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असम: भाजपा-एआईयूडीएफ की गफलत में कांग्रेस को फायदा

राजीव भट्टाचार्य | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • शुरुआती रुझान के बावजूद असम में कांग्रेस बढ़त बनाती हुई नजर आ रही है. अभी तक ऐसा लग रहा था कि सत्ता विरोधी रुझानों की वजह से कांग्रेस को नुकसान होगा.
  • बीजेपी अभी तक असम को लेकर साफ नीति नहीं बना पाई है. वह स्थानीय मुद्दों पर काम करने की बजाए वोटों के धुव्रीकरण पर ज्यादा भरोसा दिखा रही है.

असम में सत्ताधारी कांग्रेस की स्थिति बेहतर हुई है. राज्य में कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. 2014 के आम चुनाव में असम में कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान साफ दिखा था. भारतीय जनता पार्टी को उस राज्य में जबर्दस्त बढ़त मिली जहां कांग्रेस तरूण गगोई के नेतृत्व में पिछले तीन चुनावों में लगातार जीत दर्ज करती आ रही थी. 

हालांकि कांग्रेस के विरोधी दल बीजेपी और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) की आंतरिक गुटबाजी ने पश्चिमी असम में पार्टी को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दिया है. पश्चिमी असम के इलाके में कांग्रेस की स्थिति बहुत अधिक मजबूत नहीं दिखाई दे रही थी.

नहीं मिला समर्थन

चार महीने पहले विश्लेषकों और खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों ने यह मान लिया था कि एआईयूडीएफ को राज्य के 126 में से कम से कम 35 सीटें मिलेंगी. 2011 में पार्टी को 18 सीटों पर जीत मिली थी और उसे चार पर बेहद कम मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. यह विश्लेषण 2011 के जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है जिसके मुताबिक कुछ जिलों में मुस्लिम आबादी में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है.

एआईयूडीएफ को उस वक्त मजबूती मिली जब पूर्व कांग्रेसी मंत्री और बिहार के पूर्व राज्यपाल देवानंद कुंवर ने दो महीने पहले पार्टी में शामिल होने का फैसला लिया. हालांकि पार्टी इस मौके को भुनाने में सफल नहीं हो पाई. 

एआईयूडीएफ  के भीतर कई लोग इस बात को लेकर आश्चर्य में रहे कि आखिर पार्टी सुप्रीमो बदरुद्दीन अजमल ने मुद्दों को उठाने की बजाए केवल धर्म पर ही ध्यान क्यों केंद्रित रखा. उन्हें अब इस बात को लेकर भी आशंका होने लगी है कि क्या अजमल कभी इन चीजों से उबर पाएंगे.

कांग्रेस का प्रचार

कांग्रेस कई विधानसभा क्षेत्रों में विकास के मुद्दे को उठाने में सफल रही है जहां से पिछले चुनाव में एआईयूडीएफ के उम्मीदवार हारे थे. पार्टी के अधिकारियों ने लगातार उसे बीजेपी के खतरों के प्रति आगाह किया है. इससे कांग्रेस को अल्पसंख्यक वाले इलाकों में अपनी पैठ मजबूत करने में मदद मिली है.

 बीजेपी के पदाधिकारी असम गण परिषद के साथ गठजोड़ को लेकर विरोध कर रहे हैं

अभी तक के चुनावों में राज्य में बाहर से आकर बसे लोग उसी पार्टी को वोट देते रहे हैं जिसके जीतने की संभावना सबसे ज्यादा होती है. 1996 में उन्होंने असम गण परिषद के पक्ष में मतदान किया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी अवैध प्रवासियों की समस्या का समाधान कर देगी.

लड़ाई से बाहर एजीपी

असम गण परिषद चुनाव जीतने में तो सफल रही लेकिन शुरुआत से ही उसकी हालत खराब होती रही है. अब उसकी कोशिश बीजेपी के साथ गठबंधन करने की रही है. लेकिन बीजेपी के पदाधिकारी असम गण परिषद के साथ गठजोड़ को लेकर विरोध कर रहे हैं.

बीजेपी के मुताबिक वैसी पार्टी से हाथ मिलाने में कोई भलाई नहीं है जो तीन-चार से ज्यादा सीट भी जीतने की हालत में नहीं है. असम बीजेपी में गुटबाजी अपने चरम पर है. हर गुट विधानसभा चुनाव के पहले अपने उम्मीदवार खड़ा कर रहा है. जो लंबे समय से पार्टी में रहे हैं वह पार्टी में कांग्रेस और असम गण परिषद से आए नेताओं का विरोध कर रहे हैं. कुछ नेता तो बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट का भी विरोध कर रहे हैं.

लड़खड़ाती बीजेपी

पिछले महीने तक बीजेपी को फंड की सबसे अधिक जरूरत थी. पार्टी के एक सांसद ने बताया, 'हाईकमान जमीनी वास्वकिताओं से पूरी तरह कटा हुआ है.' उन्होंने कहा, 'स्थिति हमारे पक्ष में होती अगर हम समय पर घोषणा कर देते. अब बीजेपी को अपने दम पर समर्थन लेना होगा लेकिन अब मौका हाथ से निकल चुका है.'

11 फरवरी को बीजेपी प्रेसिडेंट अमित शाह ने कोकराझार की एक रैली में कहा था कि पार्टी बांग्लादेश से होने वाले घुसपैठ पर रोक लगाएगी लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि अभी तक इस मामले में क्या-क्या कदम उठाए गए हैं. 

पार्टी हाईकमान अभी तक असम को लेकर मन नहीं बना पाई है. राज्य नेतृत्व का प्रस्ताव अक्सर अनसुना कर दिया जाता है. वह वोटों के ध्रुवीकरण पर जोर दे रही है. यह सच है कि धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन स्थानीय मुद्दों का भी चुनाव के नतीजों पर असर पड़ता है.

First published: 15 February 2016, 11:03 IST
 
राजीव भट्टाचार्य @catchhindi

गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार. 'रांदेवू विथ रिबेल्सः जर्नी टू मीट इंडियाज़ मोस्ट वांटेड मेन' किताब के लेखक.

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