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समुद्री शिकारियों के शिकार के लिए छोड़ दी मर्चेंट नेवी

अश्विन अघोर | Updated on: 27 January 2017, 8:03 IST
(फ़ाइल फोटो )

मर्चेंट नेवी में एक दशक गुजारने और उसमें भी कॉरगो पोतों के कैप्टन की भूमिका निभा चुकने के बाद उसने महसूस किया कि वह इस शानदार नौकरी और दमदार वेतन के लिए ही नहीं बना है. मर्चेंट नेवी में उल्लंघनों के चलते होने वाले समुद्री प्रदूषण को अपनी आंखों से देख चुके सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने एक दिन तय कर लिया कि बस अब और नहीं और उन्होंने 2011 में अपने को उस नौकरी से मुक्त कर लिया. 

मर्चेंट नेवी में जलयान के कैप्टन की भूमिका निभाते हुए उन्होंने महसूस किया कि जिस इंडस्ट्री में वे हैं उसके लक्ष्यों को देखते हुए यह संभव नहीं कि वे समुद्री संपदा को बचाने के लिए कुछ कर सकें. इस इंडस्ट्री का एक मात्र उद्देश्य अधिक से अधिक पैसा कमाना है, समुद्र में प्रदूषण या समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाले नुकसान से इसका कोई सरोकार नहीं है.

...और नौकरी छोड़ दी

सिद्धार्थ चक्रवर्ती ने बताया कि मैं बेबस होकर अपने जहाज पर खतरनाक रसायन लदते हुए देखता. ऐसा करते हुए न तो कोई सावधानी बरती जाती और न ही किसी नियम का पालन. इन रसायनों को खतरनाक तरीके से लादा और उतारा जाता. ऐसा करते हुए सिर्फ एक ही लक्ष्य होता कि कैसे समय और पैसा कम से कम लगे. 

आखिर मैं इस सबको चुपचाप नहीं देख सकता था. इसलिए मैंने तय कर लिया कि मैं मर्चेंट नेवी छोड़ दूंगा. चक्रवर्ती ने दशकों तक नियमों का भारी उल्लंघन होते हुए देखा और अंत में समुद्र और समुद्री जीवन को बचाने के लिए अपनी ओर से जो छोटा सा कदम संभव था वो उठा लिया.

इसके बाद उन्होंने इस प्रकार के काम की तलाश शुरू कर दी जिसमें वे अपने कौशल का इस्तेमाल करते हुए समुद्र और समुद्री जीवन को बचाने के लिए के लिए उचित प्रयास कर सकें. 

सिद्धार्थ ने बताया कि वे इस प्रकार के वैज्ञानिक अभियान और शोध जलयान की खोज में लगे हुए थे जहां वे स्वयंसेवक और क्रू मेंबर की तरह काम कर सकें. अपने इस शोध के दौरान उनकी नजर समुद्री शेपहर्ड कंजर्वेशन सोसायटी पर गई. यही वह चीज थी जिसकी उनको तलाश थी. बस, बिना एक मिनट गंवाए उन्होंने इस सोसायटी को एक ईमेल लिखा और दस दिन के अंदर ही वे आस्ट्रेलिया के लिए अपनी यात्रा पर निकल चुके थे.

समुद्री शिकारियों का शिकार

2011 के आरंभिक दिनों में वे स्टीव इरिवन नामक पोत पर तैनात किए गए थे और यहीं पर उन्होंने सीधे हस्तक्षेप की कार्रवाई तथा समुद्री जीवन के संरक्षण के लिए कार्य आरंभ किया. इसके बाद वे स्टीव इरविन के कैप्टन भी बने और इस भूमिका में उन्होंने बीच समुद्र में जाकर सीधे हस्तक्षेप की कार्रवाई से कई व्हेल मछलियों के शिकार को रोका. इसके साथ ही दुनिया के कई दूसरे हिस्सों में उन्होंने अवैध फिशिंग पर कार्रवाई की. 

सिद्धार्थ ने बताया कि व्हेल मछली का अवैध शिकार अब भी जारी है और अगर हम इस शानदार जानवर को बचाना चाहते हैं तो हमें इसको अवश्य नियंत्रित करना होगा. सिद्धार्थ के अनुसार शेपहर्ड पर उनका प्रमुख काम दुनिया के विभिन्न हिस्सों में होने वाले अवैध समुद्री शिकार विरोधी अभियान चलाना ही था. सिद्धार्थ ने बताया कि अपने इस अभियान के दौरान 2012 में उन्होंने एक फिशिंग पोत का 110 दिन तक पीछा किया था. 

उन्होंने बताया कि वे यद्यपि जलयान के दल को तो पकड़ने में सफल रहे पर जलयान संचालकों ने उस पोत को पानी में डुबो दिया, जिससे हमारे हाथ में कोई प्रमाण नहीं आ सका. पर उन्होंने बताया कि पीछा करने के दौरान जो प्रमाण हमने एकत्र किए थे वो अभियोग के दौरान काफी असरदार साबित हुए और इस पोत के कैप्टन तथा सदस्य इन दिनों पूर्व अफ्रीका की एक जेल में हैं.

शिकारियों की तरकीब

दरअसल समुद्री जीवों का अवैध शिकार करने वालों की कार्यप्रणाली कुछ-कुछ कार चोरों या सेंधमारों की तरह होती है. जिस तरह से कार चोर चुराई गई कारों पर फर्जी नंबर प्लेट लगाते हैं, समुद्री जीवों के ये चोर-शिकारी भी ऐसा ही कुछ करते हैं. ये लोग एक देश में अपने पोत को पंजीकृत करते हैं, फिर बीच समुद्र में पहुंचने के बाद वे इस पोत नाम बदल देते हैं और जब वे काफी मछलियां पकड़ चुकते हैं तो किनारे पर पहुंचने के पहले वे फिर से अपने पोत का नाम बदल देते हैं. 

सिद्धार्थ ने बताया कि यह सब गिरफ्तारी और अभियोग से बचने के लिए किया जाता है. इस कारण अगर पोत चालक दल गिरफ्तार भी हो जाते हैं तो उन पर आरोप साबित करना अत्यंत मुश्किल कार्य होता है.

सिद्धार्थ ने बताया कि सिर्फ व्हेल मछली ही नहीं टूना, डॉल्फिन और शॉर्क मछलियों का भी अवैध शिकार हो रहा है. ये शिकारी चोर यानी पोचर जब मछली पकड़ने के जोश में होते हैं तो फिर उन्हें किसी मछली की दुर्लभता या उसके संकट से कोई वास्ता नहीं होता. ये शिकार करने के लिए जिस जाल का इस्तेमाल करते हैं उससे दूसरी मछलियां भी पकड़ी जाती हैं. और जब जाल बाहर निकाला जाता है तो उन मरी हुई मछलियों को वापस समुद्र में फेंक दिया जाता है जिनकी जरूरत नहीं होती. 

चीनी पोतों द्वारा प्राय: इस्तेमाल किया जाने वाला ड्रिफ्ट नामक जाल डॉल्फिन और शॉर्क के लिए काफी घातक साबित होता है. इस जाल को तो 1991 में ही प्रतिबंधित कर दिया गया था पर यह अब तक कई पोचर्स द्वारा इस्तेमाल किया जाता है. विभिन्न देशों के बीच परस्पर समन्वय की कमी होने के कारण इन पोचर्स के खिलाफ सबूत होने पर भी अपराध को सिद्ध करना और अभियोग चलाना अत्यंत मुश्किल कार्य होता है. 

मुश्किल रोकथाम

समुद्री जीवों का अवैध शिकार रोकने में सबसे बड़ी बाधा यह है कि पूरा समुद्र किसी एक सत्ता के क्षेत्राधिकार में नहीं आता. सिद्धार्थ का कहना है कि पोत को दुनिया के एक हिस्से में पंजीकृत किया जाता है, जबकि उसे चलाया दुनिया के दूसरे हिस्से में जाता है. पकड़ी गई मछलियों आदि को पहुंचाया दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में जाता है. जबकि पोत के चालक दल के सदस्य किसी दूसरे देश के होते हैं. इस कारण पोचर्स को दंड दिलाना अत्यंत मुश्किल कार्य हो जाता है. 

सिद्धार्थ इसका उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ताइवान के पोतों से अटलांटिक सागर में टूना मछली पकड़ी जाती है. जिसको सस्ते श्रम की उपलब्धता के कारण इंडोनेशिया में प्रोसेस किया जाता है और फिर इसे अमरीका में बेच दिया जाता है.

वर्तमान में 47 लाख पोतों द्वारा पूरी दुनिया में मछली पकड़ने का कार्य किया जाता है. ये पोत प्रति वर्ष 10 करोड़ टन की मछली पकड़ते हैं. इस प्रकार मछली पकड़ने का यह कारोबार प्रतिवर्ष 1.3 ट्रिलियन डॉलर का ठहरता है. सिद्धार्थ ने बताया कि इससे सिर्फ समुद्री जीवन ही नष्ट नहीं होता. अवैध मछली पकड़ने का कारोबार विभिन्न सरकारों द्वारा सब्सिडी के रूप में दी जाने वाली छूट पर चलता है जिसकी लागत अंतत: उस देश के करदाता चुकाते हैं. 

साथ ही इस अवैध धंधे में जो पैसा आता है उससे तमाम तरह के अपराध जैसे अमानवीय श्रम दोहन, मानव तस्करी, पोत पर हिंसा, बलात्कार, हत्या, मनी लान्ड्रिंग, कर चोरी, ड्रग स्मगलिंग और गन का कारोबार आदि पनपते हैं. अवैध पोचिंग ने सिर्फ समुद्री जीवों को ही नुकसान नहीं पहुंचाया है, बल्कि इस पोचिंग ने तटवर्तीय क्षेत्रों में रहने वाले मछली पकड़ने वाले समुदायों तथा मछली पालने वाले ग्रामीणों को भी नष्ट किया है.

First published: 27 January 2017, 8:03 IST
 
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