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किसान आत्महत्याः शिवसेना का भाजपा पर हमला या सिर्फ दिखावा

अश्विन अघोर | Updated on: 2 September 2016, 8:34 IST
(कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • शिवसेना के मुखपत्र सामना ने अपने संपादकीय में किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़नवीस सरकार को कठघरे में खड़ा किया है.
  • सामना के सम्पादकीय में लिखा है कि केंद्र और महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के दो साल बाद भी किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला थम नहीं रहा है.
  • सामना ने लिखा है कि फड़नवीस के सीएम बनने के बाद विदर्भ और मराठवाड़ा में 1000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. 
  • मराठवाड़ा के उस्मानाबाद की किसान वनमाला गायकवाड़ की खुदकुशी का मामला सामने आया है. वनमाला ग्राम पंचायत में शिवसेना की एक सदस्य थीं.

शिवसेना-भाजपा जब विपक्ष में थी तब सत्तारूढ़ कांग्रेस-राकांपा गठबंधन सरकार पर किसान आत्महत्या के मामले में हमेशा ही हमला बोला. बल्कि कहा जा सकता है कि किसानों में फैले रोष के कारण ही 2014 के विधानसभा चुनावों में सेना-भाजपा गठबंधन को जोरदार जीत मिली. ग्रामीण इलाकों में विशेषकर यह गुस्सा ज्यादा उबाल पर था.

अब सेना-भाजपा गठबंधन को सत्ता में आए दो साल हो गए हैं. बहुत से वादों के बावजूद राज्य में किसानों की स्थिति बदतर ही हुई है. सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र के उस्मानाबाद की किसान वनमाला गायकवाड़ की आत्महत्या से हालात स्वतः जाहिर हो जाते हैं. 

किसानों में फैले रोष के कारण ही 2014 के विधानसभा चुनावों में सेना-भाजपा गठबंधन को जोरदार जीत मिली.

वनमाला ने अपनी जमीन पर खेती करने के लिए किसी ऋणदाता से 5 लाख रुपए का लोन लिया था लेकिन 20 लाख रुपए चुकाने के बावजूद उसका ऋण बकाया ही रहा. यही कर्ज उसके लिए जानलेवा बन गया. ऋणदाता कर्जवसूली को लेकर उसे लगातार प्रताड़ित करते रहते थे. इससे दुखी हो कर उसने रविवार रात जहर खा कर आत्महत्या कर ली.

वनमाला कलम्ब तालुका में भट शिवपुरा ग्राम पंचायत की सदस्य थी बावजूद इसके वह ऋणदाता माफिया की शिकार हो गई. इसी माफिया ने महाराष्ट्र में कई किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर किया है. फिर भी यह राजनेताओं और नौकरशाहों के बल पर फल-फूल रहा है.

वनमाला की आत्महत्या इस बात का सबूत है कि राज्य की बदलती सरकारें भी इस ऋण माफिया पर रोक लगाने में सफल नहीं रहीं. कांग्रेस-राकांपा गठबंधन सरकार जनता से बड़े-बड़े वादे करती रही. तत्कालीन सरकार के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल कहते ही रहे कि किसानों को प्रताडि़त करने वाले ऋण माफिया को गंभीर सजा दी जाएगी, सजा तो दूर, किसी पर कभी कोई आरोप तक नहीं लगाया गया.

लगता है राजनीतिक दल इस बात पर एकमत हैं कि ऋण माफिया को फलने-फूलने दिया जाए. विपक्ष सहित किसी भी पार्टी ने वनमाला की आत्महत्या पर कोई वक्तव्य जारी नहीं किया है. सेना इस मामले पर जरूर बात कर रही है लेकिन उसे किसानों के कल्याण की परवाह नहीं हे, उसे तो बस अपनी सहयोगी पार्टी भाजपा को नीचा दिखाने का एक और मौका मिल गया है.

वनमाला ग्राम पंचायत में शिवसेना की एक सदस्य थीं, यह भी एक संयोग ही है और सेना को इस पर राजनीति करने का मौका मिल गया है.

गरमाता जा रहा है मामला

शिवसेना ने अपनी पार्टी के मुखपत्र सामना के सम्पादकीय में लिखा है कि केंद्र और महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के दो साल बाद भी किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला थम नहीं रहा है. और इनके कारण वही हैं, जो पहले थे-ऋण, सूखा, फसल कम होना, ‘मुआवजे के नाम पर धोखा‘ आदि.

वनमाला की आत्महत्या सबूत है कि राज्य की बदलती सरकारें भी ऋण माफिया पर रोक लगाने में सफल नहीं रहीं.

सामना के सम्पादकीय में पूछा गया है, ‘क्या सरकार अब किसानों और उनकी समस्याओं की ओर ध्यान देगी?’ वनमाला की आत्महत्या पर सम्पादकीय में लिखा है- ‘उसने कर्ज चुकाने के बावजूद ऋण माफिया की प्रताड़ना से दुखी हो आत्महत्या कर ली. ऋण दाता किसी भी तरह से उसकी जमीन पर कब्जा करना चाहते थे. अगर यह सच है तो राज्य सरकार को अब सतर्क हो जाना चाहिए और आत्म-विश्लेषण करना चाहिए. यह एक गंभीर समस्या है और अवैध रूप से पैसा उधार देेने संबंधी कई कानून बने हुए हैं बावजूद इसके अगर ऐसी घटनाएं घटती रहीं तो यह समस्या गंभीर है.

सामना ने दावा किया है कि 2014 में देवेन्द्र फड़नवीस द्वारा मुख्यंत्री पद की शपथ लेने के बाद विदर्भ और मराठवाड़ा में 1000 से ज्यादा लोग आत्महत्या कर चुके हैं. अगर राज्य में आज यह हालात हैं तो मौजूदा सरकार और पिछली सरकारों में क्या फर्क है? दोनो ही मुआवजे के नाम पर किसानों को ठगने में लगी हैं.

अखबार में कलम्ब तालुक की वनमाला सहित मराठवाड़ा में पिछले दो साल में हुई किसान आत्महत्या की घटनाओं की पूरी सूची दी गई है. कलम्ब के ही एक किसान सुनील मुटकुले ने एक निजी ऋण दाता से 1,000 रुपए लिए थे. साल भर में 22,000 चुकाने के बावजूद उसे पैसे के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था.

सामना: फड़नवीस के सीएम बनने के बाद विदर्भ और मराठवाड़ा में 1000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

ऋण माफिया ने उसे गटर का पानी पीने के लिए मजबूर किया. इसी वजह से उसने आत्म हत्या कर ली. मराठवाड़ा और विदर्भ में ऐसे कई किस्से मिल जाएंगे. निजी ऋणदाता हर दिन गरीब किसानों को प्रताड़ित करते हैं. इनमें से कुछ यह नहीं सह पाते और आत्महत्या कर लेते हैं.

सामना ने लिखा है कि मतदाताओं ने इस उम्मीद में नई सरकार को मौका दिया था कि भ्रष्ट और असंवेदनशील कांग्रेस-राकांपा सरकार से मुक्ति के बाद हालात बदलेंगे लेकिन लगता है जनता उन्हीं समस्याओं के जाल में उलझी हुई है. ‘सूखा या बाढ़ प्राकृतिक आपदाएं हैं, उन पर किसी का वश नहीं है लेकिन निजी ऋणदाताओं पर आसानी से निगरानी रखी जा सकती है. खैर सरकार अपनी जिममेदारी निभाने में विफल रही. नतीजतन गरीब किसान आत्महत्या करते रहे. अगर सरकार महाराष्ट्र के लोगों से किया गया परिवर्तन का वादा पूरा करना चाहती है तो उसे इन घटनाओं को गंभीरता से लेना होगा.’

First published: 2 September 2016, 8:34 IST
 
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