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एक्सक्लूसिव: गोलवलकर ने दी थी गांधी की हत्या की धमकी, सीआईडी रिपोर्ट 1947

भारत भूषण | Updated on: 27 July 2016, 18:09 IST

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 'आरएसएस' को महात्मा गांधी का हत्यारा कहा तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि राहुल आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पर महात्मा गांधी की हत्या का 'सामूहिक आक्षेप' नहीं लगा सकते.

महात्मा गांधी की हत्या के 68 वर्ष बाद भारतीय अदालत द्वारा की गई इस टिप्पणी से एक नई बहस शरू हो गई है.

इस बहस में दो सवाल मौजूं हैं: एक, क्या आरएसएस महात्मा गांधी को जान से मारना चाहता था? और दूसरा, क्या आरएसएस ऐसा करने में सक्षम था?

तो महात्मा गांधी को गोडसे ने इसलिए मारा था?

दिल्ली पुलिस अभिलेखागार के सार्वजनिक दस्तावेज के अनुसार आरएसएस ने महात्मा गांधी को जान से मारने के बारे में सोचा था और ये दावा भी किया था कि वो उन्हें चुप कराने में सक्षम है. महात्मा गांधी की हत्या के महीनों पहले दिल्ली पुलिस की क्रिमिनल इन्वस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीआईडी) ने ये ब्योरा गुप्त सूत्रों के हवाले से दर्ज किया था.

हम आपके सामने आरएसएस की अहम गुप्त बैठक का पुलिस द्वारा दर्ज किया गया हूबहू ब्योरा पेश कर रहे हैं.

दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर करतार सिंह ने इस ब्योरे में आरएसएस के सूत्र को 'सेवक' के रूप में दर्ज किया है. (संभव है कि उन्होंने इसका प्रयोग संघ के स्वयंसेवकों के लिए किया हो.)

सेवक की रिपोर्ट

"8.12.47 को संघ के करीब 2500 स्वयंसेवक उनके रोहतक रोड के कैम्प में इकट्ठा हुए. थोड़ी देर ड्रिल करने के बाद संघ के गुरु एमएस गोलवलकर ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया. उन्होंने संघ के सिद्धांतों की व्याख्या की और कहा कि आने वाले संकट का पूरी शक्ति से सामना करना सबका दायित्व है. बहुत जल्दी उनके सामने पूरी योजना पेश की जाएगी. खिलवाड़ के दिन बीत गए..."

"सरकार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, कानून शक्ति का सामना नहीं कर सकता. हमें शिवाजी की तरह गुरिल्ला युद्ध के लिए तैयार रहना होगा. संघ तब तक चुप नहीं बैठेगा जब तक वो पाकिस्तान को मिटा न दे. अगर कोई हमारे राह में आया तो हम उसे भी मिटा देंगे, चाहे वो नेहरू सरकार हो या कोई दूसरी सरकार. संघ से जीतना संभव नहीं है. उन्हें अपना काम जारी रखना चाहिए."

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"मुसलमानों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, दुनिया की कोई ताकत उन्हें हिन्दुस्तान में नहीं रख सकती. उन्हें ये देश छोड़ना होगा. महात्मा गांधी मुसलमानों को भारत में रखना चाहते हैं ताकि कांग्रेस को चुनाव में लाभ मिल सके. लेकिन तब तक भारत में एक भी मुस्लिम नहीं बचेगा. अगर उन्हें यहां रखा गया तो इसकी जिम्मेदारी सरकार पर होगी और हिन्दू समुदाय इसके लिए कत्तई जिम्मेदार नहीं होगा."

"महात्मा गांधी हिंदुओं को और नहीं बहका सकते. हमारे पास ऐसे साधन हैं जिससे ऐसे लोग तुरंत चुप कराए जा सकते हैं लेकिन हिंदुओं का अहित करना हमारी परंपरा नहीं है. अगर हमें बाध्य किया गया तो हम वो रास्ता भी चुनेंगे."

लखनऊ सीआईडी के प्रमुख का पत्र

तत्कालीन सरकार को उस गुप्त बैठक की अहमियत का पूरा अंदाजा था. लखनऊ सीआईडी की स्पेशल ब्रांच के प्रमुख जीबी विग्गिंस द्वारा दिल्ली के सीआईडी प्रमुख को लिखे पत्र से भी इसका पता चलता है. विग्गिंस ने दिल्ली पुलिस को बार-बार इस बाबत चेतावनी दी. उन्होंने ही सबसे पहले मथुरा से मिली रिपोर्टों के आधार इस गुप्त बैठक के बारे में सावधान किया था. उनके दो बार याद दिलाने के बाद दिल्ली सीआईडी के एसपी ने उन्हें दिसंबर में हुई गुप्त बैठक का ब्योरा भेजा.

मथुरा से मिली जिस सीआईडी रिपोर्ट से विग्गिंस इतने परेशान हुए थे आरएसएस की वो बैठक 1 दिसंबर 1947 को मथुरा के गोबर्धन में किसी अंतु लाल वैश के घर पर हुई थी. इस बैठक में आरएसएस के करीब 50 लोग शामिल हुए थे. जिनमें एटा, अलीगढ़, दिल्ली और मथुरा से आने वाले लोग शामिल थे. वहां मौजूद लोगों को बताया गया कि "8 दिसंबर 1947 को दिल्ली में पूरे भारत के प्रतिनिधियों की बैठक होने वाली है, जिसके बाद भविष्य का कार्यक्रम तय किया जाएगा."

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सूत्र के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया कि 8 दिसंबर की बैठक में "एक बड़े कांग्रेसी नेता की हत्या के विषय पर चर्चा की जाएगी ताकि आम जनता में भय पैदा किया जा सके और उनपर (आरएसएस का) प्रभुत्व स्थापित किया जा सके."

इस पर कोई यह भी कह सकता है कि मथुरा और दिल्ली की रिपोर्ट से ये साबित नहीं होता कि आरएसएस के पास किसी बड़े कांग्रेसी नेता की हत्या करने के लिए जरूरी हथियार भी थे?

क्या आरएसएस के पास हथियार थे?

सीआईडी रिपोर्ट के अनुसार पुलिस को शक था कि आरएसएस हथियार हासिल करने की कोशिश कर रहा है. सीआईडी के एसपी दफ्तर की 13 नवंबर 1947 की एक "अति-गोपनीय" रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के मोरी गेट और दूसरे कई इलाकों में पुलिसवालों को स्थानीय मुसलमानों पर संभावित हमले के लिए फुसलाने की कोशिश की.

आरएसएस कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि उनके पास "हर तरह के हथियार हैं" और जब दंगा होगा तो पुलिस को उनपर गोली नहीं चलानी चाहिए क्योंकि वो हिन्दू हैं!

रिपोर्ट के अनुसार, "पुलिसवाले उनसे सहमत नहीं हुए, क्योंकि ऐसे में सरकार उनपर कार्रवाई कर सकती है." उनका कहना था कि अगर वो दंगे के दौरान गोली नहीं चलाएंगे तो मुसीबत में फंस जाएंगे और अगर वो चलाएंगे तो उसमें कुछ हिन्दू भी मर सकते हैं.

सीआईडी रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस के लोगों ने योजना बनाई थी कि अगर सांप्रदायिक हिंसा होती है तो संघ के लोग "अपने हाथों पर सफेद रूमाल बांध लेंगे ताकि वो पहचान में आ सकें."

सीआईडी रिपोर्ट की मानें तो आरएसएस के कार्यकर्ताओं के पास हथियार थे, वो मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की योजना बना रहे थे और इसमें वो अकाली सिखों की भी मदद लेना चाहते थे.

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सीआईडी इंस्पेक्टर करतार सिंह की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार आरएसएस के दो आजीवन सदस्य प्यारे लाल और हरबंस लाल सियालकोट से दिल्ली आए और फिर हरिद्वार और मसूरी गए ताकि पश्चिमी पंजाब के शरणार्थियों को एकजुट किया जा सके. करतार सिंह ने अपने वरिष्ठ अफसरों को लिखा था कि उन्हें शक है कि ये लोग हथियार हासिल करने की कोशिश कर रहे थे, हालांकि वो उसकी पुष्टि नहीं कर सके.

24 नवंबर 1947 की एक अन्य सीआईडी रिपोर्ट के अनसुार आरएसएस के कार्यकर्ताओं को हथियार मिल गया था.

रिपोर्ट के अनुसार, "अपुष्ट खबरों के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक कार्यकर्ता अलवर स्टेट गया था...कुछ दिनों पहले उसने 150 बंदूूकें खरीदीं और अपने स्वयंसेवकों को उन्हें चलाने का प्रशिक्षण दिया. उसने उन्हें किसी आपातकालीन स्थिति से तैयार रहने के लिए भी कहा."

इस रिपोर्ट की मानें तो या तो आरएसएस के पास हथियार थे या वो हथियार हासिल करना चाहता था ताकि उनका इस्तेमाल मुसलमानों और उनकी विचारधारा का विरोध करने वालों के खिलाफ किया जा सके.

नाथुराम की रिवाल्वर

6 फरवरी 1948 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार नाथुराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिस रिवाल्वर का इस्तेमाल किया था वो उसे नागपुर में आरएसएस के एक नेता से मिली थी. 

सीआईडी रिपोर्टों से उस बात को बल मिलता है जो जवाहरलाल नेहरू ने 28 फरवरी 1948 को सरदार पटेल को लिखे पत्र में कही थी. नेहरू ने लिखा था, "इस बात पर मेरा यकीन बढ़ता जा रहा है कि बापू की हत्या कोई एकाकी घटना नहीं थी बल्कि ये एक व्यापक कैंपेन का हिस्सा थी, जिसका प्रमुख  प्रणेता आरएसएस है."

नेहरू ने पटेल को सुझाव देते हुए कहा, "दिल्ली पुलिस में आरएसएस से सहानुभूति रखने वाले लोग अच्छी खासी संख्या में हैं. उनसे निपटना आसान नहीं होगा."

हालांकि सरदार पटेल ने आरएसएस को क्लीन चिट देते हुए नेहरू को जवाबी पत्र में लिखा, "ये साफ हो चुका है कि आरएसएस इसमें (गांधी की हत्या) शामिल नहीं था. ये हिंदू महासभा के एक अतिवादी समूह का काम था, जिन्होंने सावरकर के छत्रछाया में इसे अंजाम दिया, उन्होंने ही षडयंत्र बनाया और उसपर अमल सुनिश्चित किया."

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सरदार पटेल ने आगे लिखा, "ये सच है कि उनकी हत्या का आरएसएस और महासभा के लोगों ने स्वागत किया, जो उनकी (गांधी की) विचारधारा के पूरी तरह खिलाफ थे.'

हालांकि सरदार पटेल ने ये भी साफ किया कि, "आरएसएस जैसे खुफिया संगठन जिसकी सदस्यता, या पंजीकरण का कोई रिकॉर्ड नहीं होता, उसके बारे में ये पक्के तौर पर ये पता लगाना बहुत मुश्किल है कि कोई खास व्यक्ति उसका सक्रिय सदस्य है या नहीं."

अगर सीआईडी की ऊपर दी गई रिपोर्टें सही हैं तो ये साफ है कि महात्मा गांधी के जीवन को आरएसएस से खतरा था और ये खतरा सीधे संघ प्रमुख एमएस गोलवलकर से था. आरएसएस के पास ऐसा करने के साधन मौजूद थे और 8 दिसंबर 1947 को हुई बैठक में कथित तौर पर उन्होंने इसपर चर्चा भी की थी.

हालांकि निर्णायक तौर पर ये कहना मुश्किल है कि इन घटनाओं का नाथुराम गोडसे और उसके द्वारा महात्मा गांधी की हत्या से कोई संबंध था या उसने अकेले ही इस कुकृत्य को अंजाम दिया था.

First published: 27 July 2016, 18:09 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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