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अजर-अमर, फ़ौलादी इरादों वाला मुद्राराक्षस: (1933-2016)

हिमांशु वाजपेयी | Updated on: 15 June 2016, 17:15 IST
(फाइल फोटो)
QUICK PILL
  • साहित्यकार सुभाष चन्द्र उर्फ मुद्राराक्षस का जन्म 21 जून 1933 को लखनऊ के बेहटा गांव में हुआ था. उनके पिता शिवचरणलाल ‘प्रेम’ उत्तर प्रदेश के लोकनाट्य स्वांग सपेड़ा और नौटंकी के उस्तादों में थे.
  • 1976 में वो रेडियो की नौकरी छोड़कर लखनऊ वापस आ गए. पूरी ज़िंदगी स्वतंत्र लेखक के बतौर बसर की. 16 नाटकों का निर्देशन किया, 15 से ज्यादा नाटक लिखे जिनमें 9 छपे.

हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार और रंगकर्मी मुद्राराक्षस नहीं रहे. सोमवार यानी 13 जून को उन्होंने अपने शहर लखनऊ में आखिरी सांस ली. वो पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे.

हिन्दी साहित्य में हमेशा अपने विद्रोही तेवर, निराले अंदाज़ और बहुमुखी प्रतिभा के लिए पहचाने गए मुद्राराक्षस लखनऊ के हिन्दी वालों में सबसे सीनियर थे. भगवती बाबू, नागर जी और यशपाल की तिकड़ी के लिए मशहूर ये शहर श्रीलाल शुक्ल और कामतानाथ से पहले ही ख़ाली हो चुका था और अब इस सिलसिले का एक और चिराग़ बुझ गया.

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भगवती बाबू,नागर जी और यशपाल की तिकड़ी के लिए मशहूर शहर श्रीलाल शुक्ल और कामतानाथ से पहले ही खाली हो चुका था

सुभाष चन्द्र उर्फ मुद्राराक्षस का जन्म 21 जून 1933 को लखनऊ के बेहटा गांव में हुआ. उनके पिता शिवचरणलाल ‘प्रेम’ उत्तर प्रदेश के लोकनाट्य स्वांग सपेड़ा और नौटंकी के उस्तादों में थे.

मुद्राराक्षस में साहित्यिक सांस्कृतिक अभिरुचि अपने पिता के करीब रहकर ही जगी. यही वजह है कि कम उम्र से ही वे नौटंकी की बारीकियों को समझने लगे और किशोरावस्था से ही उन्होने नौटंकी में अभिनव प्रयोग भी शुरू कर दिए. इसी दौर में साहित्य ने भी उन्हे अपने मोहपाश में ज़्यादा कसकर बांधना शुरू किया. अब लिखने और छपने का सिलसिला तेज़ी पकड़ने लगा.

दिवंगत साहित्यकार मुद्राराक्षस के साथ लेखक हिमांशु बाजपेयी की तस्वीर

ज़िंदगी में कभी नौकरी न करने का फैसला

1955 में 22 साल की उम्र में लखनऊ विश्वविद्यालय से हिन्दी में एमए किया, वो भी गोल्ड मेडल जीतते हुए. इसी साल कलकत्ता से उन्हे ज्ञानोदय के सहायक संपादक की नौकरी के लिए बुलावा आ गया. उन दिनों लखनऊ जैसे छोटे शहर के किसी भी मामूली नौजवान के लिए ये एक ग़ैर-मामूली बात थी.

मुद्राराक्षस ने कलकत्ता जाकर ज्ञानोदय ज्वाइन किया. इसके बाद से उनकी प्रतिभा धीरे धीरे अपनी पहचान बनाने लगी. ज्ञानोदय में मुद्राराक्षस 1958 तक रहे. इन सालों में उन्होंने अपने नाम को इतना पक्का कर लिया कि 1959 में अनुब्रत के संपादक हो गए. यहां भी उनकी साहित्यिक प्रतिभा को खूब पहचान मिली.

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1976 में उसूलों की लड़ाई पर उन्होंने रेडियो की नौकरी छोड़ी तो ज़िंदगी में कभी नौकरी न करने का फैसला किया

1962 में वे ऑल इंडिया रेडियो में स्क्रिप्ट एडिटर नियुक्त हुए. रेडियो में रहते हुए उन्होने इस मीडियम के लिए तो उत्कृष्ट काम किया ही साथ ही साहित्य सृजन भी चलता रहा. 1976 में उसूलों की लड़ाई पर उन्होंने रेडियो की नौकरी छोड़ी, तो ज़िंदगी में कभी नौकरी न करने का फैसला किया और इसे निभाया भी.

बेशुमार सम्मानों से सम्मानित

दिल्ली छोड़कर लखनऊ वापस आ गए तो पूरी ज़िंदगी स्वतंत्र लेखक के बतौर बसर की. 16 नाटकों का निर्देशन किया, 15 से ज्यादा नाटक लिखे जिनमें 9 छपे. 12 उपन्यास, 5 कहानी संग्रह, 3 व्यंग्य संग्रह और आलोचना की 5 किताबें छपीं. ये विवरण हमें बता देता है कि मुद्राराक्षस की साहित्यिक प्रतिभा कितनी विराट और बहु-आयामी थी.

यही वजह है कि राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादेमी अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादेमी अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, अम्बेडकर महासभा का दलित रत्न सम्मान, शूद्र महासभा का शूद्राचार्य सम्मान समेत बेशुमार सम्मान उनको मिले.

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मुद्राराक्षस हमेशा से विद्रोही रहे. शुरू से लेकर आख़िर तक. मथुरादास की डायरी और राक्षस उवाच जैसे अपने अनूठे व्यंग्य संग्रहों में उन्होने हिन्दी जगत की ऐसी ख़बर ली कि एक हंगामा खड़ा हो गया. ये व्यंग्य जब अख़बारों में छपे तो कई बार नौबत यहां तक आ गयी कि दफ्तर पर पथराव हो गया और संपादक को माफी मांग कर कॉलम बंद करना पड़ा. मगर मुद्राराक्षस अपनी जगह अटल रहे. न माफी मांगी न डरे..बराबर लिखते रहे. फिर हिन्दू धर्मग्रन्थों को जी जान लगाकर खंगाला और उसके बाद धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ जैसी चर्चित किताब लिखी.

मुझसे तर्क करो...मैं बताऊंगा कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं

अपने निधन के कुछ ही साल पहले लखनऊ की मशहूर तिकड़ी नागर, भगवती बाबू और यशपाल के सम्मान में आयोजित एक बड़े प्रोग्राम में मंच से बोल आए कि अमृतलाल नागर तीसरे दर्जे के उपन्यासकार थे और उनके उपन्यास विश्व साहित्य के बड़े उपन्यासों के आगे कहीं नहीं ठहरते. उनके मुताबिक नागर उपन्यास के बजाए पुरातत्व में हाथ आज़माते तो बेहतर था.

ग़ौरतलब है कि नागर जी ने अपने सबसे मशहूर उपन्यास बूंद और समुद्र का डिक्टेशन मुद्रा को ही दिया था और बकायदा किताब की प्रस्तावना में उनका ज़िक्र किया था. जैसे ही नागर जी के लिए वो बयान मुद्राराक्षस के मुंह से निकला.

मुद्राराक्षस हमेशा से विद्रोही रहे. शुरू से लेकर आख़िर तक. मथुरादास की डायरी और राक्षस उवाच पर हंगामा खड़ा हुआ

सभागार में उनके ख़िलाफ नारेबाज़ी शुरू हो गयी. कुछ लोग तो सीधा आक्रामक अंदाज़ में चिल्लाते हुए मंच की तरफ चले आए. सब घबराने लगे. मगर मुद्रा मुस्कुराते रहे और हल्के स्वर में बार बार दोहराते रहे. मुझसे तर्क करो...मैं बताऊंगा कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं..मुझसे तर्क करो...मुझसे बहस करो...हालांकि नारे लगाने वालों में से किसी ने उनसे बहस नहीं की. क्योंकि मुद्राराक्षस से तर्क और बहस करने की हिम्मत लखनऊ तो क्या देश भर में कम ही लोग जुटा पाते थे.

नहीं लिया किसी का सहारा

आखिरी वक्त में कमज़ोरी के बावजूद वे देश और दुनिया का जितना साहित्य पढ़ते थे वो हैरत में डालता है. मज़ूबत इरादों के अडिग व्यक्ति थे. आखिरी बार जब वे लखनऊ पुस्तक मेले में आए तो काफी कमज़ोर हो गए थे. स्टेज पर चढ़ने में उन्हे कठिनाई हो रही थी तो दो लोगों ने सहारा देकर उन्हे चढ़ाया.

माइक पर जाते ही जो पहली बात उन्होने बोली- मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मैं इतना कमज़ोर हो गया हूं. लोगों का सहारा लेकर चढ़ना पड़ रहा है. मुझे तो लगता था कि मैं बहुत मज़बूत हूं. मैने कभी किसी का सहारा नहीं लिया... मुद्राराक्षस को ये कहते सुनना एक अजीब सा अहसास था.

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मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मैं इतना कमज़ोर हो गया हूं. मुद्राराक्षस को ये कहते सुनना एक अजीब सा अहसास था.

सारे लोगों ने हमेशा उन्हें वैसा ही देखा था जैसा वो अपने बारे में बता रहे थे. मगर उस दिन जब उन्हें पहली बार अपने कमज़ोर पड़ने का एहसास हुआ, तभी सामने मौजूद लोगों को भी ये अहसास हुआ कि मुद्राराक्षस भी कमज़ोर पड़ सकते हैं. उसके बाद वो कमज़ोर पड़ते ही गए. बीमारी से उनका संघर्ष जारी रहा. कभी घर, कभी अस्पताल और अंतत: 13 जून को ये संघर्ष लखनऊ के मेडिकल कॉलेज ट्रॉमा सेंटर में समाप्त हुआ.

मुद्रा अपनी बुझती हुई आंखों और जाती हुई चेतना के वक्त भी शायद यही सोच रहे हों कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मैं इतना कमज़ोर हो गया हूं...

First published: 15 June 2016, 17:15 IST
 
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