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वरुण गांधी से क्यों खफा हैं भाजपा के शीर्ष नेता?

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 June 2016, 12:23 IST

उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा चुुनाव नजदीक आ रहे हैं, भाजपा का अभियान भी तेज होता जा रहा है. भाजपा कभी भी अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर सकती है. असम में चुनाव से काफी पहले ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा करने के बाद वहां हुई जीत से पार्टी काफी उत्साहित नजर आ रही है.

हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो सका है कि उम्मीदवार कौन होगा- राजनाथ सिंह, उमा भारती और स्मृति ईरानी आदि के नाम पर पहले से ही अटकलें लगाई जा रही हैं. इन नामों के बीच एक नाम वरुण गांधी का भी उछल रहा है, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि वरुण गांधी इस दौड़ से बाहर हैं.

इस युवा राजनेता को पहले से ही पार्टी नेतृत्व ने निर्देश दे दिए हैं कि वो अपनी राजनीतिक गतिविधियां अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर तक ही सीमित कर दें. 

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उत्तर प्रदेश के एक शीर्ष नेता के मुताबिक, वरुण "को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि अगर वो अपने संसदीय क्षेत्र से बाहर कोई राजनीतिक गतिविधि करना चाहते हैं तो उन्हें पार्टी से अनुमति लेनी पड़ेगी."

वरुण गांधी के प्रति क्यों नहीं है लगाव?

बीते माह बिना पार्टी को जानकारी दिए इलाहाबाद की यात्रा पर पहुंचे वरुण से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नाराज है. उनके समर्थकों ने एक पोस्टर वार भी शुरू कर दिया और उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बताते हुए इलाहाबाद में ढेर सारे पोस्टर-बैनर लगा दिए. उनकी यह योजना प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व को पसंद नहीं आई.

पिछले महीने उनकी इलाहाबाद यात्रा के दौरान उनके समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की मांग की. लेकिन वरुण के किसी कार्यक्रम में स्थानीय इकाई का कोई नेता शामिल नहीं हुआ. उल्टे वरुण की सभा में इलाहाबाद के पार्टी जिलाध्यक्ष का पुतला भी फूंका गया. इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने वरुण के कार्यक्रमों पर एक रिपोर्ट उत्तर प्रदेश इकाई से मांगी थी.

मौर्या की रिपोर्ट के आधार पर ही अमित शाह ने वरुण पर प्रतिबंध लगाए

हालांकि वरुण भाजपा की प्रदेश इकाई में काफी मशहूर हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व का एक तबका प्रदेश में पार्टी के अभियान का प्रमुख चेहरा स्मृति ईरानी को बनाना चाहता है. इससे पार्टी के अंदर कलह का माहौल बन गया है. इससे निपटने के लिए भाजपा के प्रदेश प्रमुख केशव प्रसाद मौर्या को केंद्रीय नेतृत्व के पास जाना पड़ा. 

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राज्य के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, "मौर्या की रिपोर्ट के आधार पर ही अमित शाह ने वरुण पर प्रतिबंध लगाए. अब वो पार्टी की अनुमति के बिना सुल्तानपुर के बाहर कोई अभियान नहीं कर सकते."

पिछले एक साल से ज्यादा वक्त से वरुण ने बार-बार अपने लोकसभा क्षेत्र से बाहर सभाएं और रैलियां की. उन्होंने उत्तर प्रदेश के तमाम हिस्सों का भ्रमण किया और इसके लिए अपनी खुद की टीम तैयार की. 

इसमें आश्चर्य नहीं है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उनसे नाराज हैं. उन पर पार्टी के अनुशासन के उल्लंघन का आरोप है और कार्रवाई की मांग की जा रही है. यह रिश्ते इस कदर बिगड़ चुके हैं कि भाजपा के नीति निर्माता और वरुण एक दूसरे से आंख नहीं मिला पा रहे हैं.

अपने सरनेम का भी बोझ

वरुण के खिलाफ जो चीजें जा रही हैं उनमें एक वजह उनके नाम के साथ जुड़ा गांधी सरनेम भी है. भाजपा काफी लंबे वक्त से कांग्रेस पर निशाना साधती आई है. उसका कांग्रेस पर आरोप रहा है कि यह एक अलोकतांत्रिक और वंशवादी राजनीति की प्रमोटर है. कुछ वक्त पहले तक भाजपा वरुण गांधी को कांग्रेस के गांधी यानी राहुल के खिलाफ खड़ा करने की सोचती थी लेकिन आज की तारीख में वह विचार फायदेमंद नहीं रहा. आज की तारीख में वरुण गांधी उसी गांधी परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कांग्रेस की वंशवादी राजनीति की पहचान हैं.

हालांकि वरुण गांधी की भाजपा कैडर के बीच अच्छी-खासी लोकप्रियता है लेकिन स्थानीय नेताओं को नजरअंदाज करके उन्होंने बड़ी गलती है. स्थानीय नेताओं के मन में यह बात है कि वरुण उन्हें सम्मान की निगाह से नहीं देखते. यह स्थिति वरुण के खिलाफ जा रही है. इसके अलावा एक सच्चाई यह भी है कि वे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चहेतों की सूची में शामिल नहीं हैं. पार्टी के सूत्र के मुताबिक दोनों वरुण की महत्वाकांक्षाओं को पसंद नहीं करते.

First published: 13 June 2016, 12:23 IST
 
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