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'सोनिया के वफादारों ने मेरे खिलाफ उनके मन में जहर भरा'

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 December 2015, 7:59 IST
QUICK PILL
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार की आत्मकथा \'ऑन माई टर्म्स: फ्रॉम द ग्रासरूट्स टू द कॉरिडोर्स ऑफ पावर\' के चुनिंदा अंश.

राजनीति और क्रिकेट दोनों ही भारत में सुपरस्टारडम की पहचान रहे हैं और शरद पवार ऐसे आदमी हैं जो इन दोनों में गहरे धंसे हुए हैं. मराठवाड़ा की राजनीति के नायक राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत दखल रखते हैं.

जीवन के 75 पड़ाव पूरे करने के बाद उन्होंने अपनी कहानी अपनी जुबानी पेश की है. उन्होंने 'ऑन माई टर्म्स: फ्रॉम द ग्रासरूट्स टू द कॉरिडोर्स ऑफ पावर' नाम से अपनी आत्मकथा लिखी है. उन्होंने इसे भारत के नागरिकों को समर्पित किया है. इसकी प्रस्तावना 'मेरे पिता, मेरे नायक' उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने लिखी है.

शरद पवार की आत्मकथा के चुनिंदा अंश-

इंदिरा की हत्या और राजीव का बुलावा

5 जून 1984 को खालिस्तानी आतंकवादियों को स्वर्ण मंदिर से निकालने के लिए भारतीय सेना ने अपना ऑपरेशन शुरू किया. ऑपरेशन ब्लू स्टार का फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लिया था. ऑपरेशन में 492 आतंकवादी मारे गए. इसमें खालिस्तानी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाला भी शामिल थे. इसके बाद सिखों की तरफ  से हिंसक प्रतिक्रिया आई और 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई.

इंदिराजी की हत्या की खबर आने के तत्काल बाद मैं दिल्ली गया. राजीव गांधी को कांग्रेस ने संसदीय दल का नेता चुना और अगले ही दिन उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. जैसे ही मैंने इंदिराजी को श्रद्वांजलि दी वह मुझे एक तरफ ले गए और कांग्रेस में लौट आने की सलाह दी.

राजीव ने कहा, 'देखो शरद, मैं अपने आप को राजनीति से दूर रखा लेकिन अब स्थिति मुझे जबरन खींच रही है. हम दोनों एक ही पीढ़ी से आते हैं. आप कब तक विपक्ष में बैठेंगे ? यह हमारे काम करने का सही समय है.' फिर मैंने उन्हें कहा, 'मैं इस बारे में अकेले फैसला नहीं ले सकता. मुझे इस बारे में पार्टी से पूछना होगा.'

कांग्रेस से दूर होने पर

पवार लिखते हैं, 'मैं कांग्रेस से उस वक्त अलग हुआ जब मुझे लगा कि कांग्रेस अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है. यह 1978 और 1999 में हुआ. हम कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर उसमें 'मूल कांग्रेसी सिद्धांतों' को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध थे.'

आज भी कांग्रेस से मेरा भावनात्मक जुड़ाव है. इसलिए आज भी कांग्रेस पार्टी के पतन को देखकर मुझे दुख होता है. वह लिखते हैं, 'राहुल गांधी अपनी पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसका भविष्य अनिश्चित है.'

राम जन्मभूमि और बाबरी विध्वंस

पवार लिखते हैं, 'भले ही चंद्रशेखर की सरकार सात महीनों से अधिक नहीं चली लेकिन इस दौरान रामजन्मभूमि-बाबरी विवाद को संभालने की भरसक कोशिश की गई. बीजेपी नेता भैरो सिंह शेखावत और मैंने निजी तौर पर इस कोशिश में भाग लिया. हालांकि बहुत से लोग हमारी कोशिशों के बारे में दो कारणों से नहीं जानते हैं. पहला यह पूरी तरह से गैर आधिकारिक था और दूसरा इस कोशिश का कोई नतीजा नहीं निकला.'

1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला अदालत ने विवादित ढांचे के ताले को खोलने का आदेश दिया और इसके कुछ ही घंटों के भीतर राजीव गांधी की सरकार ने प्रस्तावित राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति दे दी. इस फैसले को हिंदु भावनाओं को संतुष्ट किए जाने के तौर पर देखा गया.

पवार ने लिखा है, 'बीजेपी की राजनीति मोदी के डिजाइनर कुर्ते और कांग्रेस की राहुल गांधी के ईर्दगिर्द घूम रही है'

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने सत्ता संभालने के तुरंत बाद ही इस मामले में बड़ी पहल की कोशिश की. उनके भैरो सिंह शेखावत के साथ अच्छे संबंध थे जिन्हें बीजेपी में 'नरम' हिंदू नेता माना जाता था. प्रधानमंत्री ने शेखावत और मुझसे मुलाकात की और मसले को सुलझाने के संभावित विकल्पों पर विचार किया. 

ढांचे के एक हिस्से में उस वक्त हिंदुओं को भगवान राम की छोटी मूर्ति की पूजा करने की अनुमति दी गई जबकि मुसलमानों को ढांचे के दूसरे हिस्से में नमाज अदा करने की अनुमति मिली. यह इस बात को ध्यान में रखकर किया गया कि हिंदुओं और मुसलमानों को उनकी आस्था के मुताबिक अलग-अलग हिस्से में पूजा करने की अनुमति दी जाएगी. इसके साथ ही दोनों पक्षों के बीच बातचीत आगे बढ़ाए जाने की सहमति बनी ताकि निकट भविष्य में इस मसले को सुलझाया जा सके लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा

'मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद उनके उत्तराधिकारी का मसला सामने आया. न केवल महाराष्ट्र बल्कि अन्य राज्यों में भी कांग्रेस के भीतर मेरे नाम पर विचार किया जा रहा था. हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता पीवी नरसिम्हा राव ने स्वास्थ्य कारणों की वजह से खुद को मुख्य धारा की राजनीति से दूर कर लिया था. लेकिन इसके बावजूद उन्हें राजीव गांधी के उत्तराधिकारी के तौर पर सामने लाए जाने को लेकर सुझाव आए. हालांकि इसके बावजूद बहुत सारी अनिश्चितताएं थीं.'

'निजी तौर पर मैं खुद सावधान था क्योंकि मैं जानता था कि कांग्रेस में किस तरह से काम होता है. बहुत कुछ 10 जनपथ पर निर्भर करता था जिसने अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला था. लेकिन उसने ये जल्द ही कर दिया. 10 जनपथ के स्वंयभू वफादारों ने यह कहना शुरू कर दिया कि पवार को प्रधानमंत्री बनाए जाने से नेहरू-गांधी परिवार के हितों को नुकसान होगा क्योंकि उनकी उम्र काफी कम है.' उन्होंने कहना शुरू किया, 'वह लंबी रेस का घोड़ा होगा.' 

अर्जुन सिंह, माखन लाल फोतेदार, आरके धवन और वी जॉर्ज ने चाल चली. सोनिया गांधी को उन्होंने सलाह दी गई कि नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाना उनके लिए सही होगा क्योंकि वह बूढे़ हो चुके हैं और उनकी हालत ठीक नहीं है. अर्जुन सिंह खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और उन्हें उम्मीद थी कि वह जल्द ही राव की जगह ले लेंगे. खैर जैसे ही सोनिया गांधी ने 'राव को वापस लाने वाले' समूह की बात मान ली सब कुछ मेरे खिलाफ हो गया.

भरोसा नहीं करतीं सोनिया गांधी

मैं उन लोगों में से था जिन्होंने सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया. तब हमारा परिचय बहुत ज्यादा नहीं था. लेकिन हमारे रिश्ते मधुर थे. वह पार्टी को चलाने के लिए दो से तीन लोगों पर भरोसा करती थीं. 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मेरे गृह राज्य महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीटें जीती थी और इसे लेकर कांग्रेस सहज नहीं थी.

इस वजह से सोनिया के वफादारों ने मेरे और उनके बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश की. उन्होंने सोनिया गांधी को यह बताया कि मैंने किस तरह से इंदिरा गांधी को नजरअंदाज करते हुए महाराष्ट्र में 1978 में पीडीएफ की सरकार बनवाई. कुछ स्वयंभू वफादारों ने सोनिया को यह भी बताया कि कैसे 1990 में जब महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री था तब मेरे कैबिनेट के कुछ कांग्रेसी मंत्रियों ने बगावत की थी.

सोनिया गांधी बहुत कुछ नहीं बोलती थीं लेकिन उनके चेहरे पर अविश्वास नजर आता था. यह उनके फैसलों में भी नजर आता था. जब वह और मैं कुछ मसलों पर आपसी सहमति से कुछ करने का फैसला कर लेते तो वह ठीक उसका उल्टा करती थीं.

सबसे दुखद बात यह रही कि सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस के संविधान में संशोधन किया गया. तब उन्होंने मुझे लोकसभा में कांग्रेस का नेता बनाया और मनमोहन सिंह को राज्यसभा का नेता. मैं इस फैसले से बेहद दुखी हुआ. मैं अब वैसे व्यक्ति की तरफ से 'नियुक्त'  किया जा रहा था जो खुद संसद की सदस्य तक नहीं थी. इसके बाद मेरी और सोनिया गांधी के बीच की दूरी बढ़ गई.

(शरद पवार की जीवनी 'ऑन माई टर्म्स: फ्रॉम द ग्रासरुट्स टू द कॉरिडोर ऑफ पावर' का प्रकाशन स्पीकिंग टाइगर ने किया है. ये अंश प्रकाशन की अनुमति से साभार लिया गया है.)

First published: 16 December 2015, 7:59 IST
 
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