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ईडब्ल्यूएस श्रेणी में स्कूल एडमिशन के लिए भी बच्चे अमीरों की दया पर निर्भर हैं

श्रिया मोहन | Updated on: 17 February 2016, 8:44 IST
QUICK PILL
  • सरकारी सहायता या जमीन प्राप्त निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें ईडब्ल्यूएस वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित हैं. लेकिन 2015 में इस कोटे के तहत उपलब्ध कुल सीटों का सिर्फ 29 प्रतिशत भरा.
  • गरीब वर्ग के लिए जरूरी प्रमाणपत्र बनवाना, ऑनलाइन आवेदन करना टेढ़ी खीर साबित होता है. ऐसे में उन्हें उच्च वर्ग के उन लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है जिनके लिए वो काम करते हैं.

कुछ हफ्ते पहले मुझे एक अनजान नंबर से फोन आया. फोन करने वाला गरीब बच्चों की मदद के लिए चंदा मांग रहा था. मैंने पूछा कैसे तो उसने कहा कि इस वेबसाइट पर लॉग इन कीजिए. मेरे मन में उम्मीद जगी कि अब शायद मेरी मेड के दो बच्चे स्कूल जा सकेंगे. लेकिन ये नहीं हो सका और मैं निराश हो गई.

साल 2009 में भारत सरकार ने राइट टू एजुकेशन एक्ट पारित किया था. इसके तहत सरकारी सहायता या छूट पर जमीन पाने वाले निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों पर आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) और वंचित तबके (डीजी) के बच्चों का एडमिशन करना होगा. करीब 80 प्रतिशत स्कूलों पर ये नियम लागू होता है.

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ऐसा लगता है कि देश के 80 प्रतिशत गरीबों को इस नियम के बारे में जानकारी ही नहीं है. अगर उन्हें पता हो तो भी स्कूल में शायद उन्हें दाखिला नहीं मिलता. 2015 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ईड्ब्ल्यूएस कोटे की कुल सीटों के महज 29 प्रतिशत पर ही एडमिशन हुआ. 

साल 2015 में इस कोटे के तहत दिल्ली में देश में सबसे अधिक 92 प्रतिशत सीटों पर एडमिशन हुआ था. जब मैंने इस बारे में थोड़ी और मालूमात की तो पता चला कि ईडब्ल्यूएस कोटे की 25 प्रतिशत सीटें छह साल की उम्र तक के बच्चों के लिए आरक्षित है.

अगर बच्चे की उम्र छह साल से कम है तो उसके एडमिशन के लिए आय प्रमाणपत्र और निवास प्रमाणपत्र के साथ आवेदन करना होता है.

2015 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ईडब्ल्यूएस कोटे की महज 29 प्रतिशत सीटों पर ही एडमिशन हुआ

दिल्ली में जिस परिवार की सभी स्रोतों से होने वाली सालाना आय एक लाख रुपये से कम हो उसे ही इस कोटे का लाभ पाने के योग्य माना जाता है. ऐसे में एक बड़ा तबका इस कोटे का लाभ पाने से वंचित रह जाता है.

कार्तिक की उम्र छह साल साल से कम है. उनके पिता प्रगति मैदान में गेटकीपर हैं. उनकी मासिक आय 10 हजार रुपये है. उनकी पारिवारिक आय करीब 15 हजार रुपये महीने होगी. अगर वो आय प्रमाणपत्र बनवाने जाएंगे तो उनकी आय एक लाख रुपये सालाना से अधिक होगी.

ये परिवार करीब चार हजार रुपये बच्चों की शिक्षा पर खर्च करता है. चार हजार मकान का किराया देता है और खाने-पीने पर करीब सात हजार रुपये हर महीने खर्च होते हैं. उनके पास राशन कार्ड भी नहीं है. ऐसे में महीने के अंत तक परिवार के पास कुछ नहीं बचता.

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दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय (2.41 लाख रुपये) देश में सबसे अधिक है. ऐसे में दिल्ली के सफाई कर्मचारी, रिक्शा और ऑटो चालक, मजदूर इत्यादि भी कोटा पाने वाले आय वर्ग से बाहर हो जाते हैं.

जो परिवार इस आय वर्ग में आते हैं उनके लिए भी निवास प्रमाणपत्र बनवाना काफी दुश्कर साबित होता है.

जब मैंने कार्तिक के परिवार से उनका निवास प्रमाणपत्र मांगा तो उन्होंने एलपीजी गैस की पासबुक मुझे दिखायी. जिस पर उनके पश्चिमी दिल्ली के चिल्ला गांव स्थित मकान मालिक का नाम और पता दर्ज था. उनके मकान मालिक के पास इलाके में कुछ और मकान हैं.

सभी किरायेदार मकान मालिक के रहमोकरम पर निर्भर रहते हैं. उन्हें कोई रेंट एग्रीमेंट नहीं मिलता. उनके आधार कार्ड और बैंक पासबुक पर कार्तिक के पिता के पिछले मालिक का पता है. अब वो उस पते पर नहीं रहते.

उन्हें अपना पता बदलवाने के लिए किसी राजपत्रित अधिकारी से एक पत्र लिखवाना होगा कि अब वो अमुक पते पर रहते हैं. उनकी मुश्किल है कि ऐसे गरीब परिवार के लिए कौन सा राजपत्रित अधिकारी ऐसा पत्र लिखेगा!

वंचित समूह


अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के कुछ परिवारों को वंचित समूह (डीजी) का दर्जा दिया गया है. ऐसे परिवारों को डीजी होने के एक प्रमाणपत्र दिया जाता है. सरकारी नियमों के अनुसार अगर परिवार डीजी श्रेणी का है तो उसे आय प्रमाणपत्र नहीं देना होगा.

कार्तिक के परिवार के पास उनके इलाहाबाद स्थित पैतृक गांव का बना डीजी प्रमाणपत्र है. इस प्रमाणपत्र के अनुसार ये परिवार अनुसूचित जाति के अंतर्गत आता है. लेकिन इससे उनकी मुश्किल आसान नहीं हो जाती.

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जाति प्रमाणपत्र को दिल्ली में प्रमाणित होना चाहिए. इसके लिए उन्हें अपने मूल जाति प्रमाणपत्र को एक राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित कराके एक प्रार्थनापत्र के साथ एक अन्य राजपत्रित अधिकारी से प्रमाणित कराना होता है.

जिस एकमात्र राजपत्रित अधिकार को दिल्ली में मैं जानती थी वो कुछ समय के लिए बहार गए हूं. इसलिए मेरे पास भी कार्तिक के परिवार की मदद का कोई दूसरा तरीका नहीं था.

दिल्ली में ईडब्ल्यूएस कोटा या डीजी कोटा के तहत एडमिशन पाना तुलनात्मक रूप से आसान है. सारी प्रक्रिया ऑनलाइन है. आप सारे दस्तावेज समेत अपना पंजीकरण करा दीजिए. जांच के बाद जब आपको स्कूल आवंटित हो जाएगा तो इसकी सूचना भी ऑनलाइन मिल जाएगी.

गरीब वर्ग के किसी बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत, ये कोई उच्च वर्गीय व्यक्ति तय कर रहा होता है.

गरीब परिवारों के लिए ये प्रक्रिया काफी टेढ़ी साबित होती है. इसलिए ऐसे परिवारों को उन उच्च वर्गीय परिवारों पर इसके लिए निर्भर होना पड़ता है जिनसे वे अपने रोजगार की वजह से जुड़े होते हैं.

ऐसे में गरीब वर्ग के किसी बच्चे के लिए क्या सही है और क्या गलत, ये कोई उच्च वर्गीय व्यक्ति तय कर रहा होता है.

कुछ स्कूलों में गरीब वर्ग के बच्चों के लिए अलग से कक्षाएं आयोजित की जाती हैं और उनके शिक्षा का स्तर भी तुलनात्मक रूप से कम रखा जाता है.

दूसरी तरफ निजी स्कूलों के संगठन ने अदालत में याचिका दायर की है कि ईडब्ल्यूएस कोटे से उनके कारोबार को नुकसान पहुंच रहा है. इस संगठन का कहना है सरकार को ऐसे बच्चों की शिक्षा का पूरा खर्च उठाना चाहिए.

ऐसे में जब तक हम ये नहीं समझ लेते कि बच्चों को शिक्षित करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है, तब भारत में हर घर तक शिक्षा की रोशनी पहुंचना मुश्किल है.

First published: 17 February 2016, 8:44 IST
 
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