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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में हुआ बड़ा बदलाव

पिनाकी भट्टाचार्य | Updated on: 13 February 2016, 19:02 IST
QUICK PILL
  • आईएमएफ  के मनी बास्केट में अब युआन को शामिल किया जा चुका है और इसके साथ ही आईएमएफ के करेंसी की संख्या 5 से बढ़कर 6 हो गई है.
  • युआन को शामिल किए जाने के फैसले को आईएमएफ  के भीतर एशियाई ताकत के उभार के तौर पर देखा जा रहा है. 

दो हालिया घटनाओं ने इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (आईएमएफ) के सत्ता समीक रण को पलट कर रख दिया है. आईएमएफ  के बास्केट में अब चीनी करेंसी युआन को शामिल करते हुए इसे एसडीआर अधिकार दिया गया है. पहले इस बास्केट में 5 देशों की करेंसी को शामिल किया गया था. युआन को शामिल किए जाने के फैसले को एशियाई ताकत को मिल रही मान्यता के तौर पर देखा जा रहा है.

दूसरा आईएमएफ  ने चीन, भारत, रूस और ब्राजील समेत चारों देशों के लिए नई परिभाषा तय करते हुए इसे ईएमडी यानी इमर्जिंग मार्केट्स डिवेलपिंग कंट्रीज का नाम दिया है. इन देशों के मौजूदा कोटा में 6 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है और इस नए समीकरण के बाद ब्रेटन वुड्स के संस्थापक सदस्यों की हिस्सेदारी में कमी आई है.

फेरबदल के बाद इन चारों देशों को दुनिया की 10 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का मौका मिलेगा. इसके साथ ही इनके कर्ज लेने की क्षमता और वोटिंग हिस्सेदारी में भी बढ़ोतरी होगी. 

चारों देशों की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी किए जाने का फैसला 2010 में आईएमएफ  की 14वीं समीक्षा बैठक में लिया गया था. लेकिन अमेरिकी कांग्रेस की तरफ से मान्यता नहीं दिए जाने की वजह से यह प्रस्ताव 5 सालों के लिए लटक गया था. इससे यह संदेश गया था कि अमेरिकी सरकार आईएमएफ को अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट के विस्तार के तौर पर देखता है.

चीन और भारत के कोटा में 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है और इससे इनके वोटिंग अधिकार में बढ़ोतरी होगी

चारों देशों की बढ़ी हिस्सेदारी पश्चिमी देशों के मौजूदा कोटा के मुकाबले कम नजर आ सकती है लेकिन इससे एशियाई देशों को धारणा के स्तर पर बढ़त मिली है.

क्या है महत्व

पहला इस फेरबदल के बाद चीन और भारत को वैसी अर्थव्यवस्थाओं के तौर पर मान्यता मिली है जो दुनिया की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की ताकत रखते हैं. जबकि अमेरिका और यूरोप की अर्थव्यवस्था लगातार सिकुड़ रही है.

हालांकि यह आईएमएफ के शक्ति समीकरण में बड़ा बदलाव नहीं है लेकिन यह ग्लोबल साउथ के लिए बढ़त है क्योंकि अभी तक आईएमएफ की पहचान गरीब देशों के प्रति सकारात्मक नहीं रही है. साफ तौर पर वह 2008 की मंदी के दौरान आर्थिक और वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने में सफल नहीं हो सकी.

क्रिस्टीन लैगार्ड की छवि वैसे मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर बनी है जो बेहद सख्त हैं लेकिन जब वह विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था के बारे में बात करती हैं तो उनकी छवि ज्यादा मानवीय नजर आती है. आईएमएफ के रुख में बड़े बदलाव के पीछे तीन कारण जिम्मेदार हैं.

जी-7 रूस के शामिल किए जाने के बाद जी-8 में तब्दील हो गया. सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस जी-7 में शामिल हुआ. जी-7 को और अधिक सदस्यों को शामिल कर अपने दायरे को बढ़ाना था और यह वैश्विक मंदी के पहले जी-20 में तब्दील हो गई.

दूसरा बीजिंग की प्रेरणा के बाद एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक बना जहां हाल ही में भारत को इसका चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर बनाया गया है.

तीसरा ब्रिक्स बैंक की स्थापना रहा. इन सभी घटनाक्रमों ने ब्रेटनवुड्स के पूंजी पर एकाधिकार को चुनौती दी.

आईएमएफ  में एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके डॉ. अरविंद विरमानी का मानना है कि वैकल्पिक संस्थानों के सदस्य एआईबी और एनडीबी में साझी दिशा में आगे कदम बढ़ा सकते हैं. विरमानी ने कहा, 'चीन कभी भी गुट निरपेक्ष का सदस्य नहीं रहा है. हालांकि यह इस समूह को समर्थन देता रहा है लेकिन आईएमएफ में उसका रुख अपने हितों से निर्धारित होता रहा है. वहीं कई विकाशील और पिछड़े देश धनी देशों के नेतृत्व में वोट देते हैं क्योंकि उन्हें इसके बदले में अनुदान मिलता है.'

First published: 13 February 2016, 19:02 IST
 
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