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शरद यादव की विदाई और नीतीश कुमार की निष्कंटक राह

आकाश बिष्ट | Updated on: 6 April 2016, 12:19 IST

जनता दल (यूनाईटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस बात से अवगत करवा दिया है कि वे पार्टी अध्यक्ष के रूप में चौथे कार्यकाल के लिए उत्सुक नहीं हैं, लिहाजा अब उनके स्थान पर किसी और को चुनकर इस पद का प्रभार सौंप दिया जाना चाहिये. इस बीच पार्टी के भीतरी सूत्रों का दावा है कि नीतीश कुमार खुद जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने के इच्छुक हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने एक बयान जारी कर कहा, ‘‘पार्टी अध्यक्ष के रूप में शरद यादव लगातार तीन कार्यकाल पूरा कर चुकेे हैं. उन्हें एक और कार्यकाल देने के लिए पार्टी के संविधान में बदलाव करना पड़ता. शरद यादव ने पार्टी के संविधान में किसी भी प्रकार का संशोधन न करने की बात कही.’’ जदयू के अगले अध्यक्ष का चुनाव 10 अप्रैल को पटना में आयोजित होने वाली पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में किया जाएगा.

यादव को वर्ष 2013 में लगातार तीसरी बार पार्टी अध्यक्ष चुना गया था और ऐसा करने के लिये पार्टी के संविधान में संशोधन भी करना पडा था. चूंकि पार्टी का संविधान एक व्यक्ति को अध्यक्ष पद के केवल दो ही कार्यकाल की अनुमति प्रदान करता था इसलिये उसे संशोधित किया गया था.

यादव पहली बार वर्ष 2006 में पार्टी के अध्यक्ष के चुने गए थे और उन्होंने जाॅर्ज फर्नांडीज़ के स्थान पर इस पद को संभाला था. इसके बाद वे वर्ष 2010 में नीतीश कुमार के समर्थन से दोबारा पार्टी अध्यक्ष बनने में सफल रहे.

हालांकि यादव मूलतः मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं, लेकिन वे बीते कई दशकों से बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं और उन्हें प्रदेश में लालू प्रसाद यादव की काट के रूप में स्थापित किया गया था.

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उन्होंने 1999 में यादवों का गढ़ मानी जाने वाली मधेपुरा सीट पर राजद मुखिया लालू यादव को हराने में सफलता भी प्राप्त की थी. बीते कई चुनावों में एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे ये दोनों नेता 2015 बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान एक मंच पर तब आए जब कुमार ने राजद के साथ गठबंधन का फैसला किया.

दरअसल यादव का अध्यक्ष के रूप में एक और कार्यकाल न बढ़ाने के फैसले के पीछे चुनाव आयोग भी एक वजह माना जा रहा है जिसने पार्टी से 15 जुलाई से पहले अगले संगठनात्मक चुनाव का ब्यौरा पेश करने को कहा है. 

इससे पहले पार्टी ने चुनाव आयोग को सूचित किया था कि चूंकि वह विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में व्यस्त है इसलिये वह अभी संगठनात्मक चुनाव करवाने की स्थिति में नहीं है और संभवतः 30 जून तक पार्टी इस प्रक्रिया को पूरा कर पाने में सफल होगी.

जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता ने कैच को बताया कि चूंकि पार्टी 2019 के आम चुनावों में बीजेपी को सीधी टक्कर देने की योजना बना रही है, ऐसे में 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों की तरह बीजेपी का सामना करने के लिये गठबंधन के दरवाजे खुले रखने के इरादे से पार्टी नीतीश कुमार को केंद्र में रखना चाहती है.

नीतीश कुमार का पार्टी अध्यक्ष के रूप में पदभार संभालना प्रशांत किशोर की रणनीति का एक हिस्सा है जो चाहते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री पार्टी पर पूरा नियंत्रण करें

वे बताते हैं, ‘‘कुमार के नेतृत्व में हम बीजेपी का सामना करने के लिये बेहतर स्थिति में होंगे. अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल और झारखंड विकास मोर्चा के साथ विलय की बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है और इसका सारा श्रेय नीतीश कुमार को जाता है. उनके नेतृत्व में हम अपने जैसी विचारधारा वाले कई अन्य दलों को अपने साथ सफलतापूर्वक जोड़ सकते हैं और बीजेपी के खिलाफ एकजुट होकर लड़ सकते हैं.’’

पार्टी में यादव की भूमिका की बाबत पूछे जाने पर उनका कहना था कि वे पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और वे पार्टी को मार्गदर्शन देना जारी रखेंगे. 

उन्होंने कहा, ‘‘वे एक शानदार सार्वजनिक जीवन जीने वाले राजनेता हैं जिनका राजनीतिक कौशल बेहतरीन रहा है. आज के इस दौर में जब लोग सत्ता के भूखे हैं ऐसे में उन्होंने पार्टी में शीर्ष स्थान के लिये किसी और का चुनाव करने के लिये कहकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है. भविष्य में पार्टी द्वारा लिये जाने वाले तमाम निर्णयों में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे.’’

ऐसा भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार का पार्टी अध्यक्ष के रूप में पदभार संभालना प्रशांत किशोर की रणनीति का एक हिस्सा है जो चाहते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री पार्टी पर पूरा नियंत्रण करें और बिना किसी विरोध के अपनी नीतियों को लागू कर सकें.

कांग्रेस के कई नेताओं ने इस बात से भी सहमति जताई है कि किशोर सिर्फ कुमार के कहने पर ही विभिन्न राज्यों के चुनाव अभियानों में कांग्रेस की मदद करने को तैयार हुए हैं और पूरी उम्मीद है कि वे 2019 के लोकसभा चुनावों में भी ऐसा करेंगे.

इस बीच चर्चा इस बात की भी है कि 2013 में एनडीए से बाहर होने का फैसला लेने के बाद से ही यादव और कुमार के बीच तनातनी चल रही थी. एनडीए के संयोजक के रूप में यादव इस गठबंधन को जारी रखना चाहते थे जबकि कुमार नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किये जाने के घोर विरोधी थे. 

हालांकि दोनों के बीच कई मुद्दों पर मदभेद थे लेकिन जब कुमार ने बीजेपी से संबंध तोड़ने का फैला किया तब यह जगजाहिर हो गया कि जेडीयू में किसकी तूती बोल रही है.

First published: 6 April 2016, 12:19 IST
 
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