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106 साल पुराना कावेरी जल विवाद और इससे जुड़ा वो सब जो आप जानना चाहते हैं

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 7 September 2016, 13:25 IST

तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी छोड़ने के उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद  मंगलवार को पूरे कर्नाटक में  हिंसक प्रदर्शन हुए, सड़कों पर बसों का संचालन पूरी तरह बंद रहा. प्रदर्शनकारियों ने सभी हाईवे को जाम कर दिया था. कानून-व्यवस्था की स्थिति को बनाए रखन के लिए लगभग  2,400 पुलिस कार्मियों को तैनात किया गया था.

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कर्नाटक को निर्देश दिया था कि तमिलनाडु के किसानों की दिक्कतें दूर करने के लिए वह अगले 10 दिन अपने पड़ोसी राज्य तमिलनाडु को 15000 क्यूसेक पानी रोजाना छोड़े. पिछले सप्ताह ही शीर्षस्थ न्यायालय ने, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या के यह कहने के बाद कि वह तमिलनाडु को एक भी बूंद पानी नहीं देंगे, कर्नाटक से भावनात्मक अपील की थी कि 'जियो और जीने दो'.

दोनों राज्यों के बीच लम्बे अर्से से चल रहे इस अनसुलझे विवाद का एक ब्यौरा. कब-कब क्या हुआ.

106
वर्ष

  • यह विवाद 1910 से शुरू होता है जब दोनों राज्यों ने कावेरी पर बांध बनाने की योजना बनाई.
  • इसके पहले 1892 में ब्रिटिश राज की मध्यस्थता में मैसूर राज्य और चेन्नई प्रेसीडेन्सी पानी के बंटवारे को लेकर सहमत हो गए थे.
  • 1924 में अंग्रेजों की मध्यस्थता में फिर समझौता हुआ. यह समझौता दोनों राज्यों के कृषि क्षेत्र को लेकर हुआ था. यह समझौता अगले 50 सालों तक के लिए था.

300
किमी

  • कूर्ग में अपने उद्गम स्थान से निकलने के बाद कर्नाटक में इस नदी का बहाव क्षेत्र है.
  • यह नदी राज्य में 2.5 लाख एकड़ कृषि क्षेत्र के लिए जीवनरेखा है.
  • इसकी तुलना में तमिलनाडु में यह नदी 15 लाख एकड़ क्षेत्र के लोगों के लिए रोजी-रोटी का प्रबंध करती है. तमिलनाडु में इसका बहाव क्षेत्र 500 किमी के करीब है.
  • तमिलनाडु को भारी मात्रा में पानी की जरूरत खेती कार्यों के लिए है. यह मुद्दा आम तौर पर जब जोर पकड़ता है जब कम बारिश होती है.

1972

  • में केन्द्र सरकार ने एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई थी क्योंकि 1924 में किए गए समझौते की अवधि खत्म हो रही थी.
  • कमेटी को पता चला कि तमिलनाडु कावेरी नदी के जल का 566 टीएमसी फीट पानी का इस्तेमाल करता है जबकि कर्नाटक 177 हजार टीएमसी फीट.

1976

  • दोनों राज्य इस बात पर सहमत हुए कि पानी का उपयोग पहले की तरह जारी रहेगा और 125 टीएमसी फीट पानी की बचत की जाएगी और उसे स्टोर किया जाएगा.

1986

  • तमिलनाडु के तंजावुर के किसानों से जुड़ी एक संस्था सुप्रीम कोर्ट में चली गई जहां उसने कावेरी विवाद के हल के लिए ट्रिब्यूनल की मांग की.
  • 1990 में दोनों राज्यों के बीच समझौता विफल हो गया. शीर्षस्थ न्यायालय ने केन्द्र को ट्रिब्यूनल गठित करने का निर्देश दिया.अगले साल ट्रिब्यूनल ने कर्नाटक को आदेश दिया कि वह हर साल तमिलनाडु को 205 टीएमसी फीट पानी दे, और सिंचाई का क्षेत्र न बढ़ाए. कर्नाटक ने दृढ़ता के साथ इस आदेश को  मानने से इनकार कर दिया.

2007

  • ट्रिब्यूनल ने अपना अंतिम निर्णय दिया और 1892 और 1924 के समझौते को बरकरार रखा.
  • एक शताब्दी पुराने समझौते के अनुसार कावेरी का 75 फीसदी पानी तमिलनाडु को और 23 फीसदी कर्नाटक को मिलना है.
  • इसका अर्थ यह हुआ कि तमिलनाडु को 416 टीएमसी फीट पानी और कर्नाटक को 270 टीएमसी फीट पानी मिलेगा. हालांकि कर्नाटक ने पुनर्विचार यायिका दाखिल की हुई है.

इस मुद्दे को सुलाझाने के लिए अब तक 25 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं. लेकिन परिणाम शून्य ही रहा. जिस साल बारिश कम होती है, उस साल यह विवाद जोर पकड़ लेता है. सोमवार का उच्चतम न्यायालय का आदेश इसी तथ्य पर आधारित है कि तमिलनाडु में पिछले तीन महीनों में बहुत कम बारिश हुई है और वह 35 टीएमसी फीट पानी चाहता है ताकि उसकी जरूरत पूरी हो सके. उधर, कर्नाटक ऐतिहासिक समझौते को बदलना नहीं चाहता और तुरन्त ही आन्दोलन की राह पकड़ लेता है. मामले की अगली सुनवाई 16 सितम्बर को होनी है.

First published: 7 September 2016, 13:25 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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