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विश्व मानवाधिकार दिवस: जल, जंगल, जमीन का अधिकार

प्रिया पिल्लई | Updated on: 11 December 2015, 8:15 IST
QUICK PILL
विश्व मानवाधिकार दिवस हर साल 10 दिसंबर को मनाया जाता है. 1948 में इसी दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा में \'वैश्विक मानवाधिकार की घोषणा\' को स्वीकार किया गया था. महासभा ने 1950 में इस दिन को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया.

आंतरिक स्तर पर, पर्यावरण के खतरों के खिलाफ हम व्यक्तिगत लड़ाई लड़ ही रहे हैं: चाहे वह साफ हवा के लिए हांफ रहे दिल्ली के नागरिकों की लड़ाई हो, अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे बारिश से जलमग्न चेन्नई शहर के निवासी हों या मध्य प्रदेश के सिंगरौली के महान के जंगल में कई पीढ़ियों से रह रहे लोगों के भूमि का अधिग्रहण का विरोध हो, लोग हर जगह लड़ रहे हैं.

इस वर्ष, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर, इसे फिर से याद करने का समय है कि किस तरह हमारा मानव अधिकार पर्यावरण के अधिकार से जुड़ा है.

पिछले साल जब मध्य प्रदेश के अमिलिया गांव में महान संघर्ष समिति खनन कंपनी को अपनी जमीन देने का विरोध करने के लिए मीटिंग कर रही थी तो स्थानीय जिला कलक्टरेट के एक अधिकारी ने वहां एकत्रित हुए लोगों को चेताया कि आपलोग इसका विरोध करके अपने ही विकास से दूर जा रहे हैं. ‘कंपनी’ के लोग यहां पर पुल बनवाएंगे, सड़क बनवा कर स्कूल और अस्पताल तक जाने का रास्ता सुलभ करेंगे.

विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाना काफी साहस का काम है और वह भी उस वक्त जबकि उनकी लोकप्रियता उफान पर हो

सभा में मौजूद कई लोगों को यह प्रस्ताव आकर्षक लगा था, लेकिन मीटिंग में ही बैठे एक व्यक्ति ने उस अधिकारी से एक सवाल पूछाः आप उनकी तरफ से ये सब बातें हमें क्यों बता रहे हैं? क्या जिन कामों के नाम आपने गिनाए हैं, वो कराने की जवाबदेही आपकी नहीं है? आप जिले के कलेक्टर हैं. इन सुविधाओं के लिए हमें अपने जल, जंगल, जमीन और अपने गांव को उजाड़कर कंपनी को दे देने की क्या जरूरत है?

समस्या का सार यही है- विकास गाथा को परिभाषित भी वही करता है और उसी विकास गाथा पर सब विश्वास भी करने लगते हैं. सबको रोजगार चाहिए, सबको भोजन चाहिए, जेब में रोकड़ा चाहिए और अपने बच्चों का ‘सुरक्षित भविष्य’ भी चाहिए. लेकिन किस तरह का भविष्य, उसकी क्या कीमत होगी और वो कीमत कौन चुकाएगा?

हम किन-किन के मानवाधिकार कुचलकर विकास करने को तैयार हैं ताकि कुछ खास विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के भविष्य और सुरक्षित हों. सवाल तो यह भी है विकास की इस आड़ी-तिरछी परिभाषा का लाभ कौन ले रहा है?

दुख की बात यह है कि प्राकृतिक संसाधनों और खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्रों में मानवाधिकार का सूचकांक सबसे खराब रहा है. वहां ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक शोषण हुआ है जहां सबसे ज्यादा गरीबी रही है और विकास के नाम पर सबसे अधिक विस्थापन भी वहीं हुआ है.

अगर ट्रिकल डाउन थियरी ने काम किया होता तो जहां औद्योगीकरण हुआ है वहां के लोगों को वादे के मुताबिक रोजगार मिला होता

जब औद्योगीरण होगा तो उसका लाभ समाज के सभी लोगों मिलेगा, विकास के उस बुनियादी सिद्धांत (ट्रिकल डाउन थियरी ) में कई खामियां हैं. ‘विकास' अनिवार्य रूप से सिर्फ रोजगार से जुड़ा हुआ है- न केवल संविधान के तहत इसकी गांरटी है, बल्कि यह बुनियादी मानवाधिकार है.

अगर ट्रिकल डाउन थियरी ने सचमुच काम किया होता तो जहां कहीं भी बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण हुआ है वहां के स्थानीय लोगों को वायदे के मुताबिक रोजगार मिला होता और वह क्षेत्र विकसित हुआ होता! सिंगरौली से सूचना के अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी में 11 परिचालित खदानों और नौ ताप विद्युत संयत्रों में सिर्फ 234 लोगों को ही रोजगार मुहैया हुआ है जबकि अनपरा थर्मल प्लांट ने वायदा किया था कि 2205 लोगों को रोजगार दिया जाएगा. लेकिन कृषि और जंगल का बड़ा हिस्सा विलुप्त हो रहा है, औद्योगीकरण की रफ्तार तेज है  और उससे ज्यादा तेजी से लोगों का पलायन हो रहा है.

विकास के लिए जिम्मेदार लोग जब विकास के विजन के बारे में बताते हैं तो वे यह कहना नहीं भूलते कि वे पर्यावरण को ध्यान में रखकर ‘संतुलन कायम’ रखने के लिए विकास चाहते हैं. लेकिन हकीकत में, वे लगातार उस कानून और कानूनी प्रक्रिया को कमजोर करने की साजिश में लगे रहते हैं जो उनके रास्ते में आता है. वो निरंतर इस प्रयास में रहते हैं कि कैसे उन्हें अगले खनन का ठेका मिलेगा, या एक नया स्पेशल इकॉनोमी जोन (एसईजेड) तैयार होगा.

अगर हम इसी निरकुंश विकास को आगे बढ़ाते रहे जैसा कि दिल्ली, उत्तराखंड और चेन्नई में किया है तो हमें इसके दूरगामी और कभी न मिटने वाले परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए.

हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विकास, पर्यावरण और मानव अधिकार एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी नहीं बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं

विकास का प्रतिमान मानवाधिकारों और पर्यावरण न्याय को स्वीकार किए बिना नहीं हो सकता. विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाना काफी साहस का काम है और वह भी उस वक्त जबकि उनकी लोकप्रियता उफान पर हो. लेकिन हमारे समाज और भावी पीढ़ियों के मद्देनजर इस परिभाषा पर कुछ अलोकप्रिय सवाल उठाने ही होंगे. यह नहीं रहेगा तो हम भी कहां रहेंगे.

हमारा संगठित होने का अधिकार, हमारी अभिव्यक्ति की आजादी उन सवालों पर मंत्रणा करने और सकारात्मक बहस की गारंटी देते हैं.

हम सबको अपनी वो बात कहने की जरूरत है जो हमें प्रभावित करती है. फिलहाल, पेरिस में जलवायु परिवर्तन वार्ता सुर्खियों में है और भारत एक न्यायसंगत समझौते की मांग करके इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा है. हालांकि यहां देश के भीतर भारत सरकार ऐसे फैसले ले रही है जो हाशिए के लोगों के अधिकारों और पर्यावरण कानून को पूरी तरह असरहीन बना रहे हैं.

दुखद यह है कि जो भी लोग इन फैसलों पर सवाल खड़े करते हैं या उसका विरोध करते हैं - चाहे वह व्यक्ति हो या संगठन- उन्हें ‘देशद्रोही’ कह दिया जाता है और उनके ऊपर देश को बदनाम करने का आरोप भी चस्पा कर दिया जाता है.

सिविल सोसाइटी संगठनों के लोगों ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को मानव अधिकार दिवस पर लिखी एक याचिका में कहा हैः सही नेतृत्व स्वस्थ संवाद की जवाबदेही निभाता है और हमें लोकतंत्र को मजबूत करने की नींव तैयार करने में मदद करता है. इससे एक न्यायसंगत समाज का निर्माण होता है.

विकास के वैकल्पिक दृष्टिकोण पर विचार करके ही ‘सबका साथ सबका विकास’ किया जा सकता है

ग्रीनपीस और सिविल सोसाइटी जलवायु प्रदूषण पर भारत के इस रुख से पूरी तरह सहमत हैं कि प्रदूषण फैलाने वालों की जवाबदेही तय होनी चाहिए. हम आशा करते हैं कि भारत जलवायु परिवर्तन वार्ता में सफल होगा और अमीर देशों को इसके लिए जवाबदेह बनाया जाएगा. इससे भारत के करोड़ों देशवासी आभारी होगें. इसी तरह सरकार और कारपोरेट घरानों से भी जवाबदेही की मांग होनी चाहिए.

जब हम सबकी सुनेंगे, एक दूसरे के अधिकारों का आदर करेंगे और सचमुच वैकल्पिक दृष्टिकोण पर गौर करेंगे तब ही हम ‘सबका साथ सबका विकास’ कर सकते हैं. उसके बाद ही विकास का वह मॉडल विकसित हो पाएगा जिसमें सबके लिए मानव अधिकार और पर्यावरण न्याय होगा. लेकिन सबसे पहले, यह जरूरी है कि बोलने की आजादी और लोकतंत्र को बचाया जाए और सिविल सोसाइटी के साथ बातचीत बहाल की जाए.

First published: 11 December 2015, 8:15 IST
 
प्रिया पिल्लई @catchhindi

प्रिया पिल्लई ग्रीनपीस से जुड़ी हैं. पिछले कई वर्षों से मध्य प्रदेश के स्थानीय निवासियों के संघर्ष में साझेदार हैं.

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