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देश के पहले समुद्री राष्ट्रीय पार्क पर एस्सार की काली छाया, मछुआरे पहुंचे एनजीटी

निहार गोखले | Updated on: 7 February 2017, 8:25 IST
QUICK PILL
  • मछुआरों का आरोप है कि फरवरी 2008 में हुई जनसुनवाई एक ’छलावा’ था क्योंकि यह 32 किमी की दूरी पर स्थ्ति एक स्कूल में हुई और कोई इसकी सूचना तक गांव भर में नहीं दी गई.गुजरात सरकार का पर्यावरण विभाग जो फरवरी 2009 में इस बात पर सहमत था कि बंदरगाह परियोजना समुद्री पार्क को प्रभावित करेगी, मार्च में उसकी धारणा बदल गई और अगस्त में क्लीयरेंस दे दिया.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सलाया, जामनगर जिले, गुजरात में एस्सार समूह की आगामी बंदरगाह परियोजना के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया है. एस्सार पर आरोप है आसपास के क्षेत्र में कच्छ मरीन नेशनल पार्क की खाड़ी के साथ ही मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों की पारिस्थितिकी प्रभावित हो रही है, इसके अलावा एक लाख से अधिक मछुआरों की आजीविका खतरे में है.

कच्छ की खाड़ी को 1982 में देश के पहले समुद्री राष्ट्रीय उद्यान के तौर पर अधिसूचित किया गया है, और इसे प्रवाल भित्तियों और डुगां जैसी कई लुप्तप्राय समुद्री प्रजातियों, को सहारा देने के लिए जाना जाता है.

सलाया मछुआरा एसोसिएशन और  सलाया गांव में प्रस्तावित बंदरगाह के निकट काम कर रहे 10 मछुआरों ने 21 सितंबर को पुणे में एनजीटी के पश्चिमी जोन बेंच में यह मामला दर्ज करवाया. पीठ ने एस्सार समूह की कंपनी एस्सार बल्क टर्मिनल (सलाया) लिमिटेड, गुजरात सरकार, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, गुजरात मैरीटाइम बोर्ड और गुजरात पारिस्थितिकीय आयोग के मंत्रालय को नोटिस जारी कर, 20 अक्टूबर तक जवाब मांगा है.

क्लीयरेंस का ’छलावा’

एस्सार, जिसका सलाया में एक थर्मल पावर प्लांट भी है, वह दो बेड़े और पाइपलाइनों सहित बंदरगाह पर कई सुविधाओं का निर्माण कर रहा है.

मछुआरों का दावा है कि मरीन नेशनल पार्क के साथ निकटता के बारे में गलत जानकारी देने पर 2009 में बंदरगाह को पर्यावरण और तटीय क्षेत्र क्लीयरेंस दी गई थी.

एस्सार के आवेदन में दावा किया गया है कि बंदरगाह मरीन नेशनल पार्क से थोड़ी दूरी पर है, जबकि मछुआरों का तर्क है कि सही नक्शे के अनुसार, वास्तव में यह बंदरगाह पार्क के भीतर ही है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गुजरात सरकार का पर्यावरण विभाग जो फरवरी 2009 में इस बात पर सहमत था कि बंदरगाह परियोजना समुद्री पार्क को प्रभावित करेगी, मार्च में उसकी धारणा बदल गई और  अगस्त में क्लीयरेंस दे दिया.

याचिका में कहा गया है कि जिस पर्यावरण प्रभाव आकलन के आधार पर मंजूरी दी गई थी, उसमें वनस्पतियों या प्रवाल भित्तियों का उल्लेख नहीं है. मछुआरों का यह भी आरोप है कि फरवरी 2008 में हुई जनसुनवाई एक ’छलावा’ था क्योंकि यह 32 किमी की दूरी पर स्थ्ति एक स्कूल में हुई और कोई इसकी सूचना तक गांव भर में नहीं दी गई.

विचाराधीन उच्च न्यायालय ने मामले

पर्यावरण मंजूरी को सबसे पहले गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी. सितंबर 2011 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय से मिलकर कोर्ट की एक बेंच ने एस्सार पर मैंग्रोव काटने या वनस्पतियों और जीव को नष्ट करने और पार्क के आसपास किसी भी गतिविधि में लिप्त हेने से रोक लगा दी थी.

2015 में, यह मामला एचसी पुणे में एनजीटी के पश्चिमी जोन को स्थानांतरित कर दिया. एस्सार ने इस हस्तांतरण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिस पर शीर्ष अदालत ने रोक लगा दी थी.

एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत याचिका में मछुआरों का दावा है कि एस्सार ने स्टे का इस्तेमाल निर्माण गतिविधियों को पुनः प्रारंभ करने के लिए किया है, सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि बंदरगाह पर निर्माण पर गुजरात उच्च न्यायालय के पहले के स्थगन आदेश पर रोक नहीं लगाई थी.

'याचिका में कहा गया, इस बीच कंपनी ने बेड़ों और लेवलिंग का काफी निर्माण कार्य किया है, खुदाई आदि का कार्य प्रगति पर है. इसलिए आवेदकों ने इस माननीय ग्रीन ट्राइब्यूनल में गुहार लगाई है. नतीजतन, उन्होंने हाल ही में कथित तौर पर पारिस्थितिक नुकसान के लिए एस्सार के खिलाफ नई याचिका लगाई है.

’एक लाख मछुआरे प्रभावित’

याचिका में दावा किया गया है कि बेड़ों का निर्माण कर कम्पनी ने समुद्र के बड़े क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है और इससे एक लाख से अधिक लोगों की आजीविका पर असर पड़ेगा, जो कि मछली पकड़ कर पेट पालते हैं. याचिका में आरोप लगाया गया है 'पर्यावरण और सीआरजेड मंजूरी के बाद, परियोजना का सही ढंग से प्रबंधन नहीं हो रहा है और न ही किसी तरह की सावधानी बरती जा रही है. कई तरह की अवैध अनयमितताएं भी नजर आईं.

याचिका में मांग की गई है कि पर्यावरण और तटीय निकासी की प्रक्रिया के लिए बार-बार जन सुनवाई की जाए. साथ ही यह भी अनुरोध किया कि ट्राइब्यूनल ऐसा आदेश जारी करे कि समुद्र के आसपास का वातावरण खराब करने वालों को यथास्थिति बहाल करने के लिए कीमत चुकानी पड़ें.

First published: 27 September 2016, 5:03 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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