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भारत के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है जैव आतंकवाद

सुहास मुंशी | Updated on: 30 May 2016, 22:15 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • खाने और पीने के सामान की गुणवत्ता की निगरानी करने वाली संस्था एफएसएसएआई पर गुणवत्ता नियंत्रण के मामले में लापरवाही बरतने का आरोप है.
  • हैदराबाद ड्यूटी फ्री रिटेल लिमिटेड की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि एयरपोर्ट के ड्यूटी फ्री शॉप में बेचे जाने वाले सामान की निगरानी नहीं करता है, जिसकी वजह से भारत में जैव हमले का खतरा मंडरा रहा है.

पिछले साल दिसंबर में एक चिट्ठी सामने आई. यह चिट्ठी इस लिहाज से अहम है क्योंकि इसने भारत के खाद्य नियंत्रक के सुस्त रवैये की पोल खोल कर रख दी है. 

नोट बताता है कि किस तरह खाने और पीने के सामान की उचित निगरानी नहीं होने की वजह से वह जैव आतंकवाद का जरिया बन सकता है. यह चिट्ठी फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) को उसी के एक कानूनी सलाहकार ने लिखी थी.

पूरे मामले की शुरुआत हैदराबाद ड्यूटी फ्री रिटेल लिमिटेड की तरफ से दिल्ली हाई कोर्ट में दायर की गई याचिका से शुरू होती है. याचिका के तहत देश के अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर एफएसएसएआई की तरफ से बेचे जाने वाले खाने और पीने के समान की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी.

एचडीएफआरएल का कहना था कि एफएसएसएआई के पास एयरपोर्ट पर बाहर से आयातित फूड की निगरानी का अधिकार नहीं है. 

बचाव में कहा गया कि अगर एफएसएसएआई से खाने और पीने के सामान की निगरानी का अधिकार छीना जाता है तो देश में खराब खाद्य उत्पाद खाने की वजह से बीमारियां बढ़ेंगी. एफएसएसएआई के निगरानी नहीं होने की वजह से खराब खाद्य उत्पाद को भी आसानी से बेचा जा सकेगा. 

खराब निगरानी की व्यवस्था को लेकर पहली बार शायद किसी ने खाने और पीने के समान की गुणवत्ता को तय किए जाने की प्रक्रिया को जैव आतंकवाद का टूल करार दिया है.

कानूनी सलाहकार की तरफ से लिखी गई चिट्ठी के मुताबिक, 'सभी आयातित खाने और पीने की वस्तुओं की सुरक्षा की निगरानी भारत के सभी नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए.'

भारत बड़ी मात्रा में पड़ोसी देशों से गेहूं, चावल और मक्के का आयात करता है

याचिका में कहा गया है कि एफएसएसएआई को एयरपोर्ट के ड्यूटी फ्री शॉप्स पर बेचे जाने वाले समान समेत सभी आयातित खाने और पीने की वस्तुओं की निगरानी करनी चाहिए. 

याचिका में कहा गया है कि अब अगर किसी आतंकवादी को हमला करना है तो वह बम बनाने और उसे फोड़ने के पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं करेगा. बल्कि भारत के दुश्मन भारत भेजे जाने वाले खाद्य पदार्थों में बैसिलस एंथ्रैसिस या क्लॉस्ट्राडियम बोटुलिनम को मिला देंगे जिससे एंथ्रैक्स और मांसपेशियों को लकवा मारने जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है.

भारत दाल, चीनी, चाय, कॉफी, मसाले, ड्राई फ्रूट्स, खाने का तेल और डेयरी प्रॉडक्ट्स समेत बड़ी मात्रा में पड़ोसी देशों से गेहूं, चावल और मक्के का आयात करता है. 

सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कानूनी नोट में कहा गया है कि एफएसएसएआई का साफ कहना रहा है कि अगर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए तो भारत के लोगों को गंभीर बीमारी का सामना करना पड़ सकता है.

सूची में दूषित खाने और पीने की सामग्री से फैलने वाली बीमारियों और उसके लक्षणों के बारे में विस्तार से बताया गया है.

एफएसएसएआई की प्रतिक्रिया

एफएसएसएआई के चेयरपर्सन आशीष बहुगुणा ने संस्था को लिखे आंतरिक नोट में कहा, 'हमें खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चिंता को दूर करना होगा न कि बीमारी नियंत्रण या जैव आंतकवाद को.

यह हर लिहाज से देश के क्षेत्राधिकार से बाहर है. हमारी तरफ से उठाए जाने वाले उपाया बेहद सख्त होने चाहिए. मैं अपने निर्देशों को फिर से दुहराता हूं कि हमें इन मामलों में नहीं पड़ना चाहिए.'

एफएसएसएआई देश के किसानों और मछुआरों की तरफ से उत्पादित सामग्रियों को छोड़कर भारत में आने वाले सभी उत्पादों की निगरानी करती है. इसके क्षेत्राधिकार में पूरा भारत आता है.

हालांकि ट्रेड फ्रेंडली रवैया केवल एयरपोर्ट की दुकानों के लिए नहीं है. कैच के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि कैसे एफएसएसएआई ने भारत के 200 बड़े और छोटे बंदरगाह में से 125 पर खाद्य नियंत्रण और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया को कमजोर किया है.

खाद्य नियामक ने जांच के अधिकारों की जिम्मेदारी कस्टम डिपार्टमेंट के अधिकारियों को दे रखी है. अब ऐसे में कोई भी यह समझ सकता है कि कस्टम के अधिकारी किस तरह से खाद्य पदार्थों की निगरानी करते होंगे.

एफएसएसएआई के मुताबिक भारत में खाद्य पदार्थों की निगरानी के लिए एक पूरी प्रक्रिया स्थापित की गई है. फूड सेफ्टी ऑफिसर आयातित खाद्य सामग्री की निगरानी करता है और उसका सैंपल लेकर उसे जांच के लिए भेजता है.

असम, बेंगलूर, सूरत, अहमदाबाद, रेवाड़ी, पानीपत, मुंद्रा, जयपुर, इंदौर और अटारी उन पोर्ट्स में से एक है जिन्हें जांच केंद्र के तौर पर चिह्नित किया गया है. 

हाल ही में खाद्य सामग्री की निगरानी के दौरान कस्टमस डिपार्टमेंट की तरफ से की गई बड़ी  भूल को दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष लाया गया. एक फूड डिस्ट्रीब्यूटर ने एनर्जी जेल्स और एनर्जी च्यूज को आयात किया और उसे इसके लिए अनुमति मिल गई.

हालांकि बाद में पाया गया कि इंपोर्टर ने कस्टम की निगरानी में उन प्रॉडक्टस पर लेबल चिपकाए. कस्टम अधिकारियों के पास इस गलती का कोई जवाब नहीं था. 

अदालत ने कस्टम अधिकारी और एफएसएसएआई दोनों को कड़ी फटकार लगाई क्योंकि उन्होंने अदालत के समक्ष यह बयान दिया कि संबंधित प्रॉडक्ट्स उनके जांच के दायरे में नहीं आते हैं.

23 मई को आदेश में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि खाद्य पदार्थों की निगरानी एफएसएसएआई की जिम्मेदारी है. वह अपने इस अधिकार को किसी और को स्थानांतरित नहीं कर सकती.

कोर्ट ने कस्टम डिपार्टमेंट से कहा कि एफएसएसएआई के अधिकारियों की तरफ से हरी झंडी दिए जाने के बाद ही वह किसी प्रॉडक्ट को मंजूरी दे. हालांकि इस बीच खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.

First published: 30 May 2016, 22:15 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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