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जब मांग नहीं होगी तो औंधे मुंह गिर जाएगा स्किल इंडिया

प्रणेता झा | Updated on: 11 January 2017, 7:53 IST
(फाइल फोटो )

अगर आपको लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारत को विश्व की कौशल राजधानी बनाने का सपना मात्र दिवा स्वप्न है तो आपको इस पर एक बार फिर से विचार करने की जरूरत है. केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने इस दिशा में एक कदम और बढ़ाते हुए केंद्रीय लोकसेवा आयोग के अधीन एक औपचारिक केंद्रीय सेवा ‘द इंडियन स्किल डेवलेपमेंट सर्विस’ (आईएसडीएस) की स्थापना की है.

कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय ने 4 जनवरी को आईएसडीएस की स्थापना की अधिसूचना जारी की. इसके जरिये सरकार की योजना युवा एवं प्रतिभाशाली प्रशासकों को कौशल विकास से जोड़ने की है. 15 जुलाई 2015 को शुरू की गई.

इस योजना के तहत 40 करोड़ लोगों को 2022 तक कुशल कार्यबल में जोड़ दिया जाएगा. आईएसडीएस संबंधी अधिसूचना में कहा गया है कि इसका लक्ष्य 2022 तक 50 करोड़ लोगों को कुशल कामगार बनाना है.

मंत्रालय ने कहा है कि सरकार भारत ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव संसाधन उपलब्ध करवाएगी. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 7 अक्टूबर 2015 को यूपीएससी के अधीन इस ‘ग्रुप ए’ श्रेणी की सेवा के गठन को मंजूरी दी. चूंकि बाकी लोकसेवकों के पास और भी कई विकलप मौजूद हैं; इसलिए इस सेवा में केवल इंजीनियरों की ही भर्ती की जाएगी. यूपीएससी द्वारा इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा के माध्यम से इन इंजीनियरों का चयन किया जाएगा.

इसके अनुसार, भर्ती किए गए इंजीनियरों के ज्ञान का लाभ कौशल विकास कार्यक्रम को मिलेगा और इन योजनाओं का सफल व कुशल क्रियान्वयन सुनिश्चित करने में भी सहायक होगा. इस नई सेवा के साथ ही देश के कौशल विकास के लिए अनुकूल माहौल बनने और इस क्षेत्र में मजबूती आने की उम्मीद है.

उम्मीदों से भरा कदम

कैच ने इस बारे में कुछ विशेषज्ञों से बात की. अलग-अलग तरह के विचार सामने आए. कुछ ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया और कहा कि इससे पता चलता है कि सरकार इस ओर कितनी गंभीर है. कुछ अन्य ने इसे अनावश्यक बताते हुए कहा कि इससे कोई बड़ा मुद्दा हल होने वाला नहीं है. 

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्सेज (टिस), बॉम्बे में स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड लेबर स्टडीज के डीन व श्रम मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर बिनो पॉल ने इस कदम का स्वागत किया है. उन्होंने कहा, ‘यह सेवा शुरू कर सरकार ने भारतीय युवाओं को कुशल कामगार बनाने के अपने वादे के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है.’ 

स्किल इंडिया मिशन के इस पैमाने को देखते हुए हमें विकास की नई ऊंचाइयों को छूने की जरूरत है. इसके लिए बेहतर आपसी तालमेल और फोकस होना जरूरी है और आईएसडीएस से यह संभव है. उन्होंने कहा, ‘आईएसडीएस का एक फायदा यह होगा कि इससे गुणवत्ता की गारंटी मिलेगी.'

वर्तमान में स्किल डवलेपमेंट का काम थोड़ा मंथर गति से चल रहा है. सरकारी पहल के अलावा ऐसी कई प्राइवेट एजेंसियां हैं, जो कौशल विकास के लिए काम कर रही हैं और गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं करती हैं. आईएसडीएस राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क के अनुसार कौशल प्रशिक्षण देगा, जो कि इसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करता है. वरना कुशल कामगारों की गुणवत्ता और नियोक्ता की उम्मीदों में सामंजस्य बिठाना कठिन हो जाएगा.

संभावनाएं

देश भर में इस समय 13,105 आईटीआई कार्यरत हैं, जिनमें 18.65 लाख छात्र पढ़ते हैं. इनमें से 2293 संस्थान सरकारी हैं और बाकी सब निजी. हालांकि आलोचना करने वाले कहते हैं कि स्किल इंडिया दरअसल बड़ी संख्या में श्रमिक बल तैयार करेगा जो विश्व बाजार की सेवा करेंगे. इससे होगा क्या कि वंचित वर्ग को तो उच्च शिक्षा का अवसर नहीं मिलेगा और कुशल कामगार बनाने की संभावनाओं के चलते उनकी अच्छी प्राथमिक शिक्षा के महत्व को नजरंदाज किया जा रहा है.

कौशल विकास का उद्देश्य ‘मेक इन इंडिया' अभियान से भी जुड़ा है. इसका मकसद भारत को एक वैश्विक निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करना है. असल चिंता इस बात की है कि जो युवा कुशल कामगार बनेंगे वे सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग से ही आएंगे; इससे एक बार फिर आईटीआई (इंडस्ट्रीयल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स) और उच्च वर्गीय आईआईटी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) में पढ़ने वाले युवाओं के बीच की खाई बढ़ेगी.

प्रोफेसर पॉल ने इस योजना के व्यापक स्तर पर कारगर होने पर जोर दिया और कहा कि कुशल कामगारों को व्यावसायिक व तकनीकी कौशल प्रशिक्षण के अलावा पुख्ता सामान्य शिक्षा देना भी सुनिश्चित किया जाए. उन्होंने कहा, ‘सामान्य शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रम ये कुल मिलाकर शिक्षा के तीन पहलू हैं. इन तीनों का संतुलित सम्मिश्रण जरूरी है. हमें यह सुनिश्चित करने करने की जरूरत है कि कुशल कामगार वर्ग सामान्य शिक्षा भी अच्छी तरह ग्रहण करें. इससे उनके सामने काम के बेहतर विकल्प होंगे और ऐसे कामगारों के लिए आजीविका चलाना आसान होगा.’

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इकॉनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग व सेंटर फॉर इन्फॉर्मल सेक्टर एंड लेबर स्टडीज में कार्यरत प्रोफेसर प्रवीण झा ने भी कुछ ऐसी ही चिंता जताई.

सवाल

सरकार द्वारा शुरू की जा रही इस नई सेवा के बारे में जानने व समझने के लिए कुछ बुनियादी सवालों के जवाब तलाशने जरूरी हैं. इन सवालों और आशंकाओं का समाधान करना जरूरी है. झा ने कहा, पहला सवाल यह उठता है कि ‘कौशल’ से हमारा मतलब क्या है? और यहां हम किस प्रकार के कौशल की बात कर रहे हैं? किस प्रकार की गतिविधियों पर विचार किया जा रहा है? कुशल तो एक इंजीनियर भी है, एक प्लम्बर और मेकैनिक भी. साथ ही एक खेती करने वाला मजदूर भी.

सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि मौजूदा कौशल विकास के उपलब्ध ढ़ांचे में क्या समस्या है? इनसे अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिले? क्या ऐसा इसलिए है कि पर्याप्त संख्या में कुशल कामगारों का अभाव है या इसलिए कि नियोक्ताओं की कमी है?

उन्होंने कहा बेरोजगारों में भी कई प्रकार की किस्मे हैं. बेरोजगारों की सबसे बड़ी संख्या पढ़े-लिखे बेरोजगारों की है. इनमें 12वीं पास से लेकर कॉलेज डिग्रीधारी तक शामिल हैं. 

प्रोफेसर ने सितम्बर 2015 के एक विज्ञापन का उदाहरण देकर बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के 360 पदों के लिए आवेदन मांगे थे. सरकार को इसके लिए 27 लाख से ज्यादा आवेदन मिले; इनमें से 2.5 लाख इंजीनियर थे और बहुत से तो पीएचडी डिग्रीधारी भी. इसलिए समस्या यहां मांग की है, आपूर्ति की नहीं. 

कुछ ऐसी रिपोर्ट हैं जिसमें उद्योगों को शिकायत है कि उन्हें कुशल कामगार नहीं मिलते. क्या वाकई कुशल कामगारों की कमी है? आखिर यह विषमता है कहां? क्या वाकई हमारे पास प्लमबर या फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों की कमी है? उक्त उदाहरण से तो ऐसा नहीं लगता. 

कहां जाएंगे कुशल कामगार

समस्या यह है कि अर्थव्यवस्था का विकास तो हो रहा है लेकिन रोजगारों का नहीं. बल्कि पिछली तिमाही और इससे पहले की स्थिति देखी जाए तो पता चलता है कि पैसा बाहर जा रहा है. औसत निवेश में कमी देखी गई. ऐसे में इन 50 करोड़ कुशल कामगारों का क्या होगा? इस नई सेवा से क्या हल हो जाएगा? क्या यह अल्पकालीन समस्या है?

झा ने कहा, ‘‘वे कौशल विकास के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन कुशल कामगार बनाने की कवायद में जितना शोर मचाया जा रहा है; उसमें असल उद्देश्य कहीं गौण हो गया है और सवालों में उलझ कर रह गया है.’’ समाज में ऐसे कौशल विकास की जरूरत है, जो लोगों को रोजगार दिला सके. 

उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा, ‘‘भारत को चीन से सीखना चाहिए. चीन दरअसल दुनिया भर के लिए एक कारखाना बन चुका है. यहां पर्याप्त स्तर पर अच्छी गुणवत्ता वाली सेकेंडरी स्तर की शिक्षा दी जाती है. चीन में 90 फीसदी कामगार नियोक्ता द्वारा प्रदत्त कौशल प्रशिक्षण लेते हैं. वहां भारत की तरह आईटीआई नहीं है.’’

उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा समस्याओं को दरकिनार कर नई सेवा शुरू करने से पहले हमें यह देखना होगा कि मौजूदा तंत्र में क्या खामियां रह गईं, जिसके चलते यह कारगर नहीं हो पाया.

कहां है दिक्कत

राष्ट्रीय कौशल मिशन यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में शुरू हुआ था. आईटीआई संस्थान सालों से अस्तित्व में हैं और इनकी संख्या बढ़ी ही है. फिर समस्या आखिर है कहां? क्या इनके पाठ्यक्रम में खामियां हैं? या इन्हें दिए गए आदेश में? क्या वाकई में हमें कौशल विकास के नाम पर इस तरह के नए संस्थनों और विश्वविद्यालय की जरूरत है? और यह नई व्यवस्था केवल ऊपरी तौर पर ही है यानी अभी सिर्फ योजना ही है.

झा की बातों में भी बिनो पॉल का ही संदेश सुनाई दिया. यानी कौशल और शिक्षा के बीच का अंतर कम करना है. उन्होंने कहा लोगों को विभिन्न स्तरों पर आधारभूत शिक्षा देने की जरूरत है. कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा के बड़े प्रयोजन से जोड़ने की जरूरत है. पॉल और झा दोनों ने ही जर्मनी का भी उदाहरण दिया. वहां स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद छात्रों के सामने व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा का विकल्प होता है.

First published: 11 January 2017, 7:53 IST
 
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