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पारिवारिक जंग में और मजबूत हुए अखिलेश, क्या यह लड़ाई का पटाक्षेप है?

महेंद्र प्रताप सिंह | Updated on: 16 September 2016, 16:17 IST

देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे में मचे महाभारत का पांच दिन बाद पटाक्षेप हो गया. समाजवादी पार्टी टूट से बच गई. अखिलेश-शिवपाल की नाक सलामत है. और मुलायम सिंह यादव खुश हैं. इस सियासी ड्रामे में सब कुछ वैसा ही मंचित हुआ, जैसी स्क्रिप्ट लिखी गई थी. चार दिन की राजनीतिक सरगर्मी के बाद शुक्रवार मुलायम एकांतवास से बाहर आए. बाप-बेटे दोनों एक साथ मीडिया के सामने थे. दोनों अलग-अलग, अलग जगहों पर. खास बात यह थी कि दोनों के चेहरे पर आत्मविश्वास स्पष्ट झलक रहा था. और दोनों ही गर्व से भरे हुए. इस पूरे परिदृश्य से कोई गायब था तो वे थे, रूठे शिवपाल यादव.

आत्मविश्वास से भरे मुलायम अखिलेश

लखनऊ में पार्टी कार्यालय में सपा प्रमुख मुलायम सिंह बोले, मेरे रहते पार्टी में कोई फूट नहीं डाल सकता. अखिलेश-शिवपाल में कोई झगड़ा ही नहीं है. यह तो दोष परिवार का है जो, घर की लड़ाई मीडिया में चली गई. आखिर किस घर में ऐसा नहीं होता? मुलायम ने गायत्री प्रजापति की मंत्रिमंडल में बहाली की घोषणा की और पांच मिनट में प्रेस कान्फ्रेंस खत्म. जब मुलायम सिंह यह सब बोल रहे थे तब अखिलेश होटल ताज में एक कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे. मीडिया ने सवाल दागा तो अति विश्वास से भरे मुख्यमंत्री का जवाब था, जो कुछ हुआ सब ठीक हुआ. हमारे चाचा से संबंध मधुर हैं. लेकिन, उन्होंने एक चेतावनी भी दे डाली. बोले-अब हमारे और पिता जी के बीच में कोई तीसरा नहीं होगा.

यूपी में साढ़े तीन नहीं सिर्फ एक सीएम

दोनों नेताओं के बयान के बाद सपा का अंदरूनी मामला शांत हो गया. लेकिन, सवाल अब भी खड़ा है. पूरा मामला यदि सियासी ड्रामा था तो इस ड्रामे का मकसद क्या था? और यदि यह पार्टी में वर्चस्व के जंग की लड़ाई थी तो आखिर कौन जीता और हारा कौन? बात पांच दिन चले सियासी तूफान के पीछे किसी तीसरे के हस्तक्षेप की. यह बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि पिछले साढ़े चार साल  से सरकार और संगठन की बागडोर अखिलेश के हाथ में होने के बावजूद उन पर भारी दबाव था. कभी पिता का, कभी चाचा को तो कभी किसी और का. वे मनमाफिक फैसले नहीं ले पा रहे थे. इसलिए विपक्ष भी यह तोहमत लगाने लग गया था कि उप्र में एक नहीं तीन-तीन मुख्यमंत्री हैं.

तीन महीने बाद चुनाव में उतरने जा रहे अखिलेश को यह बात साल रही थी. इससे वह छुटकारा पाना चाहते थे. इसलिए वे किसी मौके की तलाश में थे. राजनीतिक विश्लेषक तो यह मानते हैं कि खनन मामले से जुड़े मामले के एकाएक सामने आने के बाद जिस तरह से सरकार और संगठन पर संकट आया उससे निपटने के लिए मुलायम की शह पर ही अखिलेश ने कड़े फैसले लिए. पहले मंत्रियों की बर्खास्तगी फिर चाचा शिवपाल के पर कतरे जाने का निर्णय एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा था. इसकी पटकथा बेटे को मजबूत करने के लिए खुद मुलायम सिंह ने लिखी.

जाहिर है अपने स्वास्थ्यगत कारणों के चलते मुलायम सिंह यादव  पार्टी का हस्तांतरण अखिलेश को करना चाहते हैं. ऐन चुनाव के वक्त यह सबसे सही मौका था. रामगोपाल को आगे करके अखिलेश को निर्दोष साबित करने की कोशिश इसी कड़ी का हिस्सा थी. मुलायम का निशाना सही बैठा और अखिलेश के कठोर निर्णय से जनता में यह संदेश गया कि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचारियों से लड़ना चाहते हैं. साथ ही जनता यह जान गई कि अखिलेश से बड़े उनके चाचा शिवपाल नहीं हैं. यानी पार्टी और सरकार में उनसे बड़ा कोई नहीं. मुख्यमंत्री केवल एक हैं. वह हैं अखिलेश यादव. कुल मिलाकर पूरे प्रकरण से अखिलेश की छवि रॉबिन हुड और खुदमुख्तार की बनी.

अखिलेश बने खुद मुख्तार

अब बात शिवपाल यादव की. जगजाहिर है शिवपाल के बेटे आदित्य की शादी करवाकर अमर सिंह दोबारा सपा परिवार में शामिल हुए हैं. इसके बाद से आए दिन वे शिवपाल के पक्ष में लाबिंग करते रहे हैं. दीपक सिंघल की मुख्य सचिव के पद पर तैनाती शिवपाल के  कहने पर ही अखिलेश ने की थी. विवादित मंत्री राजकिशोर और गायत्री प्रजापति भी शिवपाल के खास रहे हैं. इसलिए इन पर बर्खास्तगी की तलवार गिरी.  सिंघल का हटाया जाना और मंत्रियों की बर्खास्तगी शिवपाल  को अपना अपमान लगा.

साढ़े चार साल से मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले शिवपाल को लगा ऐन चुनाव के वक्त अपनी अहमियत जताने का यह बढिय़ा मौका है. इसलिए वे रूठ गए.  लेकिन इस पूरे मामले में उनकी छवि भ्रष्टाचारियों के संरक्षणकर्ता की बनी. दूसरे वे हर जगह बचाव की मुद्रा में दिखे. मामले को सुलटाने के लिए मुलायम से मिलने गए. अखिलेश से मिले. लेकिन अखिलेश अपने निर्णय के बाद निश्चिंत रहे. अब जब कि मामले का पटाक्षेप हो गया नुकसान में शिवपाल ही दिख रहे हैं. सभी पदों से इस्तीफा देने के बाद फिर से कुर्सी संभालने पर यही संदेश जाएगा कि शिवपाल एक आज्ञाकारी पार्टी कार्यकर्ता हैं रॉबिनहुड तो सिर्फ अखिलेश ही हैं. मुलायम की यहीं मंशा थी और वे इसमें कामयाब रहे हैं.

तीसरे का दखल बर्खास्त नहीं

सियासी ड्रामे का अंतिम संदेश यही है कि समाजवादी पार्टी में बाप-बेटे के अलावा किसी तीसरे की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं. यानी सरकार अखिलेश चलाएंगे और पार्टी मुलायम सिंह यादव. अखिलेश के बयान का निहितार्थ यही है कि उनके और मुलायम के अलावा संगठन और सत्ता में किसी और की कोई भूमिका नहीं होगी. इस तरह संगठन में न होते हुए भी अखिलेश ने पिता के जरिए अपनी बात और अपनी मंशा पूरी करने की आजादी हासिल कर ली है. इसमें जो भी बाधक बनेगा उसका जाना तय है. वह चाहे कोई रिश्तेदार हो, मित्र हो, भाई हो या चाचा-भतीजा. अब तक पूरे प्रकरण में मुख्य किरदार की भूमिका में रहे अमर सिंह से इतर मुलायम सिंह यादव ने लालू प्रसाद यादव का नाम लेकर यह बताने की कोशिश की थी ये कुछ लोग हैं जो पार्टी में दखल दे रहे हैं लेकिन अखिलेश के कड़े संदेश के जरिए सब को चेतावनी देने की भी कोशिश की गई.

First published: 16 September 2016, 16:17 IST
 
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