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डीयू छोड़ 'दिल्ली साब' अचानकमार के जंगल में पढ़ा रहे समाजशास्त्र

शिरीष खरे | Updated on: 1 April 2016, 23:24 IST
QUICK PILL
  • \'दिल्ली साब\' के नाम से पहचाने जाने वाले प्रोफेसर प्रभुदत्त खेड़ा ने \r\nदिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्ति\r\n लेकर बैगाओं की संस्कृति के संरक्षण और अधिकारों के लिए कर रहे काम.

किसी शख्स की इस हद तक नि:स्वार्थ सेवा देखनी है तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 200 किमी दूर अचानकमार के जंगलों में एक बार जरूर हो आइए. यहां पर दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे प्रभुदत्त खेड़ा 33 साल से बैगा आदिवासियों की शिद्दत से सेवा कर रहे हैं. 

यहां के लोगों के बीच 'दिल्ली साब' के नाम से पहचाने जाने वाले प्रोफेसर खेड़ा दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्ति लेकर बैगाओं की संस्कृति के संरक्षण और अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं.

Chhatisgarh Achanakmar Forest

अचानकमार टाइगर रिजर्व एरिया के वनग्राम छपरवा (जिला मुंगेली) में प्रोफेसर खेड़ा की कोशिशों से 12वीं कक्षा तक का एक स्कूल भी चल रहा है. खास है कि उनके स्कूल में आने वाले 80 बच्चों में 40 लड़कियां हैं. सात साल में 27 बच्चे 12वीं पास हो चुके हैं. 

'अभयारण्य शिक्षा समिति' के नाम से वर्ष 2008 में खोले गए स्कूल में छह शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं. सुखद आश्चर्य होता है जब बीच जंगल में बने स्कूल में बुनियादी सारी सुविधाएं करीने से दिखाई पड़ती हैं.

प्रोफेसर साब की पूरी कोशिश है कि यहां का हर बच्चा 12वीं पास जरूर हो. उनका मानना है, 'शिक्षा से बैगाओं की जीवन बदल सकता है और वे इसी से अपनी पहचान भी बनाए रख सकते हैं.' पूछने पर वह बैगाओं के बीच काम करने की अपनी यात्रा के बारे में बताते हैं, 'मैंने सेवा शब्द को सुन रखा था, लेकिन जानना चाहता था कि इससे मिलने वाली संतुष्टि होती कैसी है! 

1983-84 की बात है एक दोस्त के यहां शादी में आना हुआ. दोस्त तब इस इलाके में बड़े पद पर सरकारी अधिकारी था. उसे दिल की बात बताई और कहा सेवा के लिए एक जगह ढूढ़ रहा हूं. इधर आसपास के कई गांवों में घूमा, फिर तय कर लिया कि अब यहीं रहकर सेवा करना है.

एक दिन मैंने देखा कि दस बरस की लड़की अपने फटे कपड़े छिपा रही है. बस उस दिन मुझे काम का मकसद मिल गया

मगर दो-तीन साल तो यही समझ नहीं आया कि काम शुरू करूं कहां से. फिर एक दिन मैंने देखा कि कोई दस बरस की लड़की अपने फटे कपड़े छिपा रही है. बस उस दिन मुझे काम का मकसद मिल गया. उसी दिन सुई-धागा खरीद लाया, और फिर छोटे-बड़े जिसे फटे कपड़े में देखा उसके कपड़े सिलने लगा.'

भरोसा जमाना आसान काम नहीं होता. बैगाओं के दिलों में जगह बनाने में प्रोफेसर साब को पांच साल लग गए. बैगाओं की बोली और रहन-सहन को समझने में बड़ी कठिनाई आई. मगर एक बार जब ठीक से कदम जम गए तो प्रोफेसर साब के लिए आगे का रास्ता आसान गया.

समाज-शास्त्र के प्रोफेसर के तौर पर 15 साल उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया है, लेकिन बदलाव के लिए जमीन पर काम करने की बैचेनी उन्हें यहां खींच लाई है. वह जन्म से लाहौर (पाकिस्तान) के हैं, लेकिन कर्म से खुद को छत्तीसगढ़ का मानते हैं. 

सालों से काम करने के अपने अनुभवों के आधार पर प्रोफेसर खेड़ा का कहना है, 'बैगाओं की पहचान नहीं बदलनी चाहिए. वह बताते हैं, 'अचानकमार के इस इलाके में भी बैगाओं को रास्ते से हटाने का डर दिखाया जा रहा है. यह लोग यहीं के हैं, जंगलों पर इनका हक हमसे पहले है.'

प्रोफेसर को माओवादी भी ठहराया

प्रोफेसर खेड़ा बताते हैं, 'जब उन्होंने यहां काम करना शुरू किया तो कुछ लोगों ने उन पर संदेह किया. उन्हें माओवादी भी ठहरा दिया, लेकिन पांच साल में उन्होंने अपने कर्म और तप से अहिंसा की एसी जमीन तैयार कर दी, जिसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं बची. ग्रामीण बताते हैं कि बात चाहे राशन की दुकान पर बैगाओं को खाने के लिए अनाज उपलब्ध कराने की हो या उनके लिए अच्छी सेहत की, खेड़ा उनके जीवन के लिए सदैव आगे रहे.

80 साल की उम्र में जज्बा नौजवान

छपरवा से कोई 20 किमी दूर वनग्राम लमनी में प्रोफेसर खेड़ा बैगाओं की तरह एक छोटी-सी झोपड़ी बनाकर रहते हैं. वे यहीं से सुबह 8 बजे स्कूल के लिए बस पकड़ते हैं और फिर 3 बजे वापस छपरवा से लमनी आते हैं. 80 साल की उम्र में भी उनके काम करने का जज्बा ऊर्जावान नौजवान को मात करता है. 

वो सारे काम खुद ही करते हैं. विचार और जीवन-शैली में रत्तीभर फर्क नहीं और उन्होंने खुद की दुनिया को पूरी तरह बैगाओं की तरह ही ढाल लिया है. तमाम तरह की आधुनिक सुविधाओं से वंचित इस इलाके में मोबाइल रखना भी उनके लिए कल्पना से बाहर की बात है. 

वे बताते हैं, 'मेरी दिनचर्या का पूरा हिस्सा सेवा में गुजरता है. बैगाओं की सेवा ही मेरे जीवन का आनंद है. इस आनंद में मुझे कभी दिल्ली या बाकी दुनिया फीकी दिखती है.'

First published: 1 April 2016, 23:24 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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