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वीपी सिंह: आजादी की लड़ाई में दलितों की प्रमुख भूमिका थी

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 June 2016, 12:23 IST
(साभार एचटी/वीरेंद्र प्रभाकर)
QUICK PILL
25 जून भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (1931-2008) की जन्मतिथि है. 1969 में वो कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक बने. कांग्रेस के ही टिकट पर वो 1971 में पहली बार सांसद बने. 1974 में इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में शामिल किया. 1980 में कांग्रेस ने उन्हें यूपी का सीएम बनाकर भेजा. हालांकि वो दो सालों तक ही इस पद पर रहे. 1984 में राजीव गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में शामिल करते हुए वित्त मंत्री बनाया. वित्त मंत्री के रूप में उन्हें लाइसेंस राज को उदार बनाने और प्रवर्तन निदेशालय को ताकतवर बनाने का श्रेय मिला. उनके वित्त मंत्री रहते हुए उद्योगपति धीरू भाई अंबानी और फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे से हड़कंप मच गया. नतीजतन, उन्हें वित्त मंत्रालय से हटाकर रक्षा मंत्री बना दिया गया. उनके रक्षा मंत्री रहते कुख्यात बोफोर्स तोप दलाली मामला सामने आया. जिसके बाद उनका मंत्री पद चला गया और वीपी ने कांग्रेस छोड़ दी. उन्होंने जनता दल के गठन में अहम भूमिका निभाई. 1989 में जनता दल गठबंधन सरकार में वो करीब 11 महीनों के लिए पीएम बने. पीएम के तौर पर भी उन्हें अन्य पिछड़ी जातियों को नौकरी और शिक्षा में आरक्षण देने का मण्डल कमीशन का सुझाव लागू किया. वीपी सिंह सरकार में साझीदार भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए रथयात्रा शुरू की. इस यात्रा के दौरान आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया. माना जाता है कि इस गिरफ्तारी की अनुमति वीपी सिंह ने दी थी. इसके बाद बीजेपी द्वारा अविश्वास प्रस्ताव में बहुमत हासिल न कर पाने के बाद उन्होंने पीएम पद से इस्तीफा दे दिया. 1991 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी. पीवी नरसिम्हाराव देश के पीएम बने. सत्ता से बाहर हो जाने के बाद वीपी की राजनीतिक भूमिका सीमित हो गई. 1998 में उन्हें कैंसर होने की बात पता चली. इसके बाद वो राष्ट्रीय राजनीति से धीर-धीरे दूर होते गए. 2006 में उन्होंने जन मोर्चा का गठन किया लेकिन इसे कोई खास चुनावी सफलता नहीं मिली. लंबी बीमारी के बाद 27 नवंबर 2008 को उनका निधन हो गया. 

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने वीपी सिंह से बातचीत पर आधारित पुस्तक ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह: मंजिल से ज्यादा सफर’ लिखी है. 

राय कहते हैं, "‘विश्वनाथ प्रताप सिंह: मंजिल से ज्यादा सफर’ नाम ही बहुत कुछ कह देता है.  इस बातचीत की खूबी यह है कि वीपी सिंह यह मान कर चल रहे हैं कि उन्हें अब आगे कोई पद नहीं लेना है. ऐसे में वे बेबाक बातें करते हैं."

पेश है इस पुस्तक में शामिल बातचीत के कुछ चुनिंदा अंशः

कांग्रेस में क्या जाति आधारित गुटबाजी का चलन था?

पूरी तरह जातिवादी गुट नहीं बने हुए थे. एक हद तक ही उन्हें जातिवादी गुट कहा जा सकता है. कुछ नेता हर जाति में अपना प्रभाव रखते थे. हेमवती नंदन बहुगुणा उन्हीं नेताओं में थे. कमलापति त्रिपाठी के इर्द गिर्द ब्राह्मण अधिक होते थे. लेकिन पं. कमलापति त्रिपाठी को जातिवादी नहीं कहा जा सकता. जाति की तरफ उनका झुकाव था लेकिन हेमवती नंदन बहुगुणा में वह भी नहीं था.

जाति से परे जाकर देखें तो कांग्रेस में जो टकराव उस समय थे, उनकी जड़ें कहां-कहां थीं?

एक टकराव आर्थिक माना जा सकता है. उत्तर प्रदेश में आजादी की लड़ाई में ब्राह्मणों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. उनके पास जमीन जायदाद कम थी. वह राजपूतों के पास थी. ज्यादातर जमींदार राजपूत थे. रियासतें भी उन्हीं के पास थी. उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण रियासतें सिर्फ दो ही रही हैं. जमींदारों की दिलचस्पी आजादी की लड़ाई में कम थी. उनको अपनी जमींदारी चले जाने का खतरा दिखता था. कांग्रेस में यह तबका बाद में आया. लेकिन साधारण राजपूत तो शुरू से ही कांग्रेस में थे.

ऐसे ही आजादी की लड़ाई में दलितों की प्रमुख भूमिका थी. कांग्रेस में जो सामाजिक ध्रुवीकरण बना था उसमें ब्राह्मण और दलित एक साथ थे. दलित और किसान की हिमायत में ब्राह्मण खड़े होते थे. इस कारण कांग्रेस के नेतृत्व समूह में ब्राह्मणों की प्रमुखता थी. उस समय जाति का बोलबाला वैसा नहीं था, वह बाद में आया.

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के जनाधार खिसकने के खास कारण आप क्या देखते हैं?

कांग्रेस का स्वाभाविक नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में था. दूसरे वर्ग दलित और मुस्लिम भी थे. जब स्वाभाविक नेतृत्व स्थापित हो जाता है तो वह चलता रहता है. उनका नए समूहों से कई बार टकराव भी होता है. नेतृत्व यह समझ नहीं पाता कि नए समूहों को किस तरह जगह दें और उनको कैसे शामिल करें. यही कठिनाई कांग्रेस की भी थी. जो जनाधार कांग्रेस का था उसे वापस लाने में कामयाब नहीं हो सके.

पहले फेयर फैक्स, फिर पनडुब्बी और उसके बाद बोफोर्स तोप सौदे में दलाली का सवाल उठा. उसकी जांच की मांग कैसे उठी?

अखबारों में दस्तावेज आदि छपने लगे. उस समय जांच की मांग उठी. उसी समय छपा कि अजिताभ बच्चन का स्विट्जरलैंड में बंगला है. वे एक टूरिस्ट के रूप में वहां गए थे. फिर बंगला कैसे खरीद लिया? उस समय फेरा सख्ती से लागू होता था.

क्या इसे आपने कहीं उठाया?

मैं उस समय कांग्रेस में था. संसदीय पार्टी की बैठकों में जाता था. वहां इसे उठाया. मैंने कहा कि प्रधानमंत्री जी आपने कहा है कि सच्चाई सामने लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. कृपया इस सच्चाई का पता करिए. इसकी जांच होनी चाहिए. अगर यह सही नहीं है तो उस अखबार के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जांच करवाएंगे.

राजीव गांधी से सीधी भेंट उस समय आपकी कहां हुई?

उन्होंने दो बार बुलाया.उन्होंने मुझसे पूछा कि यह क्या हो रहा है? उनके सवाल में यह छिपा हुआ था कि मैं विपक्ष से हाथ मिला रहा हूं. मैंने कहा कि यह बातचीत राजीव गांधी और विश्वनाथ प्रताप में हो रही है. इस भ्रम में मत रहिए कि हमारी बातचीत प्रधानमंत्री और मंत्री के बीच हो रही है. सीधी बात है कि अगर आप यह महसूस करते हैं कि मैं आपके साथ राजनीतिक खेल, खेल रहा हूं तो इस बातचीत का कोई फायदा नहीं है. ऐसे ही अगर मेरे मन में यह है कि आप मेरे साथ राजनीति कर रहे हैं तो इस बातचीत से हम कहीं नहीं पहुंचेंगे. हममें यह विश्वास और भरोसा होना चाहिए कि राजनीति आड़े नहीं आएगी.

अगली बात यह है कि केके तिवारी और कल्पनाथ राय मुझे सीआईए एजेंट कहते हैं. मैं जानता हूं कि ये लोग लाउडस्पीकर हैं. माइक इस कमरे में लगा है जहां हम हैं. यहां से जो बोला जाता है वही लाउडस्पीकर पर बाहर सुनाई पड़ता है. उनकी हिम्मत कहां है कि वे मुझे सीआईए एजेंट कहें.

राजीव गांधी ने क्या सफाई दी?

उन्होंने कहा कि पार्टी आपसे बहुत नाराज है. वे लोग भी नाराज हैं. इसलिए बोल रहे हैं. मैं इनसे कहूंगाा कि कम बोलें. मैंने उनसे कहा कि वे दस गाली दे रहे थे, अब दो गाली देंगे. कोई भ्रम न रहे इसलिए साफ-साफ कहा कि जो लोग गाली दे रहे हैं वे मेरी देश भक्ति पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं. जब देशप्रेम का सवाल आता है और जब भी आता है तो लोग जान की बाजी लगा देते हैं. अपना सिर कटा देते हैं और मैं भी अपनी देशभक्ति के लिए अंतिम दम तक ऐड़ी जमा कर लड़ूंगा.

इस पर उन्होंने क्या कहा?

राजीव गांधी ने कहा कि मैं इन लोगों को समझाउंगा. मैंने उनसे कहा कि देखिए आपकी मां के साथ काम करते हुए कांग्रेस नामक मशीन को हमने चलाया है. इसका एक-एक, नट-बोल्ट हम जानते हैं. मेरे जैसे सेकेंड रैंकर लोगों ने हेमवती नंदन बहुगुणा को भगा दिया क्योंकि वे यह चाहती थीं. वे नहीं बोलीं. हमलोगों ने ही यह काम किया.

First published: 27 June 2016, 12:23 IST
 
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