मदद मांगी थी, वह नरेंद्र मोदी आज देश के प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने उस वक्त मदद की बजाय सिर्फ तंज कसे थे.

जहां कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों में शामिल बच्चों को पैलेट गन से अंधा किया जा रहा है, जबकि हतिरयाणा व कर्नाटक में हिंसा फैलाने वाले उपद्रवियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही. जहां एक आदमी, पिता और पति की जान के मुकाबले गाय की जान ज्यादा कीमती मानी जाती है.

खैर सच यही है कि हम सभी इसका सामना करें. आज जिस हिन्दुस्तान में हम रह रहे हैं, वहां धर्मनिरपेक्षता जिन्दा नहीं बची है.

First published: 10 October 2016, 1:43 IST
 
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