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मुलायम-शिवपाल-अखिलेश: भाई पर भारी पड़ी बेटे की मुहब्बत

आकाश बिष्ट | Updated on: 21 April 2016, 7:46 IST
QUICK PILL
  • शिवपाल को प्रभारी बनाने के बाद ही उनके समर्थकों के बीच आशा की एक नई किरण का संचार हो गया था. शिवपाल समर्थकों को लगने लगा था कि अब शायद मुलायम नेतृत्व संभालने के लिये अपने छोटे भाई को राज्य की बागडोर सौंप देंगे.
  • शिवपाल का सपना रहा है कि मुलायम के संन्यास के बाद वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें. हालांकि समय आने पर मुलायम ने अपने भाई के मुकाबले अपने बेटे को तजरीह दी.

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में अपने छोटे भाई शिवपाल यादव को मुख्यमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार घोषित करने को लेकर चल रही तमाम अटकलों को विराम दे दिया है.

मैनपुरी में पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने अपने बेटे अखिलेश को देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के तमगे से नवाजा. इस दिग्गज नेता ने कहा, ‘‘अखिलेश पूरे देश के सबसे अच्छे मुख्यमंत्री हैं. उन्होंने एक विकसित उत्तर प्रदेश का निर्माण करने के अलावा गरीबों और दलितों के उत्थान के लिये पूरी मेहनत की है और अगला विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में लड़ा जाएगा. उनके द्वारा प्रारंभ किये गए विकास के कार्य पूरे प्रदेश में कहीं भी देखे जा सकते हैं.’’

पार्टी के नेताओं का मानना है कि मुलायम ने ऐसा कहकर अंदरखाने अखिलेश के खिलाफ काम करने वालों को अपने तरीके से एक संदेश देने का प्रयास किया है. 

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पार्टी के अंदरूनी सूत्र कहते हैं, ‘‘यह संदेश उन सभी के लिये है जो शिवपाल के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहते हैं. साथ ही मुलायम ने यह भी साफ कर दिया है कि पार्टी पर अभी भी उनका ही नियंत्रण है और शिवपाल के प्रति संवेदना रखने वाले तमाम दिग्गजों को अखिलेश के पीछे चलना होगा. आखिरकार मुलायम ही हैं जिनके नाम पर वोट मिलते हैं.’’

अफवाहों को कान कैसे मिले

मुलायम ने यह बात एक ऐसे समय में कही हैं जब राज्य में यह अफवाह तेजी से फैल रह थी कि शिवपाल जल्द ही अखिलेश को कुर्सी से हटाने वाले हैं. खासकर चाचा के अपने भतीजे के स्थान पर राज्य के प्रभारी पद पर नियुक्ति के बाद तो हर तरफ ऐसी ही चर्चाओं का बाजार गर्म था.

शिवपाल को प्रभारी बनाने के बाद ही उनके समर्थकों के बीच आशा की एक नई किरण का संचार हो गया था. शिवपाल समर्थकों को लगने लगा था कि अब शायद मुलायम नेतृत्व संभालने के लिये अपनी बारी का इंतजार कर रहे अपने छोटे भाई को राज्य की बागडोर सौंप देंगे.

ऐसा पहली बार नहीं था कि पार्टी के मुख्यमंत्री के संभावित उम्मीदवार के रूप में शिवपाल के नाम की चर्चाओं का बाजार गर्म हो. 

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पार्टी से जुड़े अधिकतर लोगों ने 2012 में मुलायम के राज्य की राजनीति अपने परिवार के किसी सदस्य को सौंपकर राष्ट्रीय राजनीति में ध्यान केंद्रित करने के फैसले के बाद शिवपाल को इस पद का सबसे योग्य उम्मीवार माना था. यही उम्मीद यादव परिवार के बीच शक्ति को लेकर चले अंदरूनी तनाव का कारण बनी.

कभी पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले शिवपाल की अधिकतर शक्तिया अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही खत्म हो गई थीं

एसपी मुखिया द्वारा अखिलेश को मुख्यमंत्री पद का उम्मदवार घोषित करने के बाद शिवपाल खेमे का नाराज होना लाजमी था.

शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ी ताकत बन चुके हैं. शिवपाल का सपना रहा है कि मुलायम के संन्यास के बाद वह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें. हालांकि समय आने पर मुलायम ने अपने भाई के मुकाबले अपने बेटे को तजरीह दी.

कभी पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले शिवपाल की अधिकतर शक्तिया अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद ही खत्म हो गई थीं. सूत्रों का कहना है कि इसके बाद से ही यादव परिवार के आपसी संबंधों में दरार आ गई थी.

शिवपाल की दावेदारी की वजह

सूत्रों का दावा है कि 2012 में लगे झटके के बाद शिवपाल इस इंतजार के खेल के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे थे और तेजी से आपा खोते जा रहे थे. लेकिन फिर भी वे चुपचाप पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ काम करते हुए शीर्ष पद के लिये अपने दावे को मतबूत करते रहे.

शिवपाल के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि ऐसा करने की कई वाजिब वजहें हैं. उनके मुताबिक अखिलेश को अपने कुप्रबंधन के चलते सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ रहा है. 

यह बात इससे साबित होती है कि कई बार खुद मुयायम सिंह भी सर्वाजनिक मंचों से मुख्यमंत्री के रूप में उनके प्रदर्शन को लेकर नाराजगी जता चुके हैं.

एक वरिष्ठ सपा नेता कहते हैं, ‘‘मामला चाहे अखिलेश के तीन करीबियों के निष्कासन का हो या मुलायम द्वारा सार्वजनिक रूप से अखिलेश सरकार की खिंचाई करने का, पिता और पुत्र के बीच गभीर मतभेदों को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर हर तरफ चर्चा होती रही है. यह सच किसी से छिपा नहीं है कि वास्तव में सरकार तो मुलायम सिंह ही चलाते हैं और अखिलेश सिर्फ एक प्राॅक्सी मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे हैं.’’

अखिलेश के पास सिर्फ युवाओं का समर्थन है लेकिन पार्टी और सरकार चलाने के लिये यह पर्याप्त नहीं है

इसके अलावा शिवपाल के दावे को इस तथ्य से भी मजबूती मिली कि समाजवादी सरकार 2012 में किये गए अपने वादों पर खरा उतरने में सफल नही रही है और साथ ही राज्य की बिगड़ती हुई कानून-व्यवस्था की स्थिति भी उनके पक्ष में काम कर रही थी. पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर मजबूत पकड़ रखने वाले शिवपाल को इन्हीं बातों से उम्मीद जगी थी.

एक अन्य सपा नेता कहते हैं, ‘‘शिवपाल ने सपा को उसकी मौजूदा मजबूत स्थिति में पहुंचाने के लिये वर्षों की मेहनत की है. लिहाजा उनके पास यह मानने के तमाम कारण हैं कि उनकी पीठ में छुरा भोंका गया है. ऐसा कोई निर्वाचन क्षेत्र नहीं है जहां का उन्होंने दौरा न किया हो. इसके अलावा वे लगातार पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर उनकी शिकायतों को दूर करने के प्रयास करते रहते हैं. इन्हीं सब कारणों के चलते वे राज्य के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं. उनके दावे के पक्ष में इतने ही कारण पर्याप्त हैं.’’

लखनऊ में रहने वाले एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘‘वास्तव में पार्टी का नियंत्रण उनके हाथों में है और बड़ी संख्या में नेता शीर्ष पद के लिये उनकी दावेदारी का समर्थन करते हैं. अखिलेश के पास सिर्फ युवाओं का समर्थन है लेकिन पार्टी और सरकार चलाने के लिये यह पर्याप्त नहीं है.’’

अमर सिंह भी एक कारण हैं

मुलायम की अमर सिंह के साथ दोबारा बढ़ती नजदीकियों को भी पिता-पुत्र के बीच बढ़ती हुई दूरियों के एक कारण के रूप में देखा जा रहा था. अखिलेश ने खुलकर पार्टी में सिंह की वापसी का विरोध किया था और 2010 में उन्हें पार्टी से बाहर करवाने में अहम भूमिका भी निभाई थी. 

लेकिन फिर भी अखिलेश के विरोध के बावजूद अमर सिंह को पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिये मनोनीत किये जाने की अफवाहों को शिवपाल खेमे ने सकारात्मक संदेश के रूप में लिया.

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इस सबके बावजूद, शिवपाल को एक बार फिर उनके बड़े भाई यानी नेताजी ने नजरअंदाज कर दिया है. उनके शब्द अब भी पार्टी के मामलों में अंतिम माने जाते हैं. 

एक सपा नेता दावा करते हैं, ‘‘उन्हें अभी इंतजार करना होगा और हो सकता है कि उनके इंतजार के घड़ियां कभी न खत्म हों. लेकिन राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता. पार्टी के नेतृत्व में कोई भी शून्य उत्पन्न होने पर शिवपाल मौका नहीं चूकेंगे. उनके पास पार्टी का समर्थन तो है लेकिन अपने भाई का नहीं है.’’

First published: 21 April 2016, 7:46 IST
 
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