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गोविंदाचार्य: यह सरकार यूपीए का थोड़ा सुधरा हुआ संस्करण मात्र है

अतुल चौरसिया | Updated on: 23 June 2016, 8:28 IST

भारतीय बाजार इस समय दुनिया की सबसे खुली और उदार अर्थव्यवस्था बनने के मुहाने पर खड़ा है. सरकार ने एविएशन, रक्षा समेत तमाम क्षेत्रों को शत-प्रतिशत निवेश के लिए खोल दिया है. चौथाई सदी में समाजवादी अर्थव्यवस्था से बाजारोन्मुखी अर्थव्यवस्था बनने की कड़ी में भारत ने तेज प्रगति की है. जहां आज भारत पहुंच चुका है उसमें स्वदेशी जैसे विचारों की कितनी प्रसंगिकता बची है?

इसके अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था का क्षेत्र बीते कुछ दिनों में कई अन्य कारणों से भी विवादों में रहा है मसलन रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के ऊपर सरकार के एक हिस्से द्वारा खुलकर हमला किया गया. इससे भारत के अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैरजरूरी चर्चा मिली. इन तमाम विषयों पर संघ से जुड़े विचारक गोविंदाचार्य की अपनी सोच है.

गौरतलब है कि गोविंदाचार्य स्वदेशी जागरण मंच के मुखिया रह चुके हैं और एक दौर में उनका अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था के विरोध के कारण ही अलगाव हो चुका है. हालांकि संघ के थिंक टैंक के रूप में उनकी सक्रियता अभी भी बनी हुई है. इसके अतिरिक्त मौजूदा राजनीतिक विवादों और संविधान की मौजूदा रूपरेखा पर भी उनके अलग विचार हैं.

उनसे हुई विस्तृत बातचीत के अंश:

हाल ही में सरकार ने अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों को शत-प्रतिशत विदेशी निवेश के लिए खोल दिया है. आप खुली अर्थव्यवस्था के आलोचक रहे हैं. आपने स्वदेशी जागरणण मंच के जरिए एक वक्त खुली अर्थव्यवस्था का जमकर विरोध भी किया था. मौजूदा सरकार के रुख को किस तरह से देख रहे हैं?

इसके दो-तीन पहलू हैं. पहला तो यह सरकार की चीन के मुकाबले के लिए जापान और अमेरिका को साथ लेने की कोशिश का हिस्सा प्रतीत हो रहा है. दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सरकार लोगों के मन में तमाम अपेक्षाएं जगा चुकी है. कुछ व्यावहारिक, कुछ अव्यावहारिक हैं. इन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सरकार को अब पूंजी का घोर अभाव महसूस हो रहा है. हर काम के लिए उन्हें पैसा चाहिए. आयात-निर्यात सब नीचे गिर रहा है. यानी सरकार में किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति है. सरकार की ताजा घोषणा के पीछे मुझे तो लगता है कि पैनिक रिएक्शन ज्यादा है.

सरकार के पास वैकल्पिक विचार नहीं हैं. रक्षा के क्षेत्र में कितना खोलेगी, क्या अपने पास रखेगी, यही बात खाद्य प्रसंस्करण के बारे में कही जा सकती है. ग्रामीणों क्षेत्रों में विकेंद्रीकरण पर इस सरकार का भी कोई ध्यान नहीं है. बड़ी विदेशी कंपनियों को किस तरह से सरकार नियंत्रित करेगी, उसका कोई ढांचा अब तक नहीं है. ऐसे में ये घोषणाएं किस कदर मूर्त लेंगी, पूरी तरह अनिश्चित है.

सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ है. ताजा घोषणा के पीछे मुझे तो लगता है कि पैनिक रिएक्शन ज्यादा है

यह अनिश्चितता क्यों हैं? यह आपकी विचारधारा वाली सरकार है?

ना... मेरी विचारधारा वाली सरकार नहीं है. हो सकता है कि कुछ लोग सरकार में विचार के हों लेकिन सारे लोग विचारधारा के हैं, यह सोचना अतिशयोक्ति होगी. सरकार के विचार के साथ दिक्कत यह है कि उसे यह स्पष्ट नहीं है कि हम समाज किस तरह का चाहते हैं. जब तक देश के सामाजिक मॉडल के साथ आर्थिक नजरिया साफ नहीं होता तब तक कोई गुणात्मक अंतर नहीं आ सकता.

यह सरकार पिछली सरकारों से गतिशील भले ही दिखे लेकिन गुणात्मक दृष्टि से इसमें और बाकी सरकारों में कोई अंतर नहीं दिखता. मेरे ख्याल से इसे विचारधारा वाली सरकार कहने की बजाय तेजी से बढ़ता हुआ यूपीए का एक और संस्करण कहना ठीक रहेगा.

इस सरकार में भ्रष्टाचार भले ही न दिखे लेकिन सत्ता का जो केंद्रीयकरण है उसके दुष्परिणाम जरूर होंगे. विधायिका और ज्यादा कमजोर होगी.

सरकार की बात चल रही है तो एक संकट प्रतिभाओं का इस सरकार के सामने दिखता है. निफ्ट, एफटीआईआई पुणे, बीएचयू के वीसी के तौर पर जिन लोगों की नियुक्ति हुई वह विवादों की वजह बनी. क्या राष्ट्रवादी विचारधारा के सामने प्रतिभाओं का संकट है?

इस विषय पर मैंने बहुत विचार नहीं किया है. एक होता है छवि और दूसरा होता है क्षमतावान होना. बीते 20-30 सालों में जिन लोगों का छवि निर्माण होता रहा है जरूरी नहीं कि वे प्रतिभावान भी हों.

ऐसे कौन लोग हैं?

मैं किसी का व्यक्तिगत नाम नहीं लूंगा लेकिन आज ऐसे लोगों का केवल विचारधारा से होना ही सरकारी पदों पर आने की बड़ी वजह बन गया है. जरूरत अपने घर के भीतर प्रतिभाओं की तलाश का ढांचा विकसित करने की है, उन्हें खोजने की है. जो व्यक्ति प्रतिभाशाली होगा और साधना में जुटा होगा वह तो आपके पास चलकर नहीं आएगा. आपको उसे ढूंढ़ना होगा. उसके पास जाना होगा. वरना छवि निर्माण वाले आगे बढ़ते रहेंगे.

रिजर्व बैंक के गवर्नर को लेकर हाल में काफी विवाद रहा. ऐसा लगा कि सरकार के पास इस पद के लिए कोई विकल्प नहीं है. ऊपर से सरकार का एक हिस्सा उनके ऊपर हमला करता रहा.

मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर अनावश्यक बयानबाजी हुई. इससे बचा जा सकता था. जो जरूरी चीजें थी उन पर बात नहीं हुई मसलन एनपीए का मुद्दा सिर्फ विजय माल्या तक सीमित होकर न रह जाय, महंगाई और ब्याज दर के बीच संतुलन बना रहे. ये सब करने की बजाय अनावश्यक बयानबाजी होने लगी.

केवल 14% मतदाताओं के आधार पर संविधान सभा का गठन हुआ. यह सबका प्रतिनिधित्व नहीं करता था

आपको लगता है कि सुब्रमण्यम स्वामी ने गलत किया?

देखिए उनकी एक शैली है. उन्हें कौन रोक सकता है. साथ ही मेरा मानना है कि जिस तरह से राजन के पक्ष में बयान खड़ा किया गया वह भी गैरजरूरी था. राजनीति में खुलेपन और सौहार्द की जरूरत है. यहां अविश्वास बहुत बढ़ गया है.

इस मामले में किसी एक को दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा. जब जो सत्ता में रहता है वही लक्ष्मण रेखा लांघता है. यह परंपरा बन गई है. मौजूदा सत्ताधारी लोग भी वही कर रहे हैं. यह 30-40 साल से हो रहा है. सरकार जनादेश के नाम पर दलीय हित को साध रही है.

सरकार से जुड़े लोग नेहरू बनाम अंबेडकर की बहस खड़ा कर रहे हैं. क्या यह सही है?

दो बातें हैं. अंबेडकर ने स्वयं राज्यसभा में कुछ बातें कही थी जिसे आज कोट किया जा रहा है. आप जब गहराई से देखेंगे तब आपको संविधान सभा में नेहरू और राजेंद्र प्रसाद की भूमिका ज्यादा निर्णायक लगेगी. अंबेडकरजी ने अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाई लेकिन उसके पीछे भी गांधीजी का सहयोग था.

गांधीजी की संविधान बनाने में ज्यादा नहीं चली थी. किसी तरह से उन्हें संतुष्ट करने के लिए संविधान में गोरक्षा को नीति निदेशक सिद्धांत का हिस्सा बना दिया गया. ग्राम स्वराज को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया जो कि गांधीजी का मूल मंत्र था. गांधीजी भी उस समय यह मानकर चुप रहे कि भविष्य में इन तमाम चीजों को बदलने का अभियान चलाएंगे लेकिन नियति ने ऐसा होने नहीं दिया.

संविधान के मौजूदा स्वरूप पर आपको भी कई आपत्तियां हैं? संविधान में कौन से बदलाव आपको जरूरी लगते हैं?

केवल 14% मतदाताओं के आधार पर संविधान सभा का गठन हुआ क्योंकि उस समय तक देश में सबको 18 वर्ष की आयु में वयस्क मताधिकार का हक नहीं मिला था. अंग्रेजों द्वारा चुने गए कुछेक प्रतिनिधियों और राजे-रजवाड़ों की संविधान सभा के गठन में खूब चली. लेकिन वह समग्र संविधान सभा नहीं थी.

संविधान के मौजूदा प्रारूप पर गहराई से अध्ययन किए जाने की जरूरत है. मसलन आरक्षण ने समाज के दुर्बल तबकों को सशक्त करने की दिशा कुछ योगदान किया है लेकिन अब इससे आगे बढ़ने की जरूरत है. अब गरीब को अधिकार दिए जाने की जरूरत है. प्राकृतिक संपदा पर जीवन यापन करने वालों को बिना रोकटोक के उसका अधिकार मिले. यहां विस्थापन और मुआवजे की लड़ाई में हम फंसे हैं. पारिस्थितिकी आधारित विकास की कल्पना हो.

संविधान क्या है, यह जिले तक चलता है. उसके नीचे जोर और दबंगई का कानून चलता है. ब्यूरोक्रेसी को बदलना होगा. व्यक्ति की बजाय परिवार को ईकाई मानना होगा. समाज की सच्चाई से संविधान को जोड़ने की जरूरत है.

आप जब गहराई से देखेंगे तब आपको संविधान सभा में नेहरू और राजेंद्र प्रसाद की भूमिका ज्यादा निर्णायक लगेगी

यानी आपको लगता है कि मौजूदा संविधान भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता?

यह सफल कहां हो पा रहा है. मौजूदा संविधान की मानें तो गरीबी रेखा के नीचे 70 करोड़ की आबादी को प्रतिमाह दस हजार रुपए देना चाहिए. अगर कल्याणकारी राज्य की कल्पना सत्य है तो. पर यह कहां हो रहा है और यह संभव भी नहीं है. यानि की हमारे संविधान में कुछ तो गड़बड़ी है.

हाल ही में आपका एक बयान संविधान को लेकर आया था कि इसमें बदलाव की जरूरत है. क्या आप इस दिशा में कोई काम कर रहे हैं?

मैं कुछ नहीं कर रहा हूं, सरकार को करना है. एक बात जान लीजिए कि यह देश संविधान से नहीं संस्कार से चल रहा है. परिवार की ईकाई है जो व्यक्ति को चलाती है. करोड़ो युवा इस देश में बेरोजगार हैं. बेरोजगार बेटे को उसका रिटायर पिता पालता है, संविधान वहां असफल हो जाता है. आशक्त मां-बाप को बेटा और परिवार पालता है संविधान सात सौ रूपए की आधी-अधूरी वृद्धा पेंशन भी सुनिश्चित नहीं कर पाता.

कहने का मतलब है कि देश को परिवार की ईकाई चला रही है संविधान नहीं. इसलिए संविधान को उसके मुताबिक बनाना होगा. संविधान के साथ न्यायपालिका की संरचना पर भी पुनर्विचार करना होगा.

कुछ तो अच्छाइयां होंगी मौजूदा संविधान में?

कुछ चीजें है जिनपर ध्यान देना जरूरी है. मसलन यह व्यक्ति की मूल सम्मानजनक जीवन यापन की बात करता है, यह हाशिए पर खड़े व्यक्ति के हित में पॉजिटिव डिसक्रिमिनेशन की बात करता है. ये ऐसी चीजें है जिनपर ध्यान देना होगा. हमारा मौजूदा संविधान एक कदम आगे बढ़ा है लेकिन इसे और उपयोगी बनाने की जरूरत है.

First published: 23 June 2016, 8:28 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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